2024 के लोकसभा चुनावों को दो साल से ज्यादा समय बीत चुका है. अगस्त 2026 तक भारतीय राजनीति में कई बड़े सियासी बदलाव हुए हैं. 2024 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में NDA ने 293 सीटों के साथ लगातार तीसरी बार केंद्र में सरकार बनाई थी. वहीं INDIA गठबंधन के दलों ने 234 सीटें जीती थीं. उस समय विपक्ष ने मजबूत चुनौती पेश की थी.
लेकिन पिछले दो वर्षों में तस्वीर काफी बदल गई है. INDIA गठबंधन के कई सहयोगी दलों में टूट हुई या वे गठबंधन से अलग हुए, जबकि बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA ने पुराने सहयोगियों को फिर साथ लाने के साथ विपक्षी खेमे में भी सेंध लगाई. तमिलनाडु, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, पंजाब और ओडिशा के घटनाक्रमों ने संसद के नंबर गेम को प्रभावित किया है.
INDIA गठबंधन को लगे 4 बड़े झटके
1. DMK का INDIA गठबंधन से अलग होना
तमिलनाडु की सत्ताधारी DMK का INDIA गठबंधन से अलग होना विपक्ष के लिए बड़ा झटका है. 2024 के लोकसभा चुनाव में DMK ने 22 सीटें जीती थीं. जून 2026 में तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग और रणनीतिक मतभेदों के बीच एमके स्टालिन की पार्टी ने गठबंधन से अलग होने का फैसला किया. इसका सीधा असर INDIA गठबंधन के संसदीय गणित पर पड़ा. उसके खाते से 22 सांसद कम हो गए. DMK ने संसद में अपने सांसदों के लिए अलग बैठने की व्यवस्था की मांग भी की.
2. महाराष्ट्र में उद्धव गुट के 6 सांसद NDA के साथ
महाराष्ट्र में भी INDIA गठबंधन को बड़ा झटका लगा. 22 जून 2026 को शिवसेना (UBT) में बगावत हुई. पार्टी के कुल नौ लोकसभा सांसदों में से छह सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए. इससे लोकसभा में शिंदे गुट के सांसदों की संख्या 7 से बढ़कर 13 हो गई. यानी उद्धव ठाकरे गुट की संसदीय ताकत में बड़ी कमी आई और NDA का आंकड़ा मजबूत हुआ.
3. बंगाल में TMC सांसदों के बीच फूट
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की TMC के भीतर भी बड़ी फूट सामने आई. 8 जून को TMC के लोकसभा के 28 सांसदों में से 20 ने NDA सरकार को समर्थन देने का फैसला किया. TMC की पूर्व नेता और सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने कहा था कि सांसदों के हस्ताक्षर वाला पत्र लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को भेज दिया गया है.
बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय कर लिया. NCPI पश्चिम बंगाल में रजिस्टर्ड पार्टी है. इस पार्टी ने अपने चुनावी सफर की शुरुआत त्रिपुरा से की थी. 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में NCPI ने चार उम्मीदवार उतारे थे और चारों चुनाव हार गए थे.
4. AAP के 7 राज्यसभा सांसद बीजेपी के साथ
INDIA गठबंधन को सिर्फ लोकसभा में ही नुकसान नहीं हुआ. राज्यसभा में भी आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लगा. अप्रैल 2026 में पंजाब से AAP के 7 राज्यसभा सांसद बीजेपी में शामिल हो गए. इससे विपक्षी खेमे की उच्च सदन में ताकत प्रभावित हुई और NDA को फायदा मिला. राज्यसभा में सरकार को घेरने की विपक्ष की रणनीति के लिहाज से भी इसे बड़ा राजनीतिक झटका माना गया.
लोकसभा: दो-तिहाई आंकड़े से 42 वोट पीछे
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 240 सीटें मिली थीं. NDA के सहयोगियों में TDP के 16, JDU के 12, शिवसेना के शिंदे गुट के 7, LJP (रामविलास) के 5 और दूसरे दलों के 13 सांसद थे. इन आंकड़ों को जोड़ने पर NDA का आंकड़ा 293 बनता है. 14 जून 2026 को TMC के काकोली घोष दस्तीदार समेत 20 सांसद NDA समर्थित नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी से जुड़ गए. इससे NDA का आंकड़ा 292 से बढ़कर 312 बताया गया है. जून में शिवसेना (UBT) के नौ में से छह सांसद भी शिंदे गुट में चले गए. अब NDA का आंकड़ा 318 हो चुका.
फिलहाल तीन लोकसभा सीटें खाली हैं. असम की नागांव, पश्चिम बंगाल की बसीरहाट और मेघालय की शिलॉन्ग. ऐसे में प्रभावी सदन 540 सदस्यों का है. दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 सांसद चाहिए. 318 के आंकड़े के हिसाब से NDA अभी 42 वोट पीछे है.
राज्यसभा: दो-तिहाई बहुमत से 11 वोट पीछे
अप्रैल 2026 में AAP के सात राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में जाने और जून में हुए राज्यसभा चुनावों के बाद NDA के पास 149 सांसद बताए गए. इनमें बीजेपी के 114 सांसद हैं. इसके बाद TMC के तीन राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रे, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बरैक ने 9 जुलाई को बीजेपी का दामन थाम लिया. 17 जुलाई को वे निर्विरोध राज्यसभा सांसद चुने गए. इससे NDA की संख्या बढ़कर 152 हो गई. 16 जुलाई को TMC की सांसद कोयल मलिक ने भी इस्तीफा दिया. उनके बीजेपी में शामिल होने की अटकलें लगाई गईं. 245 सीटों वाली राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 163 है. यानी 152 के आंकड़े के हिसाब से NDA इससे 11 वोट पीछे है.
यानी लोकसभा के 26 और राज्यसभा के 10 सांसदों को जोड़कर NDA के 36 सांसद बढ़ें हैं.

NDA की रणनीति: कुनबा बढ़ाने पर जोर
जहां INDIA गठबंधन के भीतर टूट और अलगाव देखने को मिला, वहीं बीजेपी ने NDA का कुनबा बढ़ाने पर जोर दिया. इसका बड़ा उदाहरण तमिलनाडु है. 2024 लोकसभा चुनाव से पहले AIADMK ने बीजेपी से गठबंधन तोड़ लिया था. लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियां फिर साथ आईं और मिलकर चुनाव लड़ा. यह बदलाव बताता है कि बीजेपी ने दक्षिण भारत में पुराने सहयोगियों को दोबारा जोड़ने की रणनीति अपनाई है. इसके अलावा बीजेपी और अकाली दल (SAD) के बीच भी नजदीकियां बढ़ने की बात सामने आई है.
आखिर INDIA गठबंधन क्यों बिखर रहा है?
पिछले दो वर्षों के घटनाक्रम से INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी उसका केंद्रीय नेतृत्व और साझा रणनीति का अभाव दिखाई देती है. क्षेत्रीय दलों के अपने राज्यस्तरीय हित हैं. ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के खिलाफ साथ आने वाले दल राज्यों में एक-दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं. DMK और TMC जैसे दल अपने राज्यों में मजबूत हैं. ऐसे में उन्हें कांग्रेस के साथ बने रहने से होने वाले राजनीतिक फायदे और नुकसान का हिसाब अलग तरीके से करना पड़ता है. दूसरी ओर बीजेपी ने कोएलिशन मैनेजमेंट पर लगातार जोर दिया है. TDP और JDU जैसे सहयोगियों को साथ रखने के अलावा AIADMK जैसे पुराने साथी को फिर जोड़ना इसी रणनीति का हिस्सा है.
तटस्थ दलों में भी सेंधमारी
बीजेपी की रणनीति सिर्फ INDIA गठबंधन को कमजोर करने तक सीमित नहीं रही. तटस्थ रुख रखने वाले दलों के भीतर भी राजनीतिक सेंधमारी देखने को मिली. 16 मार्च 2026 को ओडिशा के राज्यसभा चुनाव में नवीन पटनायक की BJD के छह विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर क्रॉस वोटिंग की. इसका फायदा बीजेपी को मिला और राज्यसभा में उसकी स्थिति मजबूत हुई. इसके बाद BJD ने सभी छह विधायकों को पार्टी से निलंबित कर दिया.
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शुभेंदु प्रताप भूमंडल
पत्रकारिता में बीते 5 साल से सक्रिय हैं. नेशनल और इंटरनेशनल न्यूज राइटिंग का अनुभव. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से साइंस में ग्रेजुएशन, फिर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता और वीडियो प्रोडक्शन की पढ़ाई. दैनिक भास्कर डिजिटल से करियर की शुरुआत. बतौर न्यूज ब्रीफ एडिटर भास्कर डिजिटल में 800 से ज्यादा बाइलाइन स्टोरी. वीडियो स्क्रिप्टिंग का भी अनुभव. अगस्त 2025 से टीवी9 डिजिटल के साथ नई पारी का आगाज.
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