अधिकारियों की गलती से प्रमोशन में देरी, कर्मचारी को 2012 से मिलेगा वित्तीय लाभ

Published on 13 अक्टू॰ 2026

Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार के अधिकारियों की गलती के कारण किसी कर्मचारी का प्रमोशन देर से होने पर उसे वित्तीय लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता. अदालत ने प्रार्थी मनोज कुमार सिंह को सहायक अनुभाग पदाधिकारी (असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर) के पद पर एक अक्टूबर 2012 से वित्तीय लाभ देने का निर्देश दिया है. साथ ही अनुभाग पदाधिकारी (सेक्शन ऑफिसर) के पद पर उनके प्रमोशन की तिथि 24 सितंबर 2025 से बदलकर चार दिसंबर 2020 करने के लिए आवश्यक संशोधन अधिसूचना जारी करने का आदेश दिया है.


न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने मनोज कुमार सिंह की ओर से दायर रिट याचिका पर यह फैसला सुनाया. अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार के संबंधित आदेशों में आवश्यक संशोधन करने का निर्देश दिया.

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वरीयता सूची में नाम छूटने से प्रमोशन में हुई देरी

प्रार्थी मनोज कुमार सिंह वर्ष 1997 में तृतीय श्रेणी के लिपिकीय संवर्ग में नियुक्त हुए थे. उन्होंने वर्ष 2003 में देवघर हिंदी विद्यापीठ से साहित्य अलंकार की डिग्री प्राप्त की थी. वर्ष 2012 में सहायक अनुभाग पदाधिकारी के पद पर प्रमोशन के लिए पात्र होने के बावजूद उनका प्रमोशन नहीं हुआ. एक अक्टूबर 2012 को उनके कनिष्ठ कर्मचारियों को इस पद पर प्रमोशन दे दिया गया, जबकि वरीयता सूची में उनका नाम शामिल नहीं होने के कारण वह इससे वंचित रह गए.


बाद में उनकी डिग्री की वैधता को लेकर भी विवाद उत्पन्न हो गया. राज्य सरकार ने 26 फरवरी 2015 को जारी पत्र के माध्यम से देवघर हिंदी विद्यापीठ से प्राप्त साहित्य अलंकार की डिग्री को अमान्य करने का निर्णय लिया था. इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी.

हाईकोर्ट ने संबंधित मामले में 10 मई 2022 को फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि डिग्री को अमान्य करने का निर्णय पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं होगा. इसके बाद राज्य सरकार ने 15 जून 2023 को पत्र जारी कर 26 फरवरी 2015 से पहले प्राप्त ऐसी डिग्रियों को मान्य किया.


इसके बाद मनोज कुमार सिंह को 20 सितंबर 2024 के विभागीय आदेश से एक अक्टूबर 2012 से सहायक अनुभाग पदाधिकारी के पद पर काल्पनिक प्रमोशन दिया गया. हालांकि, उन्हें इस अवधि का वास्तविक वित्तीय लाभ नहीं दिया गया. इससे असंतुष्ट होकर उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

अदालत ने कहा- कर्मचारी की गलती नहीं, इसलिए लाभ से वंचित नहीं कर सकते

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि प्रार्थी के प्रमोशन में देरी के लिए वह स्वयं जिम्मेदार नहीं थे. पहली बार वरीयता सूची में उनका नाम छूटने के कारण प्रमोशन प्रभावित हुआ. दूसरी बार उनकी शैक्षणिक योग्यता की वैधता को लेकर सरकार के निर्णय के कारण बाधा उत्पन्न हुई, जिसे बाद में गलत पाते हुए सुधार किया गया.

अदालत ने कहा कि संजय कुमार के मामले में विभाग ने अपने स्तर पर विभागीय परीक्षा की अनिवार्यता में छूट देते हुए वित्तीय लाभ प्रदान किया था. प्रार्थी का मामला भी समान परिस्थितियों वाला है. जब प्रमोशन में देरी राज्य सरकार की गलतियों के कारण हुई, तो विभागीय परीक्षा उत्तीर्ण नहीं करने के आधार पर उन्हें लाभ से वंचित करना उचित नहीं होगा.


अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी परिस्थितियों में झारखंड वित्त नियमावली के नियम 74 और झारखंड सेवा संहिता के नियम 58 के आधार पर प्रार्थी को वित्तीय लाभ देने से इनकार नहीं किया जा सकता.

प्रमोशन की तिथि बदलने के लिए संशोधन अधिसूचना जारी करने का आदेश

अदालत ने प्रार्थी को एक अक्टूबर 2012 से सहायक अनुभाग पदाधिकारी के पद पर वित्तीय लाभ देने का निर्देश दिया. इसके लिए 20 सितंबर 2024 और 24 सितंबर 2025 के संबंधित आदेशों में आवश्यक संशोधन करने का आदेश दिया गया.


इसके साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि मनोज कुमार सिंह के अनुभाग पदाधिकारी के पद पर प्रमोशन की तिथि 24 सितंबर 2025 के स्थान पर चार दिसंबर 2020 अधिसूचित करने के लिए आवश्यक शुद्धिपत्र जारी किया जाए. यह वही तिथि है, जिस दिन उनके कनिष्ठ कर्मचारी को इस पद पर प्रमोशन दिया गया था. अदालत ने सभी लागू परिणामी लाभ प्रदान करने का निर्देश देते हुए रिट याचिका स्वीकार कर ली.

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