17 हजार फीट की ऊंचाई पर Patna से Lucknow आ रही Indigo Flight पर गिरी बिजली

Published on 8 अक्टू॰ 2026

October 8, 2026

17 हजार फीट की ऊंचाई पर Patna से Lucknow आ रही Indigo Flight पर गिरी बिजली

नेशनल डेस्कः पटना से लखनऊ आ रही इंडिगो की फ्लाइट 6E925 उस समय एक बेहद डरावने हालात से गुजर गई, जब लखनऊ के पास करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर विमान पर आसमानी बिजली गिर गई। बिजली गिरने से विमान के आगे लगे नोज़ कोन यानी रेडोम को काफी नुकसान पहुंचा। विमान में उस समय 104 यात्री और 6 क्रू मेंबर, यानी कुल 110 लोग सवार थे। खराब मौसम के बीच हुई इस घटना के बावजूद विमान ने सुरक्षित तरीके से चौधरी चरण सिंह इंटरनेशनल एयरपोर्ट, लखनऊ पर लैंड किया। राहत की बात यह रही कि इस घटना में किसी यात्री या क्रू मेंबर को चोट नहीं आई।

17 हजार फीट की ऊंचाई पर क्या हुआ
फ्लाइट पटना से लखनऊ की ओर आ रही थी। लखनऊ के पास पहुंचने के दौरान विमान करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर था। इसी दौरान इलाके में खराब मौसम था और विमान आसमानी बिजली की चपेट में आ गया। बिजली गिरने के बाद विमान के अगले हिस्से यानी नोज़ कोन में नुकसान दिखाई दिया। इसके बावजूद विमान अपनी उड़ान जारी रखने में सफल रहा और सुरक्षित रूप से लखनऊ एयरपोर्ट पर उतर गया। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि इतनी तेज बिजली गिरने के बाद भी विमान में बैठे लोग सुरक्षित कैसे रहे? इसका जवाब विमान की शानदार इंजीनियरिंग और ‘फैराडे केज’ सिद्धांत में छिपा है।

क्या है फैराडे केज सिद्धांत 
फैराडे केज एक ऐसा वैज्ञानिक सिद्धांत है, जिसमें किसी वस्तु की बाहरी सतह बिजली के चार्ज को अपने ऊपर से होकर गुजरने देती है, लेकिन अंदर मौजूद लोगों और उपकरणों को उसके असर से काफी हद तक बचाती है। कमर्शियल विमानों को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि अगर उन पर बिजली गिर भी जाए, तो उसका विद्युत प्रवाह विमान के अंदर बैठे यात्रियों तक न पहुंचे। विमान की बाहरी बॉडी एक तरह से सुरक्षात्मक खोल का काम करती है।

विमान पर बिजली गिरने के बाद करंट कहां जाता है
जब आसमानी बिजली विमान से टकराती है, तो बिजली का करंट आमतौर पर विमान की बाहरी सतह के रास्ते आगे बढ़ता है। विमान की बॉडी में इस्तेमाल होने वाली धातु और कुछ कंपोजिट हिस्सों में कंडक्टिव यानी बिजली को प्रवाहित करने वाली परतें या कॉपर की जाली लगाई जाती है।

बिजली विमान के एक हिस्से से प्रवेश करने के बाद बाहरी सतह के रास्ते आगे बढ़ती है और फिर विमान के पीछे लगे स्टैटिक डिस्चार्ज विक्स के जरिए वातावरण में वापस निकल जाती है।इस पूरी प्रक्रिया के दौरान बिजली को केबिन के अंदर जाने से रोकने की कोशिश की जाती है। यही वजह है कि बिजली के बहुत शक्तिशाली झटके के बावजूद विमान के अंदर बैठे यात्रियों को आमतौर पर कोई नुकसान नहीं होता।

फैराडे केज अंदर बैठे लोगों को कैसे बचाता है
फैराडे केज के सिद्धांत में बिजली का चार्ज मुख्य रूप से बाहरी सतह पर फैल जाता है। जब विमान पर बिजली गिरती है तो विमान की बाहरी कंडक्टिव सतह उस बिजली को अपने ऊपर से आगे ले जाती है। इससे विमान के अंदर का विद्युत प्रभाव काफी हद तक नियंत्रित रहता है। आसान भाषा में समझें तो विमान की बाहरी बॉडी एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। बिजली बाहर से विमान पर पड़ती है, बाहर की सतह से गुजरती है और फिर विमान के दूसरे हिस्से से बाहर निकल जाती है।

फैराडे केज का नाम कहां से आया
इस सिद्धांत का नाम प्रसिद्ध वैज्ञानिक माइकल फैराडे के नाम पर रखा गया है। फैराडे ने 1836 में इस सिद्धांत को प्रदर्शित किया था। उनके प्रयोगों से यह समझने में मदद मिली कि किसी बंद कंडक्टिव संरचना के अंदर बाहरी विद्युत क्षेत्र का प्रभाव किस तरह कम या खत्म हो सकता है। आज इसी सिद्धांत का इस्तेमाल कई आधुनिक तकनीकों और सुरक्षा प्रणालियों में किया जाता है।

फिर विमान की नाक ही क्यों टूट गई?
अब सवाल यह है कि अगर विमान की बॉडी बिजली से बचाने के लिए इतनी मजबूत है, तो फिर विमान का नोज़ कोन ही क्यों क्षतिग्रस्त हुआ? इसका कारण विमान की नाक के अंदर लगा वेदर रडार है। विमान के सबसे आगे लगे शंकु के आकार के हिस्से को नोज़ कोन या रेडोम (Radome) कहा जाता है। इसके अंदर मौसम की जानकारी देने वाला रडार लगा होता है। यही रडार पायलटों को सामने मौजूद तूफानी बादलों और खराब मौसम का पता लगाने में मदद करता है।

रेडोम में धातु का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता?
विमान की बाकी बॉडी में धातु या ऐसी कंपोजिट सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें बिजली को नियंत्रित तरीके से प्रवाहित करने वाली परत मौजूद हो सकती है। लेकिन रेडोम को इस तरह बनाना पड़ता है कि रडार की माइक्रोवेव सिग्नल उसके आर-पार जा सकें। अगर रेडोम के सामने मोटी धातु की परत लगा दी जाए, तो वह रडार सिग्नल को रोक सकती है। इससे पायलटों को सामने मौजूद खराब मौसम और तूफानी बादलों की सही जानकारी मिलने में परेशानी हो सकती है। इसी कारण रेडोम आमतौर पर फाइबरग्लास या विशेष कंपोजिट सामग्री से बनाया जाता है।

बिजली गिरने पर रेडोम को ज्यादा नुकसान क्यों हो सकता है?
रेडोम में विमान की बाकी बॉडी जैसी लगातार कंडक्टिव धातु की परत नहीं होती। इस वजह से जब बिजली सीधे विमान की नाक के इस हिस्से से टकराती है, तो वहां बहुत ज्यादा गर्मी और इलेक्ट्रिकल आर्क पैदा हो सकता है।

इसके कारण रेडोम की बाहरी सतह में दरार आ सकती है। सतह जल या पिघल सकती है। छेद हो सकता है। संरचनात्मक नुकसान हो सकता है। यानी रेडोम विमान का एक ऐसा हिस्सा है जहां रडार को काम करने देने और बिजली से सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।

फिर विमान सुरक्षित कैसे उतर गया
रेडोम को नुकसान होने के बावजूद विमान के बाकी महत्वपूर्ण हिस्से और यात्रियों वाला केबिन सुरक्षित रहे। विमान की इंजीनियरिंग इस तरह की जाती है कि बिजली का असर मुख्य रूप से विमान की बाहरी संरचना तक सीमित रहे और उसे नियंत्रित तरीके से विमान से बाहर निकाला जा सके। यही वजह है कि 17 हजार फीट की ऊंचाई पर बिजली गिरने जैसी डरावनी घटना के बाद भी फ्लाइट सुरक्षित रूप से लखनऊ पहुंच सकी।

हालांकि बिजली गिरने के बाद विमान की पूरी तकनीकी जांच जरूरी होती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विमान के किसी अन्य हिस्से, वायरिंग या सिस्टम को नुकसान तो नहीं हुआ है।