“आधी रात नदी से सरसराहट की आवाज आती है, लगता है पूरा परिवार ही नदी में समा जाएगा। गंडक के डर से रातभर जागकर तंबू में गुजार रहे हैं, दो दिन पहले अफसर लोग आए थे, चूरा-मिट्ठा दे गए। वही खाकर बच्चे और पूरा परिवार रह रहे हैं। 40 सालों में हमने जो कुछ भी ब
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बगहा के चिरुअही पंचायत के रहने वाले महेश साह ने दैनिक भास्कर से बातचीत में ये बातें कही। बगहा में बीते 3 दिनों से गंडक अपनी धारा बदल रही है, जिससे कटाव तेज हो गया है, अब तक 109 घर और एक स्कूल पानी में समा चुके हैं।
अंचलाधिकारी नंदलाल राम ने बताया कि लोगों को ऊंचे स्थानों पर बसाया जा रहा है। जल्दी ही सबकुछ ठीक कर लिया जाएगा।
ऐसे में सवाल है कि बगहा में गंडक नदी की धारा हर साल क्यों बदल जाती है? बीते पांच सालों में कितने घर नदी में समा गए? प्रशासन ने अब तक कोई परमानेंट तैयारियां क्यों नहीं की? जिनके घर नदी में गए, वे किस हाल में हैं हैं? पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

गंडक के कटाव से लोग परेशान हैं।
गंडक घर-खेतों को निगल रहीः ग्रामीण
बगहा अनुमंडल के मधुबनी प्रखंड की चिउरही पंचायत में गंडक नदी का कटाव लगातार तेज होता जा रहा है। ग्रामीण सुरेश ने बताया, “नदी की धारा अब गांव के घरों और खेतों को निगलने के बाद पैक्स गोदाम के करीब पहुंच गई है।
सरकारी स्कूल का पूरा भवन नदी में समा चुका है। हमलोगों को डर है कि कटाव नहीं रुका तो गंडक की धारा धनहा-रतवल मुख्य मार्ग तक पहुंच सकती है। हमारे गांव में कटाव की भयावहता आपको साफ दिखेगी।
कहीं खेत का नामोनिशान नहीं है, कहीं घरों की जगह सिर्फ मलबा और पानी नजर आ रहा है। जिन परिवारों के पास कभी अपनी जमीन और घर था, वे अब प्लास्टिक के तंबू में रहने को मजबूर हैं।”
40 साल से बसे थे, फिर उजड़ गया घर-खेत
वहीं, कटाव की मार झेल रहे 85 साल के महेश साह और उनकी 80 साल की पत्नी शिवकली देवी की जिंदगी में यह पहली बार नहीं है, जब उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा है। दोनों के पांच बेटे और करीब 28 नाती-पोते हैं। करीब तीन एकड़ खेती योग्य जमीन, फसल और उनका आवास गंडक में समा चुका है।
महेश साह बताते हैं, “मैं पिछले 40 साल से चिउरही के रेवहिया में रह रहा हूं। इससे पहले भी गंडक के कटाव के कारण मुझे करीब 10 जगहों से विस्थापित होना पड़ा था। रेवहिया मेरे लिए 11वां ठिकाना था। यहां मैं खेती-बाड़ी कर परिवार का पालन-पोषण कर रहा था।”

पहले खेत कटा और फिर घर कट गया। अब हम लोग भूखे रहने को मजबूर हैं। 40 साल से यहां बसे हुए थे, कभी कोई दिक्कत नहीं हुई। अपनी खेती के अलावा दूसरे लोगों की जमीन भी रेहन और बटाई पर लेकर खेती करते थे। आज हालत यह है कि प्लास्टिक के तंबू में किसी तरह जिंदगी काट रहे हैं। गंडक के डर से रातभर जागना पड़ता है।


गंडक के कटाव में लोगों के घर-खेत बह जा रहे हैं।
स्कूल नदी में समाया, बच्चों की पढ़ाई पर संकट
गंडक के कटाव ने सिर्फ लोगों के घर और खेत नहीं छीने हैं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई भी संकट में डाल दी है। सरकारी स्कूल का पूरा भवन नदी में समा चुका है। अब बच्चों के सामने सवाल है कि वे पढ़ने कहां जाएं।
5वीं क्लास के नितेश कुमार के लिए घर और खेत के साथ स्कूल का छिन जाना भी बड़ी चिंता है। 11 साल के नितेश कुमार ने कहा, “स्कूल का आधा हिस्सा नदीं में समा गया है। हम लोग कैसे पढ़ेंगे और कहां जाएंगे? घर, खेत और स्कूल सब कट गया है। अब हम कैसे रहेंगे और पढ़ाई कहां करेंगे?”
शादी के बाद बनाया था घर, अब बच्चों के भविष्य की चिंता
42 साल की सीमा देवी का परिवार भी कटाव की मार झेल रहा है। सीमा देवी कहती हैं, “20 साल पहले मेरी शादी चिउरही में हुई थी। तब से मैं अपने ससुराल में रह रही हूं। मेरे पति किसान हैं और खेती-बाड़ी करके परिवार चलाते हैं।
हमारा जीवन सुखी चल रहा था। अब घर कट गया और खेत भी घट गया। समझ नहीं आ रहा कि जीवन कैसे कटेगा। बाल-बच्चों को कैसे पढ़ाएंगे और उनका भविष्य कैसे बनाएंगे। प्रशासन से हमारी मांग है कि हमें पुनर्वास दिया जाए।
मेरे पांच बच्चे हैं, उन्हें कैसे पढ़ाऊंगी, कैसे पालूंगी? गंडक नदी ने हमारी सारी खुशियां छीन ली हैं।”

कटाव के कारण लोग टेंट में रहने को मजबूर हैं।
स्कूल के बाद पैक्स गोदाम पर मंडराया खतरा
चिउरही में कटाव की रफ्तार का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सरकारी स्कूल के बाद अब नदी की धारा पैक्स गोदाम के करीब पहुंच गई है। ग्रामीणों को डर है कि अगर कटाव इसी तरह जारी रहा तो अगला निशाना धनहा-रतवल मुख्य मार्ग हो सकता है।
ग्रामीण दीनानाथ यादव, शिवनाथ, राजेश राम और पलक भारती का कहना है कि कटाव रोकने के लिए लगाए गए जिओ बैग भी गंडक की तेज धारा में बह जा रहे हैं। मंगलवार को SDM चांदनी कुमारी ने कटाव स्थल का निरीक्षण किया था और आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया था, लेकिन इसके बाद भी कटाव जारी है।
109 घर और एक स्कूल नदी में विलीन
मधुबनी के अंचलाधिकारी नंदलाल राम के अनुसार, अब तक चिउरही पंचायत में 109 घर और एक सरकारी स्कूल नदी में विलीन हो चुके हैं। कटाव प्रभावित परिवारों के लिए राशन और पॉलीथिन शीट की व्यवस्था की जा रही है।
सीओ नंदलाल राम ने कहा, “पुनर्स्थापन के लिए पॉलीथिन शीट और राशन की व्यवस्था की जा रही है। पुनर्वास के लिए ऊंचे स्थानों पर लोगों को बसाया जा रहा है।
गृहक्षति मद में जो भी सहायता होगी, वह नियमानुसार दी जाएगी। अभी तक 109 घरों का सनहा प्राप्त हुआ है। कुछ और लोगों के घर कटे हैं, इसलिए यह संख्या बढ़ सकती है।”

आंकड़े मधुबनी सीओ नंदलाल राम के अनुसार।
जिनके घर नदी में समाए वे लोग अब कहां
गंडक नदी हर साल अपने जद में सैकड़ों घरों और लोगों की जमीन को ले रही है। अनीता राम बताती हैं कि जिन परिवारों के घर और खेत नदी में समा जाते हैं, उनके सामने सबसे बड़ी समस्या रोजी-रोटी की हो जाती है। सरकार की ओर से पुनर्वास और दोबारा बसाने का भरोसा तो दिया जाता है, लेकिन समय पर मदद नहीं मिलने से परिवारों की मुश्किलें बढ़ती जाती हैं।
घर उजड़ने के बाद बच्चों की पढ़ाई, खाने-पीने और रहने तक का इंतजाम करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में मजबूर होकर लोग अपने बच्चों के साथ दिल्ली, पंजाब और दूसरे शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं। वहां मजदूरी करके किसी तरह परिवार का गुजारा चलाते हैं।
धीरे-धीरे वहीं काम और रहने की व्यवस्था बन जाती है और फिर गांव लौटना मुश्किल हो जाता है। अनीता कहती हैं कि साल दर साल यही सिलसिला चल रहा है। नदी कटाव के साथ घर-जमीन छूटती जा रही है और लोग अपने गांव से दूर होते जा रहे हैं। अब हमलोग भी इसी मजबूरी में पलायन करने को मजबूर हो गए हैं।