विश्वकर्मा पूजा के दिन कार्यक्षेत्र, मशीनों और औजारों की पूजा करके उनके प्रति आभार जताया जाता है। इस लेख में जानिए पूजा का सही समय, सरल पूजन विधि और इस दिन ध्यान रखने योग्य जरूरी नियम।
Vishwakarma Puja Vidhi : ग्रहों के राजा सूर्य के सिंह राशि छोड़कर कन्या राशि में प्रवेश करते ही आज देशभर के औद्योगिक प्रतिष्ठानों, कारखानों और निर्माण स्थलों पर देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा की आराधना शुरू हो चुकी है।
देवशिल्पी के जन्मोत्सव यानी विश्वकर्मा जयंती (Vishwakarma Jayanti) पर इस बार कन्या संक्रांति का विशेष संयोग बना है। आज के दिन कलम, छेनी-हथौड़े से लेकर भारी औद्योगिक क्रेन और टरबाइनों तक को नमन किया जाता है।
हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मांड का प्रथम वास्तुकार और तकनीकी सृजन का मुख्य अधिष्ठाता स्वीकार किया गया है।
शुभ चौघड़िया और राहुकाल का समय
ज्योतिषीय गणना के अनुसार 17 सितंबर को कन्या संक्रांति का मुख्य पुण्य काल सुबह 07:58 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक प्रभावी रहेगा। इस समयावधि में पूजा-अर्चना करना सर्वश्रेष्ठ फलदायी माना गया है।
यदि आप चौघड़िया देखकर अनुष्ठान करना चाहते हैं, तो सुबह 10:12 बजे से दोपहर 02:47 बजे तक चर, लाभ और अमृत की शुभ चौघड़िया उपलब्ध रहेगी। इसमें भी विशेष रूप से दोपहर 12:16 से 01:48 बजे तक अमृत चौघड़िया का समय अति उत्तम है।
मध्याह्न में दोपहर 11:51 से 12:40 बजे तक का अभिजीत मुहूर्त भी प्रतिष्ठानों के उद्घाटन या नए औजारों के पूजन के लिए श्रेष्ठ माना गया है। शाम के समय पूजा करने वालों के लिए 04:52 से 06:24 बजे तक का मुहूर्त अनुकूल रहेगा।
लेकिन एक जरूरी सावधानी बरतें—दोपहर 01:48 बजे से लेकर 03:20 बजे तक राहुकाल का पहरा रहेगा। धर्मग्रंथों के अनुसार राहुकाल के दौरान किसी भी नई मशीनरी का शुभारंभ या वैदिक संकल्प पूजा वर्जित मानी जाती है।
पौराणिक निर्माण और औजारों की वंदना का रहस्य
धार्मिक इतिहास में दर्ज है कि सतयुग का स्वर्गलोक हो, त्रेतायुग की स्वर्ण लंका या फिर द्वापर में समुद्र के बीच रची गई भगवान श्रीकृष्ण की भव्य द्वारका नगरी—इन तमाम दिव्य नगरों और अजेय संरचनाओं का खाका भगवान विश्वकर्मा ने ही खींचा था।
कुबेर के पुष्पक विमान और भगवान शिव के त्रिशूल से लेकर सुदर्शन चक्र तक का दिव्य निर्माण भी विश्वकर्मा के शिल्प-कौशल की ही देन है।
यही कारण है कि निर्माण, खनन, परिवहन और सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े लोग आज अपने उपकरणों को महज धातु का ढांचा नहीं, बल्कि ईश्वरीय ऊर्जा का विस्तार मानकर पूजते हैं।
शिल्पियों का अटूट विश्वास है कि जिन साधनों से आजीविका चलती है, उनके प्रति सम्मान प्रकट करने से कार्यक्षेत्र में तकनीकी खराबी, अचानक होने वाले हादसों और उत्पादन बाधाओं में कमी आती है।
कार्यस्थल पर प्रामाणिक पूजन विधि
- पूजा शुरू करने से पहले वर्कशॉप या दफ्तर की गहन सफाई जरूरी है। कार्यस्थल से जंग लगा कबाड़ और अनुपयोगी कचरा हटाकर जल और गंगाजल का छिड़काव करें।
- सबसे पहले सूर्य देव को तांबे के लोटे से जल अर्पित करें।
- चौकी पर पीला या लाल वस्त्र बिछाकर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- कारखाने की मुख्य मशीनों, वाहनों और हाथ के औजारों पर रोली, अक्षत और चंदन का तिलक लगाएं और कलावा बांधें।
- देवशिल्पी को श्वेत और पीले पुष्प, धूप, दीप, ऋतु फल, मिष्ठान्न और पंचामृत का भोग लगाएं।
- अनुष्ठान के समय निरंतर ‘ॐ आधार शक्तपे नमः’ और ‘ॐ विश्वकर्मणे नमः’ मंत्र का उच्चारण करते रहें।
- अंत में कर्पूर अथवा शुद्ध घी के दीपक से विश्वकर्मा जी की आरती उतारकर सभी कर्मचारियों में प्रसाद वितरित करें।
मशीनों को विश्राम देने की परंपरा
औद्योगिक परंपरा के तहत विश्वकर्मा पूजा के दिन उत्पादन कार्य बंद रखकर मशीनों को पूर्ण विश्राम दिया जाता है। इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक और व्यावहारिक तर्क है—निरंतर चलने वाले कल-पुर्जों की सालाना सर्विसिंग, रखरखाव और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना।
जो उद्योग निरंतर पाली (24×7 शिफ्ट) में चलते हैं, वहां भी औपचारिक पूजन के समय प्रतीकात्मक रूप से औजारों का उपयोग कुछ देर रोक दिया जाता है। इस दिन तामसिक भोजन और व्यसनों से दूर रहकर कार्यस्थल पर परस्पर सहयोग का वातावरण बनाए रखने का विधान है।