केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए समान नागरिक संहिता (UCC) पर केंद्र सरकार का स्पष्ट रोडमैप सामने रखा. शाह ने घोषणा की कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश के सभी 21 एनडीए शासित राज्यों में यूसीसी को चरणबद्ध तरीके से लागू कर दिया जाएगा.
शाह ने कहा कि तीन तलाक कानून की सफलता के बाद मुस्लिम महिलाओं को बराबरी और न्याय दिलाने के लिए यह जरूरी कदम है. कानूनी नजरिए से केंद्र इसे सीधे राष्ट्रीय स्तर पर थोपने के बजाय संविधान की समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 (विवाह, संपत्ति व उत्तराधिकार) के जरिए राज्यों के रास्ते लागू करने की व्यावहारिक रणनीति पर काम कर रहा है.
TDP ने UCC पर अमित शाह के बयान का समर्थन क्यों किया?
केंद्र की एनडीए सरकार में 16 सांसदों के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही तेलुगु देशम पार्टी (TDP) का रुख इस पूरे मामले में बेहद अहम माना जा रहा था. लोकसभा में टीडीपी के नेता लावु श्रीकृष्ण देवरायालु ने पार्टी की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि टीडीपी सैद्धांतिक रूप से इस सुधार के समर्थन में है.
हालांकि, टीडीपी ने इस समर्थन के साथ एक जरूरी शर्त भी जोड़ी है. आंध्र प्रदेश के सामाजिक ताने-बाने और मुस्लिम आबादी के हितों को देखते हुए पार्टी ने कहा है कि राज्य स्तर पर किसी भी कानूनी बदलाव से पहले सभी धार्मिक, सामाजिक और क्षेत्रीय हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श (Consultation) अनिवार्य रूप से किया जाएगा.
यूसीसी पर एकनाथ शिंदे का समर्थन, बताया बालासाहेब का सपना
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने 2029 से पहले 21 एनडीए शासित राज्यों में यूसीसी लागू करने के अमित शाह के बयान का खुलकर समर्थन किया है. न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार मुंबई में बोलते हुए शिंदे ने कहा कि 'एक देश, एक कानून' और सभी के लिए समान न्याय की अवधारणा शिवसेना संस्थापक दिवंगत बालासाहेब ठाकरे का प्रमुख संकल्प था, जिसे केंद्र सरकार आगे बढ़ा रही है. उन्होंने स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र की महायुति सरकार यूसीसी को लेकर पूरी तरह सकारात्मक है और मसौदा समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद उचित समय पर इस पर ठोस निर्णय लिया जाएगा; हालांकि, एनडीए के दूसरे प्रमुख सहयोगी जेडीयू ने बिहार में इसे लागू करने पर अपना विरोध दोहराया है
JDU का रुख क्यों है अलग, बिहार में क्या होगा
एनडीए के दूसरे सबसे बड़े सहयोगी जनता दल यूनाइटेड (JDU), जिसके पास 12 लोकसभा सांसद हैं, ने इस मुद्दे पर बहुत नपा-तुला और सतर्क रुख अपनाया है. जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने स्पष्ट किया कि पार्टी पहले प्रस्तावित यूसीसी विधेयक के पूरे कानूनी प्रारूप का अध्ययन करेगी, जिसके बाद ही कोई अंतिम रुख तय होगा.
पार्टी नेता श्याम रजक ने भी संकेत दिया कि बिहार के सामाजिक समीकरणों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. बिहार में लगभग 18 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, जिसका राज्य की राजनीति में बड़ा असर है. नीतीश कुमार ने हमेशा यह रुख रखा है कि यूसीसी जैसे संवेदनशील मुद्दे को थोपने के बजाय सभी पक्षों में आम सहमति बनाई जानी चाहिए, जिससे किसी समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत न हों.
UCC लागू होने पर किन नागरिक कानूनों में बदलाव संभव है
संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत परिकल्पित समान नागरिक संहिता लागू होने पर आम नागरिकों से जुड़े कई निजी कानूनों में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे:
विवाह और तलाक: बहुविवाह और निकाह हलाला जैसी प्रथाओं पर रोक लगेगी, शादी का अनिवार्य कानूनी पंजीकरण होगा और सभी धर्मों में शादी की न्यूनतम कानूनी उम्र एक समान होगी.
उत्तराधिकार और संपत्ति: पैतृक और अर्जित संपत्ति में बेटे और बेटी को बराबर कानूनी अधिकार मिलेगा. पर्सनल लॉ बोर्ड्स के तहत संपत्ति विभाजन के अलग-अलग नियमों की जगह निष्पक्ष कानून लागू होगा.
गोद लेना और भरण-पोषण: धर्म की सीमाओं से परे जाकर हर नागरिक को कानूनी प्रक्रिया के तहत बच्चा गोद लेने का अधिकार मिलेगा. तलाक की स्थिति में निष्पक्ष गुजारा भत्ता सुनिश्चित होगा.
जनजातीय परंपराओं का संरक्षण: उत्तराखंड मॉडल की तर्ज पर 21 राज्यों के प्रस्तावित प्रारूप में अनुसूचित जनजातियों (ST) के पारंपरिक रीति-रिवाजों और प्रथागत कानूनों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखा गया है.
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