अगर आप यश के फैन हैं तो मेरा यह रिव्यू शायद आपको गुस्सा दिला सकता है. ‘टॉक्सिक’ का ट्रेलर देखते हुए मुझे यश का स्टारडम, स्वैग और एक्शन तो जबरदस्त लगा, लेकिन करीब चार मिनट बाद एक सवाल लगातार मन में रहा—क्या कहानी से ज्यादा यहां हिंसा, सेक्सुअल इमेजरी और शॉक वैल्यू बेचने की कोशिश हो रही है? और कहीं-कहीं इसे देखते हुए मुझे रणबीर कपूर की ‘Animal’ को लेकर हुई बहस भी याद आई.
यश का स्टारडम जबरदस्त, लेकिन कहानी कहां है?
‘केजीएफ’ के बाद यश सिर्फ अभिनेता नहीं, एक ब्रांड बन चुके हैं. ‘टॉक्सिक’ के ट्रेलर में भी उनका हर लुक, हर एक्शन और हर एटीट्यूड उसी स्टारडम को भुनाता नजर आता है. स्क्रीन पर यश आते हैं तो नजरें टिक जाती हैं.
मुझे उनका यह अंदाज पसंद आया, लेकिन ट्रेलर खत्म होने के बाद मेरे दिमाग में सबसे बड़ा सवाल यही था—आखिर कहानी क्या है?
करीब चार मिनट के ट्रेलर में अपराध, हिंसा, ग्लैमर, रिश्ते और रहस्यमयी किरदारों की भरमार है. विजुअल्स बड़े हैं और एक्शन भी दमदार है, लेकिन इन सबको जोड़ने वाली कहानी की झलक बहुत कम मिलती है. ट्रेलर उत्सुकता जरूर पैदा करता है, लेकिन मेरे लिए एक्साइटमेंट के साथ कन्फ्यूजन भी छोड़ जाता है.
क्या ‘टॉक्सिक’ जानबूझकर भड़का रही है?
यहीं से बात ‘रेजबेट’ मार्केटिंग तक पहुंचती है. रेजबेट यानी ऐसा कंटेंट जो दर्शकों को जानबूझकर चौंकाए, नाराज करे या असहज करे, ताकि लोग उसके बारे में सोशल मीडिया पर बात करें. ‘टॉक्सिक’ के प्रमोशनल विजुअल्स को देखते हुए मुझे लगता है कि मेकर्स विवाद से बचने की कोशिश नहीं कर रहे.
हिंसा, सेक्सुअल इमेजरी और शॉकिंग विजुअल्स ट्रेलर में खूब हैं. इसका फायदा यह है कि फिल्म पर चर्चा होगी. लोग तारीफ करेंगे तो भी चर्चा, आलोचना करेंगे तो भी चर्चा.
लेकिन सवाल यह है कि क्या विवाद टिकट बेच सकता है? शुरुआत जरूर दिला सकता है, लेकिन फिल्म को टिकाने के लिए कहानी चाहिए.
‘Animal’ की याद क्यों आई?
यहां रणबीर कपूर की ‘Animal’ का जिक्र जरूरी है. दोनों फिल्मों की कहानी या किरदार एक जैसे नहीं हैं, लेकिन दोनों को देखते हुए एक समान बहस सामने आती है—क्या आक्रामक और हिंसक पुरुष किरदार को ‘कूल’ दिखाना आज के सिनेमा में एक मार्केटिंग टूल बन चुका है?
‘Animal’ ने अपनी हिंसा, जहरीली मर्दानगी और महिलाओं के चित्रण को लेकर जबरदस्त बहस छेड़ी थी. फिल्म के पक्ष और विपक्ष में जितनी चर्चा हुई, उतनी ही उसकी पॉपुलैरिटी बढ़ी.
‘टॉक्सिक’ भी कुछ ऐसे ही विवाद की जमीन तैयार करती दिख रही है. फर्क इतना है कि यहां कहानी को छिपाकर विजुअल्स और शॉक वैल्यू को ज्यादा आगे रखा गया है.
महिला किरदारों पर भी सवाल
ट्रेलर में कियारा आडवाणी, नयनतारा, हुमा कुरैशी, रुक्मिणी वसंत और तारा सुतारिया नजर आती हैं. कियारा का किरदार ग्लैमरस और बोल्ड है, जबकि नयनतारा कहानी में अहम भूमिका में दिखती हैं.
लेकिन ट्रेलर देखकर मेरे मन में सवाल आया—क्या ये महिला किरदार अपनी स्वतंत्र पहचान रखते हैं या फिर यश की दुनिया को और आकर्षक बनाने का जरिया हैं? इसका जवाब फिल्म देखने के बाद ही मिलेगा. हालांकि, ‘Animal’ के बाद दर्शक इस तरह के चित्रण को लेकर पहले से ज्यादा सवाल पूछते हैं.
यश की सबसे बड़ी ताकत, सबसे बड़ा रिस्क
यश की स्क्रीन प्रेजेंस ‘टॉक्सिक’ की सबसे बड़ी ताकत है. लेकिन यही सबसे बड़ा रिस्क भी है. ‘केजीएफ’ के बाद दर्शक उनसे सिर्फ स्वैग और एक्शन नहीं, एक नई कहानी की उम्मीद करते हैं. ट्रेलर में यश को देखकर रॉकी भाई की याद आना स्वाभाविक है, लेकिन इस बार उन्हें उस छवि से आगे निकलना होगा.
सच कहूं तो ट्रेलर ने मुझे फिल्म के लिए उत्साहित किया है, लेकिन पूरी तरह आश्वस्त नहीं.
यश शानदार हैं, विजुअल्स बड़े हैं, एक्शन दमदार है और विवाद के लिए मसाला भी मौजूद है. लेकिन कहानी अभी भी पर्दे के पीछे है.
मेरे लिए ‘टॉक्सिक’ का सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह सिर्फ यश के स्टारडम, हिंसा और शॉक वैल्यू पर टिकी फिल्म है या इन सबके पीछे एक ऐसी कहानी भी है, जो सिनेमाघर से बाहर निकलने के बाद याद रहेगी?