​Supreme Court on Illegal Chambers: अवैध निर्माण हटाने ही होंगे, लखनऊ में वकीलों के 72 चैंबरों पर सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका - Haribhoomi

Published on 25 अग॰ 2026

लखनऊ जिला अदालत परिसर के आसपास सार्वजनिक जमीन पर बने वकीलों के 72 अवैध चैंबरों को हटाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सेंट्रल बार एसोसिएशन की याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट के निर्देश में दखल देने से इनकार कर दिया है।

Supreme Court (file photo)

सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

  • Published: 25 Aug 2026, 05:16 PM IST
  • Last Updated: 25 Aug 2026, 05:16 PM IST

लखनऊ जिला अदालत परिसर के आसपास सार्वजनिक जमीन और मुख्य मार्गों पर अतिक्रमण कर बनाए गए वकीलों के अवैध चैंबरों और निर्माणों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ की याचिका खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के ध्वस्तीकरण व नोटिस संबंधी आदेश में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया है। इस फैसले के बाद अदालत परिसर के आसपास से अतिक्रमण हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई तेज होने का रास्ता साफ हो गया है।

​बार एसोसिएशन का पद अवैध कब्जे का अधिकार नहीं देता

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि बार एसोसिएशन में किसी पद पर होना किसी को भी अनधिकृत और अवैध निर्माण करने या उसे जारी रखने का अधिकार नहीं देता। पीठ ने सवाल किया कि जब निर्माण मुख्य सड़क या आम जनता की सार्वजनिक जमीन पर किया गया है, तो उसे संरक्षण कैसे दिया जा सकता है। अदालत ने दो टूक कहा कि अवैध कब्जे पर रोक लगाने का कोई विधिक आधार नहीं है।

​सड़क व यातायात बाधित होने पर जताई गंभीर नाराजगी

इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपने दो साल के कार्यकाल का अनुभव साझा करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि उन्होंने खुद वहां की जमीनी स्थिति देखी है। सार्वजनिक सड़कों के किनारे बने अवैध ढांचों से रास्ते बंद होते हैं और आम जनता का आवागमन बुरी तरह प्रभावित होता है। पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए किसी सार्वजनिक जमीन पर कब्जा बरकरार नहीं रखा जा सकता क्योंकि वहां वकीलों के चैंबर बने हुए हैं।

​मध्यस्थता और वैकल्पिक जगह की मांग खारिज

सुनवाई के दौरान प्रभावित वकीलों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आदिश अग्रवाला ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने और वकीलों को चैंबर के लिए वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रखा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। जस्टिस नाथ ने टिप्पणी की कि सार्वजनिक संपत्ति पर किए गए अवैध अतिक्रमण के मामलों में मध्यस्थता का कोई औचित्य नहीं बनता।

​अदालत परिसरों की सुरक्षा पर उठाए सवाल

पीठ ने अदालतों और उनके आसपास के इलाकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए कहा कि अगर कोर्ट परिसर के इर्द-गिर्द ही अनियंत्रित अतिक्रमण होने लगेगा, तो सुरक्षा व्यवस्था कैसे कायम रहेगी। जस्टिस नाथ ने एक जिला अदालत के दौरे का वाकया साझा करते हुए बताया कि वहां एक वकील ने जिला जज के लिए आरक्षित पार्किंग स्पेस पर ही अपना चैंबर बना लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा संदेश दिया कि अदालत परिसरों में किसी भी प्रकार के अवैध कब्जे को किसी पद, पेशे या रसूख के आधार पर संरक्षण नहीं दिया जाएगा।