कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के सफल जंतर-मंतर प्रदर्शन के बाद शिक्षा व्यवस्था और स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर Gen Z और Gen Alpha के छात्रों की आवाज़ अब देश के अलग-अलग हिस्सों में सड़कों पर सुनाई देने लगी है। इसी को देखते हुए कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सोमवार, 10 अगस्त 2026 को गांवों के सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान की घोषणा की। यह अभियान 15 अगस्त से शुरू किया जाएगा।
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यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश के अलग-अलग जिलों में स्कूल की व्यवस्था (फोटो साभार: खबर लहरिया)
हाल ही में हमीरपुर, राजस्थान, फतेहपुर और उत्तराखंड से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो से साफ जाहिर होता है कि नई पीढ़ी अब शिक्षा और स्कूलों से जुड़ी अव्यवस्थाओं को चुपचाप स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
ग्रामीण इलाकों की तस्वीर भी इससे अलग नहीं है। ‘खबर लहरिया’ ने उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के कई गांवों से की गई अपनी रिपोर्टिंग में सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों, स्कूल तक पहुंचने के खराब रास्तों, बुनियादी सुविधाओं की कमी, असुविधाओं और यहां तक कि शौचालय जैसी जरूरी व्यवस्था की कमी को सामने रखा है। ये हालात सिर्फ बच्चों की पढ़ाई को प्रभावित नहीं करते, बल्कि उनके लिए एक सुरक्षित और सम्मानजनक शैक्षणिक माहौल पर भी सवाल खड़े करते हैं।
15 अगस्त से ‘स्कूल ठीक करो अभियान’
इन लगातार सामने आ रही समस्याओं और नई पीढ़ी के बढ़ते सवालों के बीच कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सोमवार, 10 अगस्त 2026 को ग्रामीण सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान की घोषणा की। अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया X पर वीडियो के माध्यम से बच्चों द्वारा किए जा रहे प्रदर्शन और स्कूल में बेहतर व्यवस्था को लेकर बात की। उन्होंने कहा “15 अगस्त को हमारा 80वां स्वत्रंता दिवस है। 80 सालों में सबसे ज्यादा कोई चीज नज़रअंदाज की गई है तो वो है सरकारी स्कूल। जब हमने नया पीएम हाउस बना दिया, नया पार्लियामेंट बना दिया लेकिन एक नया स्कूल नहीं बना पाए। इस साल अगर नई शुरुआत करनी है तो सरकारी स्कूल ठीक करने चाहिए। सरपंच लोगों से भी अपील है कि उनके पास मौका है कि वे अपने गांव में स्कूल ठीक कराए। इसके साथ ही अभिभावक स्कूलों की निगरानी करें। अपने बच्चों के स्कूल जाए वहां की व्यवस्था देखे।” आप उन्हें वीडियो में सुन सकते हैं।
This Independence Day, let’s pledge to improve the Govt Schools in our villages. pic.twitter.com/fZyRrmoNhu
— Abhijeet Dipke (@abhijeet_dipke) August 10, 2026
सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति
सरकारी स्कूलों में किस तरह व्यवस्था की कमी है यह किसी से छिपा नहीं है। इस साल मीडिया में कई ऐसी तस्वीरें है जो हाईलाइट हुईं। इनमें सबसे ज्यादा मिड-डे मील में मिलने वाला भोजन सुर्खियों में रहा। उदाहरण के तौर पर हाल ही में यूपी के हरदोई के एक सरकारी स्कूल में छात्रों को मिड-डे मील के तौर पर जले हुए चावल परोसे गए और पानी जैसी पतली दाल दी गई।
At a govt school in UP’s Hardoi, burnt rice was served as mid-day-meal to students. https://t.co/zke0czj5lu pic.twitter.com/hhEm2c4UmF
— Piyush Rai (@Benarasiyaa) August 12, 2026
वहीं फरवरी 2026 को यूपी के महोबा से खबर आई थी कि मिड-डे मील में दिया जा रहे दूध में पानी की अधिक मात्रा दी जाती है। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।

महोबा का वह स्कूल जहां दूध में मिलावट का वीडियो सामने आया था। (फोटो साभार: खबर लहरिया)
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि किस तरह से चार लीटर पानी में एक लीटर दूध मिलाकर बच्चों को दिया जा रहा है। खबर लहरिया की नीचे दी गई रिपोर्ट में इस पूरे मामले को आप देख सकते हैं।
वैसे तो सरकार ने मिड-डे मील यानी सरकारी स्कूलों में बच्चों को दिया जाने वाला दोपहर का भोजन इस उद्देश्य से शुरू किया गया था कि बच्चों को पढ़ाई के साथ पौष्टिक भोजन भी मिल सके। खासकर गरीब और जरूरतमंद परिवारों के बच्चों को इसका लाभ मिले। लेकिन इस तरह की तस्वीर बस भ्रष्टाचार और लापरवाही को दिखाती है करोड़ो रुपए मिलने पर भी बच्चों की सेहत से इस तरह का खिलवाड़ किया जा रहा है। कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य होते हैं लेकिन यही खाना खा खाकर देश का भविष्य बीमार हो सकता है। क्या सरकार को इस बात की जरा भी चिंता नहीं है।
स्कूल जाने तक का रास्ता खराब और स्कूल की दूरी
खबर लहरिया द्वारा अप्रैल 2026 में की गई रिपोर्टिंग में सामने आया कि बिहार के खगड़िया जिले के अलौली ब्लॉक के मछड़ा डीह 1 और 2 गांव की है जहां पांचवीं के बाद बच्चों खासकर लड़कियों को 4 किलोमीटर दूर दूसरे गांव जाकर पढ़ाई करनी पड़ती है। स्कूल दूर होने की वजह से कई छात्राएं पढ़ाई छोड़ देती हैं या सिर्फ परीक्षा देने तक सीमित रह जाती हैं। नीचे दिए गए वीडियो में आप वहां की स्थिति देख सकते हैं।
संगम कुमारी ने कहा कि “स्कूल दूर है इसलिए पढ़ाई छोड़ दिया है और स्कूल तक जानें का रास्ता जंगल भरा है। मेरे साथ की 10-15 लड़कियों ने भी इस वजह से स्कूल जाना छोड़ दिया है।”

बिहार के खगड़िया जिले के अलौली ब्लॉक के मछड़ा डीह 01 का प्राथमिक स्कूल (फोटो साभार: खबर लहरिया)
यूपी में भी शिक्षा का यही हाल है। शिक्षा को लेकर सरकार बड़े-बड़े भाषण और वादे करती हैं लेकिन शिक्षा तक पहुंचने का रास्ता ही जब साफ़ सुथरा और आसान न हो तो स्कूल जाना भी किसी चुनौती से कम नहीं लगता है। यूपी में जहां कई स्कूलों में सुविधा की कमी है तो वहीं कई जगह स्कूल जाने वाली गलियां और सड़क टूटी फूटी और कीचड़ और जलभराव की समस्या है। इस वजह से परिवार भी अपने बच्चों को स्कूल भेजने में कतराते हैं कहीं उन्हें कोई चोट न लग जाए या फिर कोई बड़ा हादसा न हो जाए।
बांदा जिले की तस्वीर भी कुछ अलग नहीं है। ग्राम पंचायत अतरहट के ग्रामीण पिछले करीब 20 वर्षों से लकड़ी के अस्थायी पुल के सहारे आते जाते हैं। वहां के लोगों का कहना है कि कई बार पुल बनाने की मांग की गई है लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन दिया जाता है। बारिश आते ही यह पुल और खतरनाक हो जाता है। इसी पुल से होकर बच्चों को स्कूल तक जाना पड़ता है।
स्कूल जाने के लिए पुल बना सबसे बड़ा रुकावट
वहीं साल 2025 में जिला चित्रकूट के ब्लॉक कर्वी स्थित खोह गांव में पिछले दस वर्षों से पूरे रास्ते पर पानी भरे रहने की खबर आई। नाली न बनने के कारण बारिश होते ही गली में घुटने-घुटने पानी भर जाता है। हालात यह हैं कि कई घरों तक पानी पहुंच जाता है। यही रास्ता है जिससे स्कूली बच्चे और गांव के लोग रोजाना आने-जाने के लिए निकलते हैं।

चित्रकूट के ब्लॉक कर्वी स्थित खोह गांव में स्कूल जाते बच्चे (फोटो साभार : सुनीता)
खोह गांव के छात्र अंकित ने कहा कि “जब हम पढ़ने जाते हैं तो पूरा रास्ता पानी से भरा रहता है। हम लोग अक्सर फिसलकर गिर जाते हैं और हमारी किताबें भीगकर खराब हो जाती हैं। हम रास्ते में भीग जाते हैं जिससे पूरा दिन पढ़ाई में मन नहीं लगता। सारा ध्यान भीगे हुए कपड़ों और जूतों पर चला जाता है।” इस खबर को आप नीचे दिए गए लिंक में पढ़ सकते हैं।
ये भी पढ़ें – स्कूली बच्चों का रोज का संघर्ष, कीचड़ और पानी से होकर पहुँचते हैं स्कूल
सरकारी स्कूल में शिक्षकों की कमी
साल 2025 की रिपोर्ट में सामने आया था कि पटना जिले के मसौढ़ी ब्लॉक के निशियावां पंचायत में बने उच्च माध्यमिक विद्यालय में कक्षा 6 से 8 तक एक भी स्थायी शिक्षक नहीं था। प्रिंसिपल खुद इन कक्षाओं को पढ़ाते थे। बाकी टीचर भी अपने काम के अलावा अतिरिक्त क्लास ले रहे थे।
https://khabarlahariya.org/bihar-patna-news-there-is-a-huge-shortage-of-teachers-in-many-schools-even-during-the-elections-in-bihar/
स्कूलों की जर्जर हालत
शिक्षित होना और शिक्षा व्यवस्था का मजबूत होना आज के समय में बेहद जरूरी है। शिक्षा जहां दी जाती है और जहां बच्चे शिक्षित होते हैं, उस जगह का सुरक्षित होना भी आवश्यक है। विद्यालय जहां आप शिक्षा पाकर ही अपने आप को, अपने परिवार और अपने समाज को सुरक्षित रख सकते हैं लेकिन अगर वही जगह सुरक्षित महसूस न करवा पाए तो? ऐसे में स्कूल की इमारत ही जर्जर हो या उनकी दीवारों और छत इतनी कमजोर हो कि देखकर हमेशा ये डर बना रहे की अभी गिर जाएगी और सारा ध्यान हट कर अपनी सुरक्षा पर केंद्रित हो जाता है। इसका असर पढ़ाई पर सबसे ज्यादा पड़ता है।
यूपी के कई जिलों में ऐसे स्कूल हैं जहां की दीवारों में दरार है और इमारत जर्जर है। मई 2026 में चित्रकूट जिले के मऊ ब्लॉक के सेसासुबकरा मजरा पटोरी गांव में 18 मई को एक दर्दनाक हादसा हो गया। स्कूल परिसर में खेल रहे बच्चों के ऊपर शौचालय की दीवार अचानक गिर गई, जिसमें एक बच्चे की मौत हो गई।
साल 2025 में भी चित्रकूट के रामनगर ब्लॉक के मटियारा गांव के प्राइमरी स्कूल की बदहाल स्थिति सामने आई। बीते तीन वर्षों से स्कूल की छत और दीवारें जर्जर थीं लेकिन प्रशासन ने समय रहते कोई मरम्मत कार्य नहीं कराया। नतीजा यह हुआ कि बारिश के मौसम में स्कूल की छत और दीवारें भरभराकर गिर गईं। बड़ा हादसा होने से टल गया क्योंकि यह घटना रात में हुई वरना किसी बच्चे की जान भी जा सकती थी।

चित्रकूट के रामनगर ब्लॉक के मटियारा गांव का प्राइमरी स्कूल (फोटो साभार: खबर लहरिया)
चित्रकूट : तीन साल पहले गिरी स्कूल की छत, बाहर पढ़ने को मजबूर छात्राएं
2023 की रिपोर्ट की तस्वीर में भी ऐसा देखा गया जहां स्कूल की दीवारों में इतनी दरारें थीं इमारत कभी भी गिर सकती है। उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिला के उच्च प्राथमिक विद्यालय की हालत भी कुछ ऐसी ही है।
आंगनबाड़ी केंद्र में भी सुविधा नहीं
शिक्षा का एक केंद्र आंगनबाड़ी भी है जहां छोटे उम्र के बच्चे शुरुआती ज्ञान लेते हैं लेकिन यूपी, बिहार, एमपी में कई ऐसे गांव है जहां आंगनबाड़ी केंद्र तक नहीं है। वैसे तो सरकार, सरकारी बिल्डिंग में करोड़ो रूपये खर्च करती है लेकिन आम जनता के लिए चालू की गई सुविधा का ध्यान नहीं रखती। इस साल जनवरी 2026 में प्रयागराज के शंकरगढ ब्लॉक के सेमरा खान गांव में छोटे बच्चों की शिक्षा के लिए आंगनबाड़ी तो 1990 से चल रहा है, लेकिन अभी तक वहां आंगनबाड़ी केंद्र नहीं बना है।
Anganwadi News : आंगनबाड़ी केंद्र न होने से खुले में पढ़ रहे बच्चे
वहीं यदि कहीं आंगनबाड़ी है भी तो वहां की स्थिति ऐसी है की बच्चों का पढ़ना मुश्किल है। मई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार वाराणसी जिले के चोलापुर ब्लॉक अंतर्गत चंद्रावती गांव में स्थित आंगनबाड़ी केंद्र के पास गंदगी और कूड़े का ढेर लगा हुआ है, जिससे बीमारी फैलने का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
सरकारी स्कूलों में शौचालय की कमी
स्कूलों में छात्राओं की सुरक्षा के लिए एक शौचालय का होना भी बहुत आवश्यक है। ऐसे बहुत से सरकारी स्कूल हैं जहां शौचालय तो हैं लेकिन वे इस्तेमाल करने लायक नहीं है। शौचालय में या तो गेट नहीं होते या फिर उनमें ताला लगा होता है या फिर जो साफ़ सुथरे शौचालय होते हैं वो स्कूल सटाफ के लिए होते हैं। स्कूल में पढ़ाई के दौरान शौच के लिए जाना भी एक चुनौती बन जाता है। ये चुनौती लड़कियों और नाबलिगों के लिए और बढ़ जाती है।

2024 की रिपोर्ट में सामने आया कि वाराणसी के चोलापुर ब्लॉक के नियार गाँव के एक विद्यालय में 257 बच्चों को शौचालय की सुविधा नहीं है। बच्चों का कहना है कि शौचालय तो है लेकिन पानी की सुविधा नहीं है और ना ही बैठने लायक है। छात्रों का कहना है कि सरकार की बातें कागज पर ही हैं, स्कूल के मास्टर भी ऐसा ही करते हैं।
स्कूल में शौचालय न होने की वजह से बाहर शौच करने लड़कियों के साथ छेड़छाड़ और बलात्कार का डर बना रहता है। ऐसी ही खबर मध्य प्रदेश के खंडवा गांव में स्कूल के पीछे शौच करने गई 15 साल की नाबलिग के साथ बलात्कार की घटना सामने आई थी। यह घटना सोमवार 14 जुलाई 2025 की बताई जा रही है। घटना की शिकायत नाबलिग की दादी ने अगले दिन में पुलिस में की। एफआईआर के बाद आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया।
Madhya Pradesh: खंडवा के स्कूल के शौचालय में सुविधा की कमी के चलते 15 साल की नाबलिग से बलात्कार
सरकारी स्कूल में पानी की व्यवस्था
सरकारी स्कूलों में पानी की व्यवस्था भी कुछ खास नहीं है। कहीं पानी गन्दा आता है तो कहीं पानी की सुविधा ही नहीं है। साल 2024 में चित्रकूट के धवाड़ा गांव के प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय के परिसर में हैंण्डपम्प और बोर से गन्दा पानी निकल रहा है ऐसा मामला सामने आया था। बच्चे घर से बोतल में पानी लाते हैं। मगर खाना खाने के बाद हाथ और थाली धोने के लिए बच्चों को तालाब के पास जाना होता है जहां किसी भी तरह की घटना होने का डर बना रहता है।
देश में स्कूलों की यह व्यवस्था कई सालों से हैं आज भी ग्रामीणों में कई ऐसी गांव हैं जहां स्कूलों में पानी, बैठने, मिड डे मील, शौचालय की सुविधा नहीं है। लेकिन सीजेपी (कॉकरोच जनता पार्टी) के आने से लोगों में अब जागरूकता आ गई है। वो अपने साथ हो रहे है अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना सिख रहे हैं और इसकी तस्वीर हमें मीडिया की खबरों में दिखने लगी है।
‘स्कूल ठीक करो’ अभियान से सुधरेगी स्कूलों की हालत?
अब Gen Z और Gen Alpha को इस तरह सड़कों पर मांग करते हुए देख अब ग्रामीण स्तर पर आवाज बुलुंद होते दिखाई देगी क्योंकि अब सीजेपी द्वारा स्कूल ठीक करो अभियान की वजह से ग्रामीण स्तर की और तस्वीरें सामने आएँगी।
CJP नागरिकों से अपील कर रहा है कि वे स्कूलों की कमियों को मोबाइल से रिकॉर्ड कर प्रशासन तक पहुंचाएं। अभियान का लक्ष्य अगले दो महीनों में 100 स्कूलों की स्थिति सुधारना है।
दिन 1–15: स्कूल की कमियों का ऑडिट कर अधिकारियों को जानकारी देना।
दिन 16–30: मरम्मत कार्य और उसकी गुणवत्ता की निगरानी करना।
CJP का कहना है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है और यह किसी राजनीतिक दल का नहीं बल्कि पूरे समाज का मुद्दा है। संगठन ग्रामीण विकास और सरकारी स्कूलों को प्राथमिकता देने की मांग करता है और जनप्रतिनिधियों से अपील करता है कि देशभक्ति को जमीनी विकास से जोड़ा जाए।
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