अभिनेत्री सामंथा रुथ प्रभु की दक्षिण भारतीय परंपरा के अनुसार सीमंतम (गोदभराई) रस्म संपन्न हुई। इस दौरान श्रीविद्या परंपरा के वैदिक मंत्रोच्चार, श्री चक्र यंत्र और विशेष संस्कारों के जरिए होने वाले बच्चे व मां के कल्याण की प्रार्थना की गई।
Samantha Ruth Prabhu Godbharai : मातृत्व के सफर में भारतीय संस्कृति कई ऐसे संस्कार जोड़ती है, जो मां और गर्भ में पल रहे शिशु को सकारात्मक ऊर्जा देने के लिए बने हैं। दक्षिण भारत में गर्भावस्था के सातवें या आठवें महीने में की जाने वाली गोदभराई को ‘सीमंतम’ कहा जाता है।
अभिनेत्री सामंथा रुथ प्रभु की हालिया सीमंतम रस्म ने इस प्राचीन वैदिक परंपरा को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। सामंथा ने पूरी तरह पारंपरिक तमिल-तेलुगू विधि-विधान और श्रीविद्या उपासना के साथ यह पूजा संपन्न की।
क्या होता है सीमंतम संस्कार?
सनातन परंपरा के सोलह संस्कारों में सीमंतोन्नयन संस्कार का खास स्थान है। इसे आम बोलचाल में सीमंतम कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य गर्भवती महिला के मन को शांत रखना, चिंताएं दूर करना और आने वाले शिशु के बौद्धिक व शारीरिक विकास के लिए सकारात्मक माहौल बनाना है।
इस दिन परिवार की बुजुर्ग महिलाएं और पंडित वैदिक मंत्रों से गर्भवती महिला को आशीर्वाद देते हैं। दक्षिण भारत में इस दौरान विशेष जड़ी-बूटियों के अर्क, सुगंधित जल और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि का प्रयोग किया जाता है, जिससे घर का वातावरण तनावमुक्त बना रहे।
श्रीविद्या परंपरा और 94 कलाओं का सम्मान
सामंथा की सेरेमनी को श्रीविद्या परंपरा के पुजारियों ने संपन्न कराया। इस परंपरा में गर्भवती स्त्री को केवल एक मां नहीं, बल्कि साक्षात देवी और नई सृष्टि की रचनाकार माना जाता है।
रस्म के दौरान ‘कला आवरण’ (श्री कल्पम) किया गया, जिसमें देवी की 94 कलाओं और उनके गुणों का आह्वान किया जाता है।
मान्यता है कि पवित्र जल के छिड़काव और मंत्रोच्चार से शरीर के सातों चक्र जागृत और संतुलित होते हैं, जिससे मां के भीतर नई ऊर्जा का संचार होता है।
श्री चक्र यंत्र और देवी खड्गमाला का पाठ
इस विशेष पूजा में गर्भवती महिला को श्री चक्र यंत्र के केंद्र बिंदु में बैठाया जाता है। श्री चक्र में नौ आवरण (परतें) होते हैं, जो आंतरिक चेतना और सृष्टि के विकास क्रम को दर्शाते हैं।
ऊर्जा का प्रवाह: केंद्र में बैठना इस बात का प्रतीक है कि स्त्री सृष्टि की मूल शक्ति से जुड़ रही है।
देवी खड्गमाला पाठ: पूजा के दौरान देवी खड्गमाला का पाठ किया गया। यह पाठ बाहरी संसार से ध्यान हटाकर मन को शांत और एकाग्र करने में मदद करता है।
मानसिक सुरक्षा: मंत्रों की ध्वनि कंपन (वाइब्रेशन) गर्भस्थ शिशु तक पहुंचकर उसे शांत और सुरक्षित महसूस कराती है।
आज की जीवनशैली में क्यों जरूरी हैं ये परंपराएं?
प्रेग्नेंसी के दौरान महिला कई तरह के शारीरिक और हार्मोनल बदलावों से गुजरती है। ऐसे समय में परिवार का साथ और शांत माहौल बहुत राहत देता है। वैदिक संस्कारों का मूल उद्देश्य यही है कि महिला को तनाव से दूर रखा जाए।
मंत्रों की लयबद्ध ध्वनि आधुनिक न्यूरोलॉजी के अनुसार भी मस्तिष्क में ‘हैप्पी हार्मोन्स’ रिलीज करने और कॉर्टिसोल (तनाव हार्मोन) को कम करने में मददगार मानी जाती है।