भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में अब RJD सांसद सुधाकर सिंह और IPS अफसर कुंदन कृष्णन आमने-सामने हैं। IPS अफसर ने नोटिस भेजकर माफी मांगने की मांग की है, तो सांसद ने साफ इनकार कर दिया है। उन्होंने नोटिस भेजने पर ही सवाल उठा दिया है।
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अब इस मामले में आगे क्या होगा, क्या सांसद को IPS अफसर नोटिस नहीं भेज सकते, कानून क्या कहता है, समझेंगे; बूझे की नाही में...।
सवाल-1ः RJD सांसद सुधाकर सिंह को नोटिस भेजने का पूरा मामला क्या है?
जवाबः बक्सर से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) सांसद सुधाकर सिंह को सीनियर IPS अफसर कुंदन कृष्णन ने 6 अक्तूबर को अपने निजी एडवोकेट के माध्यम से एक मानहानि का कानूनी नोटिस भेजा है।
नोटिस में सांसद से 15 दिनों के भीतर सार्वजनिक रूप से बिना शर्त माफी मांगने की मांग की गई है। ऐसा न करने पर उनके खिलाफ कानूनी और आपराधिक कार्रवाई करने तथा 5 करोड़ रुपये का मानहानि का केस दर्ज करने की चेतावनी दी है।
यह पूरा विवाद भोजपुर के बिलौटी गांव में 17 जून को हुए भरत भूषण तिवारी के कथित एनकाउंटर और पुलिसिया कार्रवाई की जांच की मांग से जुड़ा है।
नोटिस की 6 बड़ी बातें…
- 24 जून 2026 को सुधाकर सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बिना जांचे-परखे और बेबुनियाद आरोप लगाया।
- RJD सांसद ने कहा कि भारत भूषण तिवारी के एनकाउंटर में कुंदन कृष्णन की मुख्य भूमिका थी, और धमकियों की मनगढ़ंत बातें फैलाईं।
- घटना के बाद संबंधित पुलिसकर्मियों पर तुरंत कार्रवाई की गई थी। राज्य सरकार ने 20 जून 2026 को ही रिटायर्ड जज विनोद कुमार सिन्हा की अगुवाई में एक 'न्यायिक जांच आयोग' का गठन कर दिया था।
- जब मामला पहले से ही जांच आयोग के पास था, तब भी सांसद ने आयोग के सामने सबूत रखने के बजाय मीडिया के सामने आकर बयानबाजी की, जिसका मकसद केवल राजनीतिक फायदा उठाना और सस्ती लोकप्रियता पाना था।
- सांसद के बयानों से यह संदेश गया कि अधिकारी गलत गतिविधियों में शामिल लोगों को बचाते या बढ़ावा देते हैं और अपने पद का दुरुपयोग करते हैं।
- जनप्रतिनिधि होने के नाते यह जानते हुए कि बात मीडिया और सोशल मीडिया में फैलेगी, ऐसे बयान दिए गए जिससे IPS अधिकारी की ईमानदारी, साख और मानसिक शांति को ठेस पहुंची।
सवाल-2ः सुधाकर सिंह ने आखिर क्या कहा था?
जवाबः 24 जून 2026 को RJD सांसद सुधाकर सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था, 'पुलिस ने एक ऐसे युवक की हत्या कर दी, जिसके खिलाफ पहले कोई गंभीर मामला तक दर्ज नहीं था। पटना से कुंदन कृष्ण ने STF भेजकर उसकी हत्या करवा दी।’
उन्होंने कहा था, 'मामले की जांच के लिए सरकार ने एक 'नकली जांच आयोग' बनाया है। इससे न्याय नहीं मिलेगा। पुलिस अपराधियों की तरह हत्या कर रही है। जबकि, सरकार असली दोषियों के नाम सामने नहीं आने देना चाहती।'
दरअसल, घटना के समय IPS अफसर कुंदन कृष्णन स्पेशल टास्क फोर्स (STF) के पुलिस महानिदेशक (DG/ADG स्तर) के पद पर तैनात थे।
सुधाकर सिंह ने सार्वजनिक रूप से मांग की थी कि जांच केवल निचले स्तर के निलंबित पुलिसकर्मियों तक सीमित न रहे, बल्कि तत्कालीन STF चीफ IPS कुंदन कृष्णन और अन्य सीनियर पुलिस अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच और पूछताछ की जाए।

सांसद ने स्पीकर से की शिकायत
- कुंदन कृष्णन के नोटिस पर सांसद सुधाकर सिंह ने माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया है और वह अपने आरोपों पर कायम हैं। उन्होंने इस मामले में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर हस्तक्षेप करने की मांग की है।
- सुधाकर सिंह ने दलील दी है कि वे एक जनप्रतिनिधि होने के नाते जनता के मुद्दों को उठा रहे थे और इस प्रकार का कानूनी नोटिस उनके संसदीय विशेषाधिकार व दायित्वों के निर्वहन में बाधा डालता है।
- उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से IPS अधिकारी के बिना सरकारी अनुमति के नोटिस भेजने की जांच कराने और मामला संसद की विशेषाधिकार समिति को भेजने का आग्रह किया है।
सवाल-3ः …तो क्या सांसद पर कोई अफसर मानहानि का केस नहीं कर सकता?
जवाबः ऐसा बिल्कुल नहीं है। कोई भी IAS या IPS अफसर किसी भी सांसद को मानहानि का कानूनी नोटिस भेज सकता है। उनके खिलाफ दीवानी या आपराधिक मानहानि का मुकदमा दर्ज कर सकता है। इसे ऐसे समझिए…
सांसद को सिर्फ संसद के अंदर विशेषाधिकार
संविधान के ऑर्टिकल 105(2) के तहत सांसदों को सदन में या संसद की किसी समिति में कही गई किसी भी बात के लिए अदालत में जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता (उन्हें पूर्ण विशेषाधिकार प्राप्त है)।
हालांकि, यह सुरक्षा केवल संसद की चहारदीवारी और सदन की कार्यवाही तक सीमित है। यदि कोई सांसद प्रेस कॉन्फ्रेंस, टीवी डिबेट, सोशल मीडिया या जनसभा में किसी अधिकारी पर व्यक्तिगत, बेबुनियाद या दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाता है, तो उसे अनुच्छेद 105 का संरक्षण नहीं मिलता। बाहर दिए गए बयानों के लिए उन पर सामान्य नागरिक की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है।
- 17 अप्रैल 1998 को पीवी नरसिम्हा राव बनाम स्टेट मामले में सुप्रीम कोर्ट कहा था, ‘ऑर्टिकल 105 केवल संसद के अंदर सदन के कार्य से जुड़े भाषणों की रक्षा करता है। सदन के बाहर किए गए आचरण, प्रेस कॉन्फ्रेंस या सामान्य भाषणों पर संसद सदस्य भी देश के सामान्य नागरिक कानून के अधीन होते हैं।’
- तब सुप्रीम कोर्ट ने संसद के अंदर सांसदों के हर तरह के कार्य यानी सवाल पूछने के बदले पैसे लेने पर भी केस नहीं चलाने का आदेश दिया था। जिसे 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने सीता सोरेन बनान भारत संघ मामले में पलट दिया। नए आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने पैसे के लेन-देन को करप्शन एक्ट माना और सांसद को राहत देने से इनकार कर दिया।
अफसरों को मानहानि केस करने पर रोक नहीं
सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता बताते हैं, 'सांसदों को जनप्रतिनिधि होने के नाते संसद के भीतर अनेक विशेषाधिकार हासिल रहते हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों के अलग-अलग आदेश और एडवाइजरी के मुताबिक विधायकों और सांसदों को स्पेशल प्रोटोकॉल भी मिलता है।’
‘उसके अनुसार सरकारी अधिकारी उनके खिलाफ अभद्रता या बदतमीजी नहीं कर सकते। लेकिन सांसदों को अफसरों या जनता के साथ बदसलूकी करने या उनका अपमान करने का कोई विशेषाधिकार हासिल नहीं है।'
विराग गुप्ता बताते हैं, ‘अफसरों के सरकारी कामकाज में बाधा डालना IPC और BNS कानून के तहत अपराध है। राष्ट्रपति और राज्यपाल को पद पर रहते हुए सिविल और क्रिमिनल मामलों से संवैधानिक सुरक्षा मिलती है। लेकिन सांसदों के खिलाफ सिविल या क्रिमिनल मुकदमा चलाने में कोई पाबंदी नहीं है।’

IPS अफसर कुंदन कृष्णन ने सांसद सुधाकर सिंह को भेजा लीगल नोटिस।
सरकारी अफसरों को इस कानून से मिलती है ताकत
- सिविल सेवा आचरण नियम-1968 के नियम 17 के तहत, यदि किसी अधिकारी के आधिकारिक आचरण या चरित्र पर गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो वह अपने चरित्र की रक्षा के लिए कानूनी कार्रवाई कर सकता है।
- यदि मुकदमा सरकार के खर्चे पर लड़ा जाना है, तो सरकार की पूर्व मंजूरी आवश्यक होती है।
- यदि अधिकारी अपनी व्यक्तिगत क्षमता में अपने स्वयं के खर्च पर मानहानि का नोटिस भेजता है या केस करता है, तो उसे केवल सरकार को इसकी सूचना देनी होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था…
17 अक्टूबर 2022 को मनोज तिवारी वर्सेज मनीष सिसोदिया केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ‘केवल सरकारी पद पर होने से किसी व्यक्ति का अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करने का मौलिक अधिकार समाप्त नहीं होता।’
अगर किसी सरकारी कर्मचारी (लोक सेवक) की मानहानि होती है, तो उसके पास केस दर्ज कराने के दो रास्ते होते हैं।
- आम नागरिक की तरह: वह अपनी व्यक्तिगत क्षमता में किसी भी आम इंसान की तरह अदालत जाकर सीधे मानहानि का केस दर्ज करा सकता है।
- सरकारी प्रक्रिया के जरिए: वह कानून में दी गई विशेष सरकारी प्रक्रिया (पब्लिक प्रोसीक्यूटर के माध्यम से) का इस्तेमाल कर सकता है।
सरकारी कर्मचारी बन जाने से या आरोप उसके काम से जुड़े होने की वजह से उसका आम नागरिक वाला अधिकार खत्म नहीं हो जाता।
कानून (CRPC/धारा 199) उसे यह छूट देता है कि वह इन दोनों में से अपनी पसंद का कोई भी रास्ता चुन सकता है।
इसलिए, यह तर्क गलत है कि सरकारी कर्मचारियों को केवल विशेष सरकारी प्रक्रिया ही अपनानी पड़ेगी।
सवाल-4ः …तो अब मानहानि केस में क्या होगा?
जवाबः नहीं, अभी सीधे ट्रायल शुरू नहीं होगा। फिलहाल नोटिस मिलने के बाद सुधाकर सिंह को 15 दिन का समय दिया गया है। यदि वे माफी नहीं मांगते या नोटिस खारिज करते हैं, तब कुंदन कृष्णन के पास कोर्ट जाने का रास्ता खुलेगा।
सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता बताते हैं, ‘सांसदों के खिलाफ चल रहे मुकदमों के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश से विशेष अदालतों का गठन हुआ है। सांसद के बयान से यदि किसी अधिकारी की मानहानि हुई है तो उसके खिलाफ सिविल और क्रिमिनल दोनों तरह की कार्रवाई की जा सकती है।’
वह बताते हैं, ‘नोटिस के जवाब में यदि सांसद सार्वजनिक तौर पर खेद व्यक्त कर दें तो मामला खत्म हो सकता है। अगर नोटिस का सही जवाब नहीं मिला तो IPS अधिकारी अदालत में मानहानि का दावा कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें दावे की राशि के अनुसार कोर्ट फीस का भुगतान करना होगा।’

सवाल-5ः कौन हैं IPS कुंदन कृष्णन, जिन्होंने भेजा नोटिस?
जवाबः 1994 बैच के IPS अधिकारी कुंदन कृष्णन मौजूदा समय में बिहार पुलिस में DG ऑपरेशन्स की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। जनवरी 2026 में उन्हें STF और स्पेशल ब्रांच की भी जिम्मेदारी दी गई।
कुंदन कृष्णन की सबसे बड़ी ताकत उनका लंबा फील्ड और ऑपरेशनल अनुभव है। वह 31 मार्च 2029 को रिटायर होंगे।
बाहुबली आनंद मोहन से टकरा गए थे कुंदन कृष्णन
2006 में IPS अफसर कुंदन कृष्णन और बाहुबली नेता आनंद मोहन के बीच टक्कर हुई थी। तब कुंदन पटना के एसपी सिटी थे। आनंद मोहन की देहरादून में एक मामले को लेकर पेशी थी। उन्हें सहरसा जेल से देहरादून ले जाया गया। लौटते वक्त आनंद मोहन सहरसा जेल न जाकर पटना के एक होटल में रुक गए।
कुंदन कृष्णन को पता चला तो वह रेलवे स्टेशन के पास स्थिति उस होटल में गए। यहां उनकी टीम की भिड़ंत आनंद मोहन के समर्थकों से हुई। कुंदन कृष्णन आनंद मोहन को जेल भेजकर माने।

अभी DGP बनने की रेस में...
- पुलिस महकमे में कुंदन कृष्णन की पहचान एक दबंग और फील्ड ओरिएंटेड अधिकारी की रही है।
- कानून-व्यवस्था और ऑपरेशन से जुड़े मामलों में उनका अनुभव उन्हें दूसरे दावेदारों से अलग करता है।
- सम्राट सरकार में इनकी खूब चल रही है। IPS या फिर DSP की पोस्टिंग में सलाह ली जा रही है।
- कुंदन बिहार के मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक समीकरणों के लिहाज से भी फिट माने जा रहे हैं।
- खासकर लव-कुश समीकरण की चर्चा में उनका नाम मजबूत दावेदार के तौर पर लिया जा रहा है।
- कुंदन कृष्णन मूल रूप से नालंदा जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने इतिहास में एमए किया है।