बैंकिंग सिस्टम में कैश का 'मास्टर स्ट्रोक': क्या है RBI का VRRR ऑक्शन और क्यों पड़ी इसकी जरूरत?

Published on 7 सित॰ 2026

भारतीय बैंकिंग प्रणाली में लिक्विडिटी (नकदी की उपलब्धता) को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) लगातार अपने मॉनेटरी पॉलिसी टूल्स (Monetary Policy Tools) का सक्रिय इस्तेमाल कर रहा है. फॉरेन करंसी नॉन-रेजिडेंट-बैंक [FCNR(B)] डिपॉजिट्स और विदेशी पूंजी प्रवाह में बढ़ोतरी के कारण देश के बैंकिंग सिस्टम में अचानक सरप्लस लिक्विडिटी (अतिरिक्त नकदी) का उभार देखने को मिला है. रिपोर्ट के अनुसार, बैंकिंग प्रणाली में जरूरत से ज्यादा नकदी जमा होने से शॉर्ट-टर्म मनी मार्केट रेट्स (जैसे ओवरनाइट कॉल मनी रेट) रेपो रेट से नीचे फिसलने का जोखिम बन जाता है, जिससे महंगाई को काबू करने की आरबीआई की मौद्रिक प्राथमिकताओं को झटका लग सकता है. इस अतिरिक्त कैश को सोखने (Absorb) और मुद्रा बाजार में ब्याज दरों की स्थिरता बनाए रखने के लिए केंद्रीय बैंक ने वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) नीलामी का सहारा लिया है. आइए इसे विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं..

क्या है VRRR ऑक्शन?

वैरिएबल रेट रिवर्स रेपो यानी VRRR भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बैंकिंग प्रणाली से अतिरिक्त नकदी वापस खींचने का एक मुख्य शॉर्ट टर्म टूल है. इसके तहत कमर्शियल बैंक (Commercial Banks) अपनी अतिरिक्त नकदी रिजर्व बैंक के पास एक निश्चित अवधि (जैसे 3, 7 या 14 दिन) के लिए जमा करते हैं, जिस पर उन्हें प्रतिस्पर्धी (Variable) दरों पर ब्याज मिलता है.

FCNR(B) इनफ्लो से बैंकिंग सिस्टम में नकदी का उफान

प्रवासी भारतीयों (NRIs) द्वारा FCNR(B) खातों में विदेशी मुद्रा जमा कराने और केंद्रीय बैंक द्वारा डॉलर की खरीदारी करने के परिणामस्वरूप, घरेलू मुद्रा (रुपए) के रूप में बैंकिंग सिस्टम में भारी लिक्विडिटी पैदा हुई है. इस अतिरिक्त तरलता को समय पर प्रबंधित न करने पर करेंसी मार्केट में असंतुलन का खतरा पैदा हो जाता है. आपको बता दें कि आरबीआई की एफसीएनआरबी स्कीम की वजह से बैंकों के पास 127 अरब डॉलर आए हैं.

शॉर्ट-टर्म इंटरेस्ट रेट्स को टूटने से बचाना

जब बैंकों के पास सरप्लस कैश होता है, तो वे इंटर-बैंकिंग मार्केट में बहुत कम दरों पर कर्ज देने लगते हैं. VRRR ऑक्शन के जरिए इस एक्सट्रा कैश को सोखकर RBI यह सुनिश्चित करता है कि ओवरनाइट कॉल मनी रेट्स और TREPS (Triparty Repo) दरें केंद्रीय बैंक की बेंचमार्क नीतिगत दरों (Repo Rate) के संरेखण में ही बनी रहें.

महंगाई नियंत्रण और वित्तीय स्थिरता

यदि बाजार में अत्यधिक नकदी की स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह अर्थव्यवस्था में मांग-जनित महंगाई को बढ़ावा दे सकती है. VRRR नीलामी के जरिए RBI इन्फ्लेशन जोखिम को नियंत्रित रखता है और साथ ही कमर्शियल बैंकों को उनके निष्क्रिय पड़े फंड्स पर सुरक्षित और व्यवस्थित रिटर्न पाने का अवसर प्रदान करता है. FCNR(B) के प्रवाह से पैदा हुई लिक्विडिटी के बीच RBI का यह कदम यह साबित करता है कि केंद्रीय बैंक विदेशी पूंजी के आगमन से पैदा हुई तरलता को बिना वित्तीय बाजार में अस्थिरता लाए सुचारू रूप से संतुलित कर रहा है. जब तक प्रणालीगत नकदी सामान्य स्तर पर नहीं आती, तब तक VRRR ऑक्शंस भारतीय मनी मार्केट को नियंत्रित करने का प्राथमिक हथियार बने रहेंगे.

लिक्विडिटी मैनेजमेंट क्यों अहम होगा

भारी FCNR (B) की वजह से, 28 अगस्त तक के हफ्ते में विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 740.8 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया. अगर पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बीच रुपए पर दबाव आता है, तो ये रिजर्व काम आएंगे. FCNR (B) डिपॉजिट और लगातार सरकारी खर्च की वजह से बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी बनी हुई है. इस बीच, भारत की इकोनॉमी मजबूत स्थिति में है. जियोपॉलिटिकल संकट के बावजूद अप्रैल-जून तिमाही में रियल GDP में उम्मीद से बेहतर 7.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. दूसरी ओर, अप्रैल में महंगाई दर 4.45 फीसदी थी, जो जून में 4.38 फीसदी थी. चिंता यह है कि जियोपॉलिटिकल तनाव और उम्मीद से कम अल-नीनो बारिश के कारण अगस्त में यह और बढ़ सकती है. ऐसे में, RBI को लिक्विडिटी को कंट्रोल करते हुए ग्रोथ और महंगाई के बीच संतुलन बनाना होगा.

क्या VRRR ही एकमात्र तरीका है?

ऐसा नहीं है. नोमुरा की भारत और एशिया (जापान को छोड़कर) के लिए चीफ इकोनॉमिस्ट सोनल वर्मा का कहना है कि सेंट्रल बैंक लिक्विडिटी को सोखने के लिए कई तरह के तरीकों का इस्तेमाल कर सकता है. इन विकल्पों में लगातार VRRR ऑपरेशन, 2-3 महीनों के लिए इंक्रीमेंटल कैश रिजर्व रेश्यो (CRR) में बढ़ोतरी (CRR वह कम से कम कैश बैलेंस है जो बैंकों को बनाए रखना होता है), और सेल-बाय स्वैप शामिल हैं. सेल-बाय स्वैप के तहत RBI कमर्शियल बैंकों को विदेशी मुद्रा बेचता है और भविष्य में एक तय तारीख पर उसे वापस खरीदने का समझौता करता है.

वर्मा ने कहा कि लिक्विडिटी के मामले में RBI के सामने ज्यादा लिक्विडिटी की समस्या है, क्योंकि जिन बैंकों ने इस स्कीम के जरिए डॉलर जुटाए थे, उनके पास अब सरप्लस लिक्विडिटी है. नतीजतन, वेटेड एवरेज कॉल रेट (बैंकों के बीच बहुत कम समय के लोन पर लगने वाली ब्याज दर) पॉलिसी रेपो रेट से नीचे आ गई है. हालांकि, आने वाले त्योहारों के मौसम में कैश की ज्यादा मांग, फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स की मैच्योरिटी और RBI के संभावित फॉरेक्स इंटरवेंशन (डॉलर की बिक्री) से बैंकिंग सिस्टम में मौजूद सरप्लस लिक्विडिटी कुछ कम हो जाएगी, फिर भी इस सरप्लस को खत्म करने के लिए RBI को लिक्विडिटी सोखने वाले कई तरीकों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है. हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि लंबे समय वाले इस VRRR ऑक्शन में कितना इंटरेस्ट दिखता है.

सौरभ शर्मा

सौरभ शर्मा

15 साल से शेयर मार्केट, इकोनॉमी और कमोडिटी कवर कर रहे हैं. टीवी9 के साथ जुड़ने से पहले डीएनए, ए​शियानेट, जनसत्ता और राजस्थान पत्रिका जैसे कई बड़े संस्थानों के साथ भी जुड़े रहे.

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