भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। जनमानस में इसे 'गुरु पूर्णिमा' के नाम से जाना जाता है। कैलेंडर के अनुसार 2026 में 29 जुलाई को गुरु पूर्णिमा होगी। 'निर्णयसिंधु' ग्रंथ एवं अन्य शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार यह तिथि न केवल ज्ञान के आदि स्रोत महर्षि वेद व्यास को समर्पित है, बल्कि चातुर्मास्य और साधना की दृष्टि से भी अत्यंत पवित्र मानी गई है।
1. महर्षि वेद व्यास और गुरु परंपरा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा को ही वेदों के विभाग करने वाले, ब्रह्मसूत्र तथा अठारह पुराणों के रचयिता महर्षि वेद व्यास का प्राकट्य हुआ था। इसी कारण इस तिथि को 'व्यास पूर्णिमा' भी कहा जाता है। 'निर्णयसिंधु' के अनुसार, इस दिन शिष्य अपने गुरुओं का पूजन महर्षि व्यास के प्रतीक के रूप में करते हैं और अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाने वाले गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
2. मन्वादि तिथि का अक्षय पुण्य
शास्त्रों में आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को 'मन्वादि तिथि' स्वीकार किया गया है- अर्थात वह तिथि जिससे किसी नए मन्वन्तर का आरम्भ माना जाता है।
• पूर्वाह्नव्यापिनी तिथि का नियम: 'निर्णयसिंधु' के अनुसार, व्यास पूजा एवं धार्मिक अनुष्ठानों के लिए वही पूर्णिमा तिथि ग्रहण करनी चाहिए जो पूर्वाह्नव्यापिनी (दोपहर से पूर्व रहने वाली) हो।
• अक्षय फल: मन्वादि तिथि होने के कारण इस दिन किया गया स्नान, जप, तर्पण, पूजन और दान निष्फल नहीं जाता, बल्कि साधक को इसका अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।
3. गुरु पूजन की शास्त्रीय विधि और मंत्र
गुरु पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल स्नान-ध्यान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण करके निम्नलिखित शास्त्रीय विधि से गुरु पूजन करना चाहिए:
1. संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके संकल्प लें:
'मम अज्ञानध्वंसपूर्वक ज्ञानप्राप्तये, श्री गुरुचरणकमलपूजनं करिष्ये।'
'mam agyandhvanspurvak gnyanpraptaye, shri gurucharankamalpujanam karishye'
2. आवाहन व आसन: गुरु (या उनके प्रतीक/चित्र) को ऊँचे एवं स्वच्छ आसन पर विराजमान कराएं और महर्षि वेद व्यास तथा अपने गुरुदेव का ध्यान करें।
आवाहन मंत्र:
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
gururbrama gururvishnuh gururdevo maheshvarah.
guruh sakshat param bram tasmai shrigurave namah॥
3. पाद्य एवं अर्घ्य: गुरु के चरणों को जल से प्रक्षालित करें और उन्हें चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप एवं दीप अर्पित करें।
4. वस्त्र एवं दक्षिणा समर्पण: गुरु को यथाशक्ति वस्त्र, फल, मिष्ठान्न तथा दक्षिणा अर्पित करें।
5. विशेष व्यास वंदना एवं गुरु मंत्र: पूजन के समय निम्नलिखित प्रामाणिक श्लोकों का पाठ करना अत्यंत शुभ माना गया है:
• महर्षि व्यास वंदना (विष्णुपुराण/पद्मपुराण):
व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे।
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः॥
vyasay vishnurupay vyasarupay vishnave.
namo vai bramahnidhaye vasishthay namo namah॥
• अज्ञान तिमिर नाशक मंत्र (स्कंदपुराण - गुरुगीता):
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
agyantimirandhasya gyanaanjanshalakay.
chakshurunmilitam yen tasmai shrigurave namah॥
1. आरती व परिक्रमा: धूप-दीप से गुरु की आरती उतारें, उनकी परिक्रमा करें और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर अंत में चरणामृत ग्रहण करें।
4. चातुर्मास्य व्रत का आरम्भ
गुरु पूर्णिमा का एक अन्य प्रमुख आयाम चातुर्मास्य व्रत के संकल्प से जुड़ा है। इस पावन तिथि पर व्यास पूजन करने के उपरान्त साधु-संत और गृहस्थ साधक चार महीने तक एक स्थान पर रहकर स्वाध्याय, जप और तप करने का नियम लेते हैं। वर्षा ऋतु के इन चार महीनों में मन को संयमित कर आध्यात्मिक ऊर्जा संचित करने की यह प्राचीन परंपरा है।
जिन लोगों की दीक्षा नहीं हुई है
जिन लोगों की दीक्षा नहीं हुई है वह भी भगवान श्री कृष्ण को अपना गुरु मानकर गुरु रूप में उनकी पूजा अर्चना कर सकते हैं।
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥
श्रीमद् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'श्री कृष्णष्टकम्' (मंगलाचरण)
अर्थ: वसुदेव जी के पुत्र, कंस और चाणूर जैसे राक्षसों का वध करने वाले, माता देवकी को परम आनंद देने वाले तथा संपूर्ण जगत के गुरु भगवान श्री कृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।
Guru Purnima Special: How to Perform Shastric Worship at Home If You Couldn't Reach Your Ashram
हिंदू वैदिक संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा के समान अपने शिष्य में सद्गुणों का सृजन करने वाला विष्णु के समान उसके शुभ संस्कारों को पोषण देने वाला और शिव के समान दुर्गुणों और अज्ञान को नष्ट करने वाला बताया गया है। गुरु पूर्णिमा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने का संकल्प-दिवस है। आषाढ़ पूर्णिमा का यह दिन मन्वादि काल के प्रभाव, चातुर्मास्य की साधना, और महर्षि व्यास एवं गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का एक ऐसा पावन संगम है, जो मनुष्य को आध्यात्मिक चेतना और सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है।
प्रस्तुति: श्री गीतांजलि ज्योतिष केंद्र, इंदौर।
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