Premium
भारत में अगर किसी प्रदर्शन के दौरान आपको पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया तो क्या करें?
भारत में अगर किसी भी राज्य में चाहे वो दिल्ली हो या बिहार, अगर पुलिस आपको प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार करती है, तो आपके पास कई अधिकार होते हैं। आइए जानते हैं उन अधिकारों के बारे में...!
![]()
प्रदर्शन के दौरान अगर गिरफ्तार हो जाएं तो क्या करें?
भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश में, जहां धरना-प्रदर्शन को मौलिक अधिकार (Fundamental Right) के रूप में संविधान में बताया गया है, वहां प्रोटेस्ट आम रहा है। आजादी के बाद से समय-समय पर छोटे-बड़े प्रदर्शन होते रहे हैं। जैसे इस समय नीट पेपर लीक (NEET Paper Leak) को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों का आंदोलन चल रहा है। आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी की खबरें आती रहती हैं। पुलिस आंदोलनकारियों को गिरफ्तार करती रही है, इससे महात्मा गांधी भी अछूते नहीं रहे थे। बापू ने तो गिरफ्तारी को अंग्रेजों के खिलाफ हथियार बना लिया था। तब से लेकर अब का दौर काफी बदल चुका है। देश को आजाद हुए 79 साल हो चुके हैं, ऐसे में सवाल ये है कि आखिर भारत में अगर किसी प्रदर्शन के दौरान किसी शख्स को पुलिस गिरफ्तार कर लेती है, तो क्या करना चाहिए, भारत का कानून इस पर क्या कहता है, उसके पास क्या कानूनी अधिकार हैं?
प्रदर्शन के दौरान कब पुलिस गिरफ्तार करती है?
सबसे पहले ये समझिए कि किसी आंदोलन में सैकड़ों लोग होते हैं, हजारों लोग होते है, लेकिन सबकी गिरफ्तारी नहीं होती है, क्यों? प्रदर्शन के दौरान पुलिस कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत कार्रवाई करती है। जब किसी क्षेत्र में धारा 163 लागू हो और बिना अनुमति के भीड़ जमा हो, तो पुलिस उसे गैर-कानूनी जमावड़ा मानकर चेतावनी देने के बाद लोगों को हिरासत में ले सकती है। इसके अलावा किसी भी तरह के बड़े अपराध, हिंसा या अशांति को रोकने के लिए पुलिस एहतियातन भी प्रदर्शनकारियों को रोक सकती है। यदि प्रदर्शन के दौरान बैरिकेड्स तोड़े जाते हैं, तोड़फोड़, आगजनी या पथराव जैसी हिंसक गतिविधियां होती हैं, तो पुलिस गिरफ्तारी करती है। ऑन-ड्यूटी पुलिस अधिकारियों के काम में बाधा डालना, धक्का-मुक्की करना, भड़काऊ भाषण देना या आम जनता के लिए मुख्य रास्तों और हाईवे को लंबे समय तक बाधित करना भी कानूनी रूप से अपराध है। इन सभी परिस्थितियों में पुलिस प्रदर्शनकारियों को मौके से हिरासत में ले सकती है या गिरफ्तार कर सकती है। पटना हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट रजनी कांत सिंह उर्फ संस्कार (Advocate R.K.Singh) ऐसे मामलों के कानूनी पहलू बताते हुए कहते हैं, "भारत का संविधान प्रोस्टेट करने का अधिकार सभी को देता है, लेकिन उसमें कुछ पाबंदियां हैं, जैसे- प्रदर्शन शांतिपूर्ण होने चाहिए, कानून के दायरे में हो, ऐसा नहीं होता है कि आप किसी भी जगह प्रोटेस्ट कर सकते हैं, जो जगह निर्धारित है, जहां की अनुमति है, आप वहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर सकते हैं।"

पुलिस कब गिरफ्तार करती है? (AI Photo)
गिरफ्तारी के दौरान के नियम
- गिरफ्तारी और पूछताछ करने वाले पुलिसकर्मियों के नाम और पद की आईडी स्पष्ट दिखनी चाहिए।
- मौके पर मेमो बनेगा, जिस पर कम से कम एक स्थानीय गवाह और गिरफ्तार व्यक्ति के हस्ताक्षर होंगे।
- महिलाओं की गिरफ्तारी के समय महिला पुलिस होनी चाहिए और सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से पहले गिरफ्तारी से बचना चाहिए। बच्चों के खिलाफ बल प्रयोग पूरी तरह प्रतिबंधित है।
- व्यक्ति की गरिमा बनाए रखी जाएगी। उसे जुलूस की तरह नहीं घुमाया जाएगा। हथकड़ी का प्रयोग बेहद दुर्लभ मामलों में ही होगा।
गिरफ्तारी के बाद अधिकार
पुलिस द्वारा किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किए जाने के बाद उसे 24 घंटे के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य होता है। यदि अभियुक्त पुलिस हिरासत में रहता है, तो हर 48 घंटे में किसी प्रशिक्षित डॉक्टर से उसकी मेडिकल जांच कराई जाएगी। आरोपी को पूछताछ के दौरान भी अपनी पसंद के वकील से मिलने का पूरा अधिकार है, और यदि वह गरीब या असमर्थ है, तो उसे राज्य की ओर से मुफ्त कानूनी सहायता पाने का हक है। एडवोकेट आर.के.सिंह बताते हैं कि अगर किसी प्रोटेस्ट के दौरान पुलिस आपको गिरफ्तार कर लेती है तो आपको सबसे पहले ये जानने का अधिकार है कि पुलिस ने आपको किस आधार पर, किस कानून के तहत गिरफ्तार किया है। इसकी जानकारी आप ले सकते हैं, ये आपका कानूनी अधिकार है। आपको अपने परिचित से बात करने का अधिकार है, गिरफ्तारी की सूचना देने का अधिकार है, वकील से बात करने का अधिकार है।"

गिरफ्तारी के बाद प्रदर्शनकारी के पास क्या अधिकार
गिरफ्तार करने के बाद पुलिस क्या करती है?
प्रदर्शन के दौरान आमतौर पर पुलिस प्रदर्शनकारी को हिरासत में लेती है, फिर गिरफ्तार करती है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के मामले में गिरफ्तारी को लेकर स्पष्ट नियम बनाए थे। जब पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करती है, तो कानून (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता - BNSS ) के तहत उसे एक तय प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होता है। गिरफ्तारी के तुरंत बाद पुलिस आरोपी को नजदीकी थाने ले जाती है और उसकी एंट्री स्टेशन डायरी में करती है। थाने में आरोपी की व्यक्तिगत तलाशी ली जाती है और उसका सामान जब्त कर उसकी रसीद बनाई जाती है। इसके बाद पुलिस आरोपी के परिजनों या किसी परिचित को उसकी गिरफ्तारी और थाने की जानकारी देती है। एडवोकेट आर के सिंह कहते हैं कि पुलिस के लिए भी कठोर प्रावधान है। पुलिस को गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर गिरफ्तार किए गए शख्स को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। बाद का फैसला कोर्ट में होता है।"
कोर्ट में पेशी के बाद क्या होता है?
जब पुलिस गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करती है, तो अदालत सबसे पहले यह जांचती है कि गिरफ्तारी के समय डीके बसु दिशानिर्देशों और कानूनी प्रक्रियाओं का सही पालन हुआ है या नहीं, जैसे परिजनों को सूचना देना और मेडिकल जांच कराना। इसके बाद आरोपी को अपने या सरकारी वकील के माध्यम से पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है और उसकी मेडिकल रिपोर्ट देखी जाती है, यदि आरोपी पुलिस प्रताड़ना का आरोप लगाता है तो कोर्ट दोबारा मेडिकल जांच का आदेश भी दे सकती है। अंत में, मामले की गंभीरता और परिस्थिति को देखते हुए मजिस्ट्रेट तीन में से एक फैसला सुनाते हैं- अपराध जमानती या हल्का होने पर जमानत देना, आगे पूछताछ की आवश्यकता न होने पर आरोपी को जेल (न्यायिक हिरासत) भेजना, या फिर सबूत जुटाने और पूछताछ के लिए पुलिस को सीमित दिनों की रिमांड (पुलिस हिरासत) सौंपना।