गंभीर रोग से पीड़ित शिक्षकों के स्थानांतरण आवेदन स्वीकार करे विभाग, नवीन चिकित्सा प्रमाण-पत्र की शर्त बनाकर आवेदन से वंचित करना उचित नहीं — डॉ० अंकित जोशी
देहरादून। राजकीय शिक्षक संघ उत्तराखण्ड के प्रांतीय महामंत्री डॉ० अंकित जोशी ने गंभीर रोग से पीड़ित शिक्षकों के अनुरोध आधारित स्थानांतरण में चिकित्सा प्रमाण-पत्र को लेकर जारी किए गए विभागीय निर्देशों पर पुनर्विचार की मांग की है। उन्होंने कहा कि कुछ विभागीय अधिकारियों द्वारा 01 जनवरी 2025 अथवा उसके बाद का अद्यतन चिकित्सा प्रमाण-पत्र आवेदन के साथ अनिवार्य किए जाने संबंधी निर्देश जारी किए गए हैं। केवल इस आधार पर गंभीर रोगियों के आवेदन स्वीकार न करना न्यायोचित नहीं है और इससे वास्तविक रूप से गंभीर बीमारी से जूझ रहे शिक्षक स्थानांतरण हेतु आवेदन करने के अवसर से ही वंचित हो सकते हैं।
डॉ० जोशी ने कहा कि उत्तराखण्ड लोक सेवकों के लिए वार्षिक स्थानान्तरण अधिनियम, 2017 की धारा 3(घ) में गंभीर रोगियों एवं संबंधित चिकित्सकीय स्थितियों को परिभाषित किया गया है। अधिनियम में गंभीर रोग के आधार पर अनुरोध स्थानांतरण की व्यवस्था है तथा ऐसे प्रकरणों को प्राथमिकता दिए जाने का भी प्रावधान है। ऐसे में गंभीर रोगियों से संबंधित प्रावधानों की व्याख्या अधिनियम की मूल भावना और मानवीय दृष्टिकोण के अनुरूप की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में कुछ विभागीय स्तरों पर वर्ष 2023 में जारी शासनादेश के एक प्रावधान को आधार बनाकर वर्तमान स्थानांतरण सत्र में 01 जनवरी 2025 अथवा उसके बाद का अद्यतन चिकित्सा प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करने की शर्त लगाई जा रही है। उक्त शासनादेश तत्कालीन परिस्थितियों में स्थानान्तरण अधिनियम के कतिपय प्रावधानों में छूट से संबंधित था। इसलिए उसकी ऐसी व्याख्या उचित नहीं है जिससे वर्तमान में गंभीर रोग के आधार पर स्थानांतरण चाहने वाले कार्मिक आवेदन प्रस्तुत करने के प्रथम चरण में ही प्रक्रिया से बाहर हो जाएँ।
डॉ० जोशी ने कहा कि एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि गंभीर रोग से पीड़ित अनेक शिक्षकों के स्थानांतरण पूर्व में धारा 27 के अंतर्गत प्रस्तुत प्रकरणों के आधार पर भी नहीं हो पाए हैं। ऐसे शिक्षक लंबे समय से गंभीर चिकित्सकीय परिस्थितियों के बावजूद स्थानांतरण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अब यदि उन्हें केवल चिकित्सा प्रमाण-पत्र की निर्धारित कट-ऑफ तिथि के आधार पर आवेदन करने से ही रोक दिया जाता है तो यह उनके लिए दोहरी कठिनाई उत्पन्न करेगा। ऐसी परिस्थितियों में विभाग को तकनीकी आधार पर आवेदन अस्वीकार करने के बजाय मानवीय एवं न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाते हुए उनके आवेदन स्वीकार करने चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह भी महत्वपूर्ण है कि स्थानांतरण का अंतिम निर्णय आवेदन प्राप्त करने वाला अधिकारी स्वयं नहीं, बल्कि नियमानुसार गठित सक्षम समिति द्वारा परीक्षण और विचार के उपरांत किया जाना है। ऐसी स्थिति में प्रारंभिक स्तर पर ही केवल चिकित्सा प्रमाण-पत्र की तिथि को आधार बनाकर आवेदन स्वीकार न करना उचित नहीं है। आवेदन प्राप्त किए जाने चाहिए और उनकी पात्रता, चिकित्सा अभिलेखों तथा अन्य तथ्यों का परीक्षण सक्षम स्तर अथवा समिति के समक्ष नियमानुसार किया जाना चाहिए। आवेदन स्वीकार करना और स्थानांतरण की पात्रता पर अंतिम निर्णय लेना दो अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं।
वर्तमान में एक गंभीर व्यावहारिक समस्या यह भी है कि अनेक शिक्षकों को मेडिकल बोर्ड की तिथियाँ काफी विलंब से मिल रही हैं। कई मामलों में मेडिकल बोर्ड की तिथि आने तक स्थानांतरण आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि समाप्त हो सकती है। यदि किसी शिक्षक ने समय रहते मेडिकल बोर्ड के लिए प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है, लेकिन उसे चिकित्सा व्यवस्था के कारण बाद की तिथि मिली है, तो इस विलंब का दुष्परिणाम संबंधित गंभीर रोगी शिक्षक पर नहीं डाला जाना चाहिए।
डॉ० जोशी ने कहा कि अधिनियम के अंतर्गत आने वाली कुछ चिकित्सकीय स्थितियाँ स्थायी अथवा अपरिवर्तनीय प्रकृति की भी हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति की एक किडनी का निष्कासन हो चुका हो और यह तथ्य सक्षम चिकित्सा प्राधिकारी द्वारा पूर्व में विधिवत प्रमाणित हो, तो केवल प्रमाण-पत्र की तिथि पुरानी हो जाने से वह मूल चिकित्सकीय तथ्य समाप्त नहीं हो जाता। ऐसी स्थायी एवं अपरिवर्तनीय चिकित्सकीय स्थितियों में मूल तथ्य के बार-बार नए सिरे से प्रमाणन की व्यावहारिक आवश्यकता पर भी विभाग को संवेदनशीलता और तार्किकता से विचार करना चाहिए।
जहाँ किसी रोग की वर्तमान स्थिति, गंभीरता अथवा उपचार का अद्यतन मूल्यांकन आवश्यक हो, वहाँ विभाग नियमानुसार नवीन चिकित्सा अभिलेख अथवा सक्षम मेडिकल बोर्ड का प्रमाण-पत्र मांग सकता है, लेकिन अद्यतन प्रमाण-पत्र तत्काल उपलब्ध न होने को आवेदन स्वीकार न करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
डॉ० जोशी ने मांग की कि जिन गंभीर रोगी शिक्षकों को आवेदन की अंतिम तिथि से पहले मेडिकल बोर्ड की तिथि उपलब्ध नहीं हो पा रही है, उनके सीएमओ अथवा सीएमएस द्वारा जारी चिकित्सा प्रमाण-पत्र और उपलब्ध चिकित्सकीय अभिलेखों के आधार पर आवेदन प्रारंभिक रूप से स्वीकार किए जाएँ। जहाँ अंतिम पात्रता निर्धारित करने के लिए नियमानुसार सक्षम मेडिकल बोर्ड अथवा निर्धारित चिकित्सा प्राधिकारी का प्रमाण-पत्र आवश्यक हो, वहाँ संबंधित शिक्षक को अंतिम निर्णय से पूर्व उसे प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर दिया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि विभाग को इस विषय में प्रदेश स्तर पर तत्काल स्पष्ट एवं एकरूप दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए। गंभीर रोगियों के आवेदन निर्धारित समय-सीमा के भीतर स्वीकार किए जाएँ और केवल कट-ऑफ तिथि अथवा मेडिकल बोर्ड की प्रक्रिया लंबित होने के कारण किसी आवेदन को प्रारंभिक स्तर पर रोका न जाए। उपलब्ध चिकित्सा अभिलेखों के साथ आवेदन स्वीकार कर उसकी अंतिम पात्रता का परीक्षण सक्षम समिति द्वारा नियमानुसार किया जाना अधिक न्यायसंगत होगा।
डॉ० जोशी ने कहा, “गंभीर रोगियों के लिए स्थानान्तरण अधिनियम में किए गए विशेष प्रावधानों का उद्देश्य उन्हें राहत प्रदान करना है। जिन गंभीर रोगियों को पूर्व में धारा 27 के अंतर्गत भी स्थानांतरण का लाभ नहीं मिल पाया, उन्हें अब केवल प्रमाण-पत्र की कट-ऑफ तिथि या मेडिकल बोर्ड की देरी के कारण आवेदन करने से ही वंचित करना उचित नहीं होगा।
आवेदन स्वीकार करना और स्थानांतरण स्वीकृत करना अलग-अलग विषय हैं। जब अंतिम निर्णय सक्षम समिति को करना है तो सभी वास्तविक गंभीर रोगियों के आवेदन मानवीय आधार पर स्वीकार कर उन्हें समिति के समक्ष परीक्षण हेतु प्रस्तुत किया जाना चाहिए।”
राजकीय शिक्षक संघ ने विभाग से अपेक्षा की है कि 01 जनवरी 2025 की कट-ऑफ संबंधी निर्देशों पर पुनर्विचार करते हुए गंभीर रोगियों के आवेदन स्वीकार करने के संबंध में तत्काल स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएँ, ताकि प्रक्रियागत अथवा चिकित्सकीय विलंब के कारण कोई वास्तविक गंभीर रोगी अपने आवेदन और न्यायोचित विचार के अवसर से वंचित न हो।