नवभारत संपादकीय: टीएमसी में बढ़ी अंदरूनी कलह, सांसदों के इस्तीफों से ममता बनर्जी पर बढ़ा दबाव
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Written By:
अंकिता पटेल
Updated On: Jul 20, 2026 | 10:20 AM IST
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सार
Mamata Banerjee Party: टीएमसी में बढ़ते असंतोष व सांसदों के इस्तीफों के बीच पार्टी की एकजुटता पर सवाल उठ रहे है। लगातार बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों ने पश्चिम बंगाल की सियासत को फिर चर्चा में ला दिया है।

ममता बनर्जी, टीएमसी, (सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
विस्तार
TMC Leadership Crisis: टीएमसी की संस्थापक व बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता ना बनर्जी अपनी बची-खुची पार्टी को भी संभाल पाने में असमर्थ हैं और उनकी मुसीबतें लगातार बढ़ती चली जा रही हैं। विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद वह बौखला गई और उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि वह जल्दी तय कर लें कि उनके साथ रहेंगे या बागी ऋतब्रत बनर्जी के साथ जाएंगे, जो कि अब बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं।
अब टीएमसी की राज्यसभा सदस्य रुक्मिणी कोयल मल्लिक ने भी संसद सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। उन्हें मिलाकर 4 सांसद ममता का साथ छोड़ चुके हैं। अब राज्यसभा में टीएमसी के केवल 9 सदस्य रह गए हैं।
TMC में बढ़ती टूट से ममता की मुश्किलें बढ़ीं
कुछ समय पूर्व टीएमसी के अनेक नेताओं ने ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के प्रति अपनी नाराजगी दर्शाई थी। ममता ने अभिषेक के खिलाफ कोई कदम उठाने से इनकार कर दिया था। उनके इस रवैये से टीएमसी में असंतोष व्याप्त हो गया और पार्टी को एकजुट रख पाना संभव नहीं रहा।
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यह नहीं पता कि रुक्मिणी कोयल का अगला कदम क्या होगा लेकिन अन्य 3 टीएमसी सांसदों ने पार्टी छोड़कर तुरंत बीजेपी में प्रवेश कर लिया। माना जाता है कि रुक्मिणी भी ऐसा ही करेंगी। जिस तरह टीएमसी टूट व बिखर रही है, उससे नहीं लगता कि ममता अपनी पार्टी को पुनर्गठित कर पाएंगी। वर्तमान राजनीतिक स्थितियों में ऐसा कर पाना आसान नहीं है।
ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की है, जो बंगाल सरकार के अलावा राज्य की बीजेपी इकाई भी चला रहे हैं। मुख्यमंत्री उन लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रहे हैं, जिन्होंने ममता की सरकार के दौरान कानून हाथ में लिया था। इसमें राजनीतिक प्रतिशोध न होकर कानून-व्यवस्था को मजबूत बनाने का उद्देश्य है।
बंगाल में TMC का जनाधार क्यों खिसका?
जब तक ममता बनर्जी सत्ता में थीं, वह केंद्र की मोदी सरकार पर बंगाल के साथ अन्याय करने और साजिश रचने का आरोप लगाती रहीं। उन्होंने मोदी, शाह और नड्डा को बाहरी लोग कहा था। अब राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद उनके पास कुछ बोलने को नहीं रह गया, वह बीजेपी के बढ़ते प्रभाव और ताकत को समझ पाने में असमर्थ रहीं।
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ममता बनर्जी के अहंकार की वजह से विपक्षी गठबंधन ने भी उनका पूरी तरह साथ नहीं दिया। वह मानती थीं कि बंगाल में टीएमसी ही सक्षम है और उसे कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी के सहयोग की आवश्यकता नहीं है।
लेफ्ट पार्टियों को सत्ता से बाहर करने के बाद ममता को लगने लगा था कि बंगाल में उनके एकछत्र शासन को कोई हिला नहीं पाएगा। बंगाल में टीएमसी नेता कार्यकर्ताओं के भ्रष्टाचार व वसूली से जनता तंग आ गई थी इसलिए बीजेपी को वहां सफलता मिली। अब टीएमसी का खेमा लगातार उजड़ता चला जा रहा है और ममता व उनके निकट सहयोगी बेबस होकर रह गए हैं।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
