आवाज ऐसी कि श्रोता हो जाते थे मंत्रमुग्ध, 'बैजू बावरा' की ऐतिहासिक जुगलबंदी से अमर हुए डी. वी. पलुस्कर

Published on 25 अक्टू॰ 2026

आवाज ऐसी कि श्रोता हो जाते थे मंत्रमुग्ध, 'बैजू बावरा' की ऐतिहासिक जुगलबंदी से अमर हुए डी. वी. पलुस्कर

नई दिल्ली, 25 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में 26 अक्टूबर का दिन एक गहरे शोक के तौर पर दर्ज है। साल 1955 में आज ही के दिन हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के विलक्षण गायक पंडित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर का निधन हुआ था। महज 34 साल की उम्र में इस महान कलाकार का चले जाना संगीत जगत के लिए एक ऐसी क्षति थी, जिसकी भरपाई आज तक नहीं हो पाई।

पंडित डी. वी. पलुस्कर का जन्म 28 मई 1921 को नासिक, महाराष्ट्र में हुआ था। वे विख्यात हिंदुस्तानी संगीतकार विष्णु दिगंबर पलुस्कर के पुत्र थे। संगीत उन्हें विरासत में मिला था। जब उनके पिता का देहांत हुआ, तब वे केवल दस साल के थे। पिता के जाने के बाद उनकी संगीत शिक्षा की जिम्मेदारी पंडित विनायकराव पटवर्धन और पंडित नारायणराव व्यास ने संभाली। उन्हें पंडित चिंतामनराव और पंडित मिराशी बुवा ने भी प्रशिक्षण दिया।

बचपन से ही उनमें संगीत की अद्भुत प्रतिभा थी, इसलिए उन्हें विलक्षण बालक के तौर पर जाना जाता था। उन्होंने अपना पहला बड़ा कार्यक्रम महज 14 वर्ष की आयु में पंजाब के प्रसिद्ध हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन में दिया था और सबको अपनी आवाज का कायल बना दिया था।

उत्तराधिकार में उन्हें ग्वालियर घराना और गंधर्व महाविद्यालय की परंपरा मिली थी, लेकिन वे खुद को एक घराने तक सीमित रखने वाले कलाकार नहीं थे। वे अन्य घरानों और शैलियों की सुंदर विशेषताओं को अपनाने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। यही कारण था कि उनके गायन में एक अनोखा संगम सुनाई देता था।

उनकी आवाज बेहद मधुर और सुरीली थी। उनके आलाप राग का स्पष्ट और सजीव चित्रण करते थे, जिसके बाद उनकी सहज शैली की तानों से सुसज्जित बंदिशें श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती थीं। उन्हें थोड़ी ही अवधि में राग का संपूर्ण आकर्षक चित्र प्रस्तुत करने में महारत हासिल थी। उनकी पहली डिस्क 1944 में बनी थी और 1955 में उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में चीन का दौरा भी किया था।

शुद्ध शास्त्रीय संगीत के अलावा वे एक महान भजन गायक के रूप में भी पूजनीय थे। आम लोगों के बीच वे फिल्म 'बैजू बावरा' (1952) में उस्ताद अमीर खान के साथ की गई अपनी अविस्मरणीय जुगलबंदी के लिए आज भी याद किए जाते हैं। उन्होंने बंगाली फिल्म 'शाप मोचन' में भी अपनी आवाज दी थी।

26 अक्टूबर 1955 को बीमारी के कारण उनका निधन हो गया, जिसकी खबर से देशभर में फैली और संगीत प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई।

--आईएएनएस

एससीएच/वीसी

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