बाड़मेर जिले के भारत-पाक बॉर्डर का अंतिम गांव सुंदरा, जो आबादी की दृष्टि से भी इस इलाके का सबसे बड़ा गांव है। यहां करीब 2500 लोगों की आबादी है। यह पशुधन की सर्वाधिक संख्या वाला गांव है। सुंदरा में 25 हजार से ज्यादा गोवंश है। 50 हजार से ज्यादा भेड़-बक
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इस बार कुदरत ने ऐसा कहर बरपाया कि बारिश ही नहीं हुई। पूरा बॉर्डर इलाका सूखे की चपेट में है। किसानों के लिए खाने को अनाज नहीं मिला है। चारे-पानी की समस्या विकराल रूप ले चुकी है। इतने भारी-भरकम पशुधन वाले गांव में अब पशुपालकों की चीख सरकार भी नहीं सुन रही है। किसानों की एक ही मांग है कि सरकार पशुओं के चारा डिपो और टैंकरों से जलापूर्ति करवाएं।
25 हजार गोवंश, 50 हजार भेड़ -बकरियां, चारा डिपो की मांग
सुंदरा के रेतीले धोरों पर जहां कभी घास के तिनके लहराते थे, आज वहां सिर्फ तपती धूल और सूखी जमीन है। इस सूखे ने सिर्फ फसलें ही नहीं इंसानों की थाली से निवाला भी छीन लिया। पशुओं के मुंह से चारा भी छीन लिया है। हर घर में बंधे मवेशियों की पसलियां अब चमड़ी से बाहर झांकने लगी हैं। पानी के पारंपरिक टांके और कुएं जवाब दे चुके हैं। लोगों के लिए मवेशी कोई व्यापार नहीं, बल्कि संपूर्ण जमापूंजी हैं। पशुपालक अपनी आंखों के सामने अपनी जिंदगी भर की पूंजी को तड़पते देखने को मजबूर हैं।
जहां कहीं तालाब, वहां छोड़ रहे पशु, ताकि मरे नहीं, जिंदा रहें
भारतमाला हाईवे के रोहिड़ी से आगे एक ट्यूबवैल है। यह रेगिस्तान में पानी की एकमात्र उम्मीद बना हुआ है। मरते-तड़पते पशुओं को देखकर किसान 20-30 पशुओं को इकट्ठा करते हैं। वे हर रोज इन्हें इसी ट्यूबवैल पर छोड़ रहे हैं। यहां एक कुंड बनाया हुआ है। इसे ट्यूबवैल से रोज भरा जाता है। यह ट्यूबवैल पशुओं के जिंदा रहने की उम्मीद है। इस ट्यूबवैल के आसपास करीब 5 हजार से ज्यादा गोवंश का जमावड़ा है। आसपास एक मठ भी है। वहां के मठाधीश भी पशुओं को मौत के मुहाने से बचाने में मदद कर रहे हैं।
पशुपालकों की दर्द भरी पुकार: सरकार के सामने तीन बड़ी मांगें
चारा डिपो खुलें: गांव में पशुधन की विशाल संख्या को देखते हुए तत्काल सरकारी अनुदानित चारा डिपो शुरू किए जाएं, ताकि हर परिवार को नियमित सूखा चारा मिल सके।
टैंकरों से जलापूर्ति: गांव के सार्वजनिक जीएलआर और पशु खेळियों को भरने के लिए रोजाना सरकारी टैंकरों की व्यवस्था की जाए। घर-घर पानी पहुंचाया जाए।
पशु चिकित्सा शिविर: भूख और प्यास से कमजोर हो रहे गोवंश और रेवड़ में महामारियां न फैलें। इसके लिए पशु चिकित्सा दल भेजें।
किसान बोले- चारा डिपो खुलें, टैंकरों से जलापूर्ति हो, तब जिंदा बच पाएंगे गोवंश, पानी खरीद रहे
रोहिड़ी के कमलसिंह का कहना है कि निजी टैंकरों से पानी मंगवाना किसानों की पहुंच से बाहर हो चुका है। दूर-दराज के कस्बों से महंगा चारा खरीदना भी संभव नहीं रहा। एक तरफ अपने पेट की चिंता है। दूसरी तरफ अपने बेजुबानों के तिल-तिल कर दम तोड़ने का खौफ है। इसी तरह भोमसिंह सुंदरा का कहना है कि रोहिड़ी और सुंदरा में भीषण अकाल की वजह से पशुपालकों के हालात खराब है।