पन्ना जिले के मझा गांव की 35 साल की मिथला आदिवासी ने बचपन से ही परिवार की जिम्मेदारी उठाई है। कभी खदान, कभी जंगल, कभी खेत और रात में खेत की रखवाली करती हैं। पति की कम उम्र में मौत पलायन के दौरान शोषण और जंगल में जंगली जानवरों के खतरे के बावजूद मिथला आज भी अलग-अलग काम करके परिवार चला रही हैं।

मिथला (फोटो साभार: आफ़रीन)
हमारे समाज में हमारे बीच ऐसी भी महिलाएं हैं, जो अपने जीवन में संघर्ष की मिसाल हैं। जिनके दर्द, बेबसी और संघर्ष की कहानी को शब्दों में बयां करना आसान नहीं होता। जब हम उनके करीब बैठकर उनके जीवन को देखते और उनकी बातें सुनते हैं, तो लगता है कि शायद संघर्ष ही इंसान को निखारता है, उसे जीने की राह दिखाता है और कठिन परिस्थितियों से लड़ना सिखाता है। जब इंसान इन संघर्षों को पार कर लेता है, तब वह और मजबूत होकर समाज और देश के लिए कुछ बेहतर करने के योग्य बनता है।
इस भागदौड़ और चमक-दमक भरी दुनिया में हम सभी अपने-अपने सपनों के पीछे भाग रहे हैं। बहुत से लोग सुख-चैन की जिंदगी जी रहे हैं और शायद उन लोगों के संघर्ष से अनजान हैं, जो दो वक्त की रोटी और अपने परिवार का पेट भरने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। इसी भीड़ में कुछ ऐसी महिलाएं भी हैं, जो तमाम परेशानियों के बावजूद उफ्फ तक नहीं करतीं और हर दिन एक नई चुनौती का सामना करती हुई आगे बढ़ती रहती हैं।
ऐसी ही एक कहानी है पन्ना जिले के माझा गांव की मिथला आदिवासी की।
मिथला की उम्र महज 35 वर्ष है, लेकिन इतनी कम उम्र में उन्होंने जितने संघर्ष देखे हैं, उतने शायद कई लोग पूरी जिंदगी में भी नहीं देख पाते।
मिथला के जीवन का संघर्ष उनके जन्म के साथ ही शुरू हो गया था। उन्हें जन्म देते ही उनकी मां की मृत्यु हो गई। उनका कोई भाई या बहन भी नहीं था। परिवार में उनके पिता रामा आदिवासी और बूढ़ी दादी थीं। पिता पैर से विकलांग थे, इसलिए वे ठीक से काम नहीं कर पाते थे। ऐसे में दादी ने जैसे-तैसे मिथला को पाला-पोसा।
मिथला के पिता रामा आदिवासी बताते हैं कि उन्होंने अपनी बेटी को बचपन से संघर्ष करते हुए देखा है। उनके अनुसार, मिथला की मां के गुजर जाने के बाद दादी ही उनकी सबसे बड़ी सहारा बनीं। दादी ने ही उन्हें पाला और बड़ा किया। लेकिन बचपन से ही मिथला के हिस्से में जिम्मेदारियां आती चली गईं।

मिथला और घर की जिम्मेदारी (फोटो साभार: आफ़रीन)
सिर्फ सात वर्ष की उम्र में घर की जिम्मेदारी उनके छोटे-से कंधों पर आ गई। दादी और विकलांग पिता के भरण-पोषण के लिए उन्होंने पत्थर की खदानों में मजदूरी शुरू कर दी। जिस उम्र में बच्चे खेलते हैं, उस उम्र में मिथला ने मजदूरी और परिवार की चिंता को अपना जीवन बना लिया।
माझा गांव की रहने वाली और मिथला की पड़ोसी व सहेली मीना, जो उन्हें बचपन से जानती हैं, बताती हैं कि मिथला बचपन से ही मेहनत करती रही हैं। मीना के मुताबिक, मिथला का अपनी दादी से बहुत गहरा लगाव था, क्योंकि मां के बाद दादी ही उनकी सबसे बड़ी सहारा थीं।
समय बीतता गया। जब मिथला 15 वर्ष की हुईं तो उनकी शादी हो गई। 20 वर्ष की उम्र होते-होते वह तीन बच्चों की मां बन चुकी थीं। लेकिन जिंदगी ने उनके सामने एक और बड़ी परीक्षा खड़ी कर दी।

मिथला का घर (फोटो साभार:आफ़रीन)
पत्थर की खदानों में काम करते हुए उनके पति बीमार पड़ गए और उन्हें टी.बी. हो गई। बीमारी इतनी बढ़ गई कि वे किसी काम को करने के लायक नहीं रहे। पति का इलाज, बच्चों की परवरिश और घर चलाने की जिम्मेदारी अब पूरी तरह मिथला के कंधों पर आ गई। मिथला ने पति को बचाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी। वह लगातार खदानों में मजदूरी करती रहीं, लेकिन उनकी कमाई इतनी नहीं थी कि पति का इलाज लंबे समय तक चल सके।
आखिरकार उनके पति ज्ञासि की मृत्यु हो गई।
उस समय मिथला की उम्र केवल 22 वर्ष थी और वह तीन बच्चों की मां होने के साथ-साथ विधवा हो गईं। उनके सबसे छोटे बेटे की उम्र उस समय महज दो वर्ष थी।
जिस उम्र में किसी महिला के सपने अपने बच्चों के भविष्य और परिवार के साथ को लेकर आकार लेते हैं, उसी उम्र में मिथला ने अपने जीवन के दो बड़े सहारे खो दिए थे जन्म देने वाली मां तो वह बचपन में ही खो चुकी थीं और अब उनके बच्चों के पिता भी उन्हें छोड़कर चले गए थे। लेकिन मिथला टूटी नहीं। उन्होंने अपने बच्चों के लिए खुद को संभाला और फिर एक नए संघर्ष के लिए तैयार हो गईं।
पति की मृत्यु को आज 13 वर्ष हो चुके हैं। इन वर्षों में मिथला ने अपने तीन बच्चों की परवरिश के साथ-साथ अपने विकलांग पिता रामा आदिवासी की जिम्मेदारी भी संभाली। आज वह अपने बच्चों के साथ अपने पिता के घर पर ही रहती हैं।

मिथला और उनके परिवार (फोटो साभार:आफ़रीन)
रामा आदिवासी बताते हैं कि पति की मृत्यु के बाद मिथला की और उनके बच्चों की परिस्थितियां बहुत खराब हो गई थीं। बच्चों को लेकर वह अपने मायके आ गईं। घर में खाने तक की समस्या होने लगी थी। ऐसे समय में मिथला जंगल से लकड़ियां इकट्ठी करतीं और उन्हें पन्ना तक लगभग चार-पांच किलोमीटर पैदल ले जाकर बेचती थीं। गांव से जंगल तक़रीबन 35 किलोमीटर दूर है। लकड़ियों से जो थोड़े पैसे मिलते, उसी से घर में आटा, चावल और दूसरे राशन का इंतजाम होता था।
अगर शाम तक मजदूरी का कोई काम मिल जाता तो वह मजदूरी करने चली जातीं और अगर काम नहीं मिलता तो जंगल में लकड़ियां इकट्ठी करने चली जातीं। रामा कहते हैं कि मिथला ने बचपन से ही अपनी उम्र से कहीं ज्यादा बोझ उठाया है। परिवार की जिम्मेदारी उन्होंने उस समय संभाली जब खुद उन्हें सहारे की जरूरत थी।
जंगल रोजगार का सहारा, लेकिन खतरे भी कम नहीं
मिथला और उनके जैसे ग्रामीण परिवारों के लिए जंगल केवल जंगल नहीं है। वह उनकी जिंदगी और आजीविका का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। मजदूरी हमेशा नहीं मिलती, इसलिए जंगल उन्हें कई तरह से सहारा देता है।
मिथला जंगल से सूखी जलाऊ लकड़ी, तेंदूपत्ता, आंवला, महुआ, गुली आदि लाती हैं। इन्हीं संसाधनों से वह अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करती हैं।

मिथला जंगल से सूखी जलाऊ लकड़ी ला रही है (फोटो साभार:आफ़रीन)
मिथला की सहेली मीना बताती हैं कि गांव के लोगों का जंगल से बहुत गहरा जुड़ाव है, क्योंकि उनके आसपास ही जंगल लगा हुआ है। वह और मिथला कई बार साथ में जंगल लकड़ियां लेने जाती रही हैं। मीना के अनुसार, जंगल से लकड़ियां और महुआ उनके लिए आय का महत्वपूर्ण साधन हैं। जब कभी खाना नहीं होता घर पर तब वे महुआ पकाते हैं और उसको खाती हैं। वह अपने जीवन को लेकर हमेशा यही सोचती थी की उनको जो शिक्षा नहीं मिली वो उनके बच्चों को मिले, खाने की कमी ना हो घर व्यवस्थित हो जाए जिससे उनके बच्चे भी पल जाएं। जो जीवन उन्होंने इतने इतनी गहरी चुनौतियों के साथ इतने संघर्षों से गुजारा वो संघर्ष उनके बच्चों के जीवन मे ना आए। अब बच्चों के बड़े होने के बाद उन्हे अपने बच्चों का भी काफी सहारा हो गया है।
लेकिन जंगल से मिलने वाला यह सहारा भी हमेशा आसान नहीं होता।
मीना बताती हैं कि महुआ उनके लिए ऐसी चीज है, जो आसपास के जंगल से बिना किसी बड़े संसाधन के मिल जाती है और जिसे वे अपने घर के लिए इस्तेमाल या बेच सकती हैं। लेकिन कई बार बाहर से लोग वाहन लेकर आते हैं और गरीब ग्रामीणों से पहले ही महुआ बीनकर ले जाते हैं। इससे स्थानीय लोगों के लिए परेशानी बढ़ जाती है।
मजदूरी का काम न मिलने पर जंगल से लाई गई लकड़ियां ही कई परिवारों के लिए आय का जरिया बनती हैं। मीना बताती हैं कि कभी-कभी इससे करीब 100 रुपये तक की आमदनी हो जाती है। लेकिन मौसम बदलने के साथ यह सहारा भी मुश्किल हो जाता है। बारिश में मजदूरी का काम बंद हो जाता है और जंगल में सूखी लकड़ियां भी आसानी से नहीं मिलतीं। ऐसे समय में परिवारों की परेशानी और बढ़ जाती है।
जंगल से जुड़ी दूसरी बड़ी चिंता सुरक्षा की है।
मिथला बताती हैं कि जंगल में जंगली जानवरों का खतरा हमेशा बना रहता है। शेर, जिसे वे स्थानीय भाषा में ‘नाहर’ कहती हैं, उसकी आवाज जब उनके घर तक सुनाई देती है तो वह डर जाती हैं। कुछ समय पहले एक तेंदुआ उनकी दो बकरियों को खा गया। बकरियां उनके परिवार के लिए सिर्फ पशु नहीं थीं, बल्कि आय का एक महत्वपूर्ण साधन थीं। उनके चले जाने से मिथला को आर्थिक नुकसान भी हुआ।

जानवरों से बचाव के लिए पहरा दे रही है (फोटो साभार:आफ़रीन)
जंगल में अकेले जाना उनके लिए हमेशा सुरक्षित नहीं रहा। उन्हें छेड़खानी जैसी परेशानियों का भी सामना करना पड़ा है। इसके बावजूद परिवार की जरूरतें उन्हें जंगल जाने के लिए मजबूर करती हैं।
पलायन का दर्द
जब गांव में काम और आमदनी के साधन पर्याप्त नहीं रहे तो मिथला को पलायन का दर्द भी सहना पड़ा।लगभग 25 वर्ष की उम्र में वह अन्य मजदूरों के साथ काम की तलाश में बाहर गईं। उनके साथ कुल 10 मजदूर थे, जिनमें पांच महिलाएं और पांच पुरुष शामिल थे। उस समय मिथला अपने दो बच्चों को घर पर छोड़कर एक बच्चे को अपने साथ लेकर गई थीं।
पलायन के दौरान ठेकेदार ने इन मजदूरों को करीब 8 लाख रुपये में लिया और उन्हें बिल्डिंग निर्माण के काम के लिए इलाहाबाद ले गया। वहां ये मजदूर करीब चार महीने तक रहे। लेकिन उन्हें पर्याप्त मजदूरी नहीं दी जाती थी और खाने के लिए भी भरपेट भोजन नहीं मिलता था। धीरे-धीरे मजदूरों को महसूस हुआ कि उनके साथ शोषण हो रहा है और वे वहां फंस गए हैं।
रामा आदिवासी बताते हैं कि जब उन्हें अपनी बेटी के साथ हुई इस घटना की जानकारी मिली तो वह बहुत घबरा गए थे। किसी तरह मिथला और उनके साथी मजदूर वहां से निकलकर वापस आए। वापस लौटते समय उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे, इसलिए उन्हें बिना टिकट जनरल बोगी में बैठकर खजुराहो तक लौटना पड़ा। इस घटना के बाद रामा ने मिथला को दोबारा पलायन पर जाने से मना कर दिया।
पलायन की इस घटना ने मिथला के जीवन में एक और गहरा अनुभव जोड़ दिया रोजगार की तलाश में घर से दूर जाने वाले गरीब मजदूरों की असुरक्षा का अनुभव।
दिन मजदूरी में, शाम बकरियों के साथ और रात खेत की रखवाली में
आज मिथला की जिंदगी सुबह से रात तक मेहनत में गुजरती है। सुबह उठकर वह घर का काम करती हैं, बच्चों के लिए खाना बनाती हैं और फिर मजदूरी के लिए निकल जाती हैं। शाम को बकरियां चराती हैं। इसके बाद पिता और बच्चों के लिए रात का खाना तैयार करती हैं और फिर किसी दूसरे के खेत की रखवाली करने चली जाती हैं।

रात में खेत की रखवाली ((फोटो साभार:आफ़रीन))
जिस खेत की वह रखवाली करती हैं, वह उनके घर से करीब चार-पांच किलोमीटर दूर है। रात के अंधेरे में जंगल और खेत के रास्ते से जाना आसान नहीं होता। जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए मिथला अपने साथ टॉर्च और अपने कुत्ते को लेकर जाती हैं। इसी कारण उन्होंने घर पर कुत्ते भी पाल रखे हैं। मिथला रातभर खेत की रखवाली करती हैं। इसके बदले उन्हें सालभर का अनाज मिल जाता है। यानी रात की मेहनत उनके परिवार के लिए गेहूं और दूसरे अनाज का सहारा बन जाती है। उनका 18 वर्षीय बेटा रवि भी मां के इस संघर्ष में उनके साथ खड़ा रहता है।
रवि बताते हैं कि इन दिनों बारिश के कारण खेत की रखवाली का काम बंद है, लेकिन उनकी मां बकरियां चराने और मजदूरी करने जाती हैं। जब मां काम पर जाती हैं तो रवि खुद बकरियां चराकर लाता है। जब रवि अपनी मां के साथ जंगल या खेत के काम पर जाते हैं तो वह भी उनकी मदद करते हैं। खेत की कटाई के समय रवि अपनी मां के साथ काम करते हैं। खेत की रखवाली के दौरान मिलने वाले गेहूं और अनाज को वह परिवार की जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं।
रवि बताते हैं कि जब वह मां के साथ खेत की रखवाली करने जाते थे तो उन्होंने जंगली जानवरों को सीधे हमला करते हुए तो नहीं देखा, लेकिन उन्हें पता है कि आसपास तेंदुआ, जंगली सूअर और दूसरे जंगली जानवर रहते हैं और उनसे खतरा हो सकता है।
मिथला की जिंदगी में परिवार का हर सदस्य किसी न किसी तरह उनके संघर्ष में सहभागी है। कोई बकरियां चराता है, कोई खेत के काम में हाथ बंटाता है और मिथला खुद दिन-रात मेहनत करके परिवार को संभालती हैं।
मिथला कहती हैं कि केवल मजदूरी से घर का खर्च चलाना मुश्किल है। इसलिए वह जितना संभव हो उतना काम करती हैं, ताकि अपने पिता और बच्चों को अच्छा और पेट भर खाना खिला सकें। इसी कोशिश में वह घर पर मशरूम भी उगाती हैं और आय के दूसरे साधन तलाशती रहती हैं। मिथला की जिंदगी में शायद ही कोई ऐसा दिन आता हो, जब उनके सामने कोई जिम्मेदारी न हो।
कभी वह मजदूरी करती हैं, कभी जंगल से लकड़ियां लाती हैं, कभी बकरियां चराती हैं, कभी खेत की रखवाली करती हैं और कभी घर पर मशरूम उगाती हैं। इन सबके बीच वह अपने बच्चों और पिता की देखभाल भी करती हैं।

अकेले संभाली है सभी जिम्मेदारी (फोटो साभार: आफ़रीन)
मिथला ने बचपन में मां को खोया, कम उम्र में जिम्मेदारियां उठाईं, पति को खोया, 22 वर्ष की उम्र में विधवा हुईं, बच्चों को अकेले पाला, पिता की जिम्मेदारी उठाई, पलायन का दर्द सहा, शोषण का सामना किया और जंगल के खतरों के बीच आज भी अपने परिवार के लिए संघर्ष कर रही हैं। वक्त और हालात ने उन्हें बहुत मजबूत बना दिया है। जीवन ने उन्हें बार-बार कठिन परिस्थितियों में खड़ा किया, लेकिन हर बार उन्होंने खुद को संभाला और आगे बढ़ती रहीं।
मिथला की कहानी केवल एक महिला के संघर्ष की कहानी नहीं है। यह उन हजारों ग्रामीण महिलाओं की कहानी है, जिनके लिए जंगल आज भी रोजी-रोटी का सहारा है, जिनके लिए मजदूरी ही परिवार की उम्मीद है और जिनके कंधों पर घर, बच्चों और बुजुर्गों की जिम्मेदारियां एक साथ टिकी हुई हैं। मिथला के पास बड़े संसाधन नहीं हैं, लेकिन उनके पास हिम्मत है। उनके पास सुविधाएं नहीं हैं, लेकिन मेहनत करने का जज्बा है। उनके जीवन में कठिनाइयां बहुत हैं, लेकिन हार मानने की जगह नहीं है।
एक और बात की अक्सर महिलाओं के काम को कम करके देखा जाता है। ख़ासकर विधवा महिलाओं को कमजोर और बेचारी समझ लिया जाता है। माना जाता है कि पति (एक आदमी) के बिना परिवार भला कैसे चलेगा। पर मिथला की ज़िंदगी का सफर इन धारणाओं को जवाब देती है।
मिथला अकेली ऐसी महिला नहीं है। जो महिलाएं घर के चार दिवारी के अंदर हर रोज काम करती है ऐसी ही मुश्किल परिस्थितियों के बीच परिवार को संभाल रही है। उनके लिए संघर्ष कोई एक दिन की बात नहीं है ये उनकी रोज की ज़िंदगी का हिस्सा है।
चम्बल एकेडमी फैलो – आफ़रीन/ रिपोर्ट और लेखन
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