लखनऊ: एक प्रदर्शनी में गांधी जी के फिल्म देखने की एकमात्र घटना को दर्शाने वाला दुर्लभ पोस्टर दिखा

Published on 27 सित॰ 2026

(किशोर द्विवेदी)

लखनऊ, 27 सितंबर (भाषा) मुंबई के कोलाबा की एक दुकान से संयोग से मिला फटा-पुराना एक फिल्म पोस्टर लखनऊ में लगी दुर्लभ फिल्म पोस्टरों की प्रदर्शनी का सबसे बड़ा आकर्षण बन गया है। यह केवल इसलिए नहीं कि यह 1939 की फिल्म का है, बल्कि इसलिए भी कि माना जाता है कि यह वही फिल्म है जिसे देखने के लिए महात्मा गांधी पहली और आखिरी बार सिनेमाघर गए थे।

यह पोस्टर विजय भट्ट निर्देशित ‘राम राज्य’ (1939) का है, जो 14 वर्ष के वनवास के बाद भगवान राम के अयोध्या लौटने और सिंहासन संभालने की कहानी पर आधारित है।

यह पोस्टर अलीगंज स्थित कला स्रोत आर्ट गैलरी में आईआरएस अधिकारी सबूर उस्मानी द्वारा तैयार प्रदर्शनी “बायोस्कोप-2 ‘गुमनाम है कोई’” का हिस्सा है।

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यह प्रदर्शनी 19 सितंबर से शुरू होकर चार अक्टूबर तक चलेगी। प्रदर्शनी में 1939 से 1980 के दशक के बीच बनी दुर्लभ हिंदी फिल्मों के चुनिंदा पोस्टर लगे हैं, जिनमें से कई ने हिंदी सिनेमा के इतिहास में मील के पत्थर का दर्जा हासिल किया।

लेकिन दर्शकों में सबसे ज्यादा जिज्ञासा ‘राम राज्य’ के पोस्टर को लेकर है। उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि रहे अभिनेता, लेखक और रंगकर्मी अतुल तिवारी ने गांधी और इस फिल्म के संबंध की कहानी सुनाई।

तिवारी ने कहा, ‘‘गांधी जी को फिल्में पसंद नहीं थीं।’’ उन्होंने कहा कि ‘राम राज्य’ ही एकमात्र फिल्म थी जो उन्होंने मुंबई (तत्कालीन बंबई) के रीगल थिएटर में देखी थी और यह थियेटर आज भी मौजूद है।

उन्होंने बताया कि गांधी ने बिना फिल्म देखे ही सिनेमा की आलोचना की थी, इसे ‘नई गंदी चीज’ का आना बताया था और इसे बंद करने की बात कही थी।

तिवारी ने कहा कि 1939 में पत्रकार ख्वाजा अहमद अब्बास ने गांधी को खुला पत्र लिखकर उनकी धारणा को चुनौती दी। तिवारी ने कहा कि गांधी खुद लगभग एक साल तक ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ के संपादक रहे थे।

अब्बास के पत्र का हवाला देते हुए तिवारी ने बताया कि पत्रकार ने लिखा था, ‘‘प्रिय बापू, सिनेमा के बारे में आपकी धारणा तथ्यों और वास्तविकता पर आधारित नहीं है। हो सकता है आपने शहरों के बीच यात्रा के दौरान रेलवे स्टेशनों के आसपास लगे सिनेमा के कुछ पोस्टर देखे हों, जो आमतौर पर बहुत खराब होते हैं, लेकिन केवल उनके आधार पर सिनेमा के बारे में राय मत बनाइए।’’

तिवारी ने कहा कि यह उल्लेखनीय है कि करीब 35-36 साल के एक युवा ने गांधी से इस तरह बात की और गांधी ने इस तर्क पर विचार किया। उन्होंने कहा कि ‘गांधी ने बाद में सिनेमा की आलोचना बंद कर दी’।

उस्मानी के अनुसार “राम राज्य” का पोस्टर संयोग से उनके संग्रह में आया। उन्होंने बताया कि कोलाबा की एक दुकान में अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘डॉन’ का पोस्टर लगा था, जबकि पास में फटा हुआ ‘राम राज्य’ का पोस्टर पड़ा था।

उस्मानी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘जब मैंने इसे देखा तो याद आया कि यही वह फिल्म है जो महात्मा गांधी ने देखी थी। हम ‘क्विज’ में भी इसके बारे में पढ़ते थे।’’

उस्मानी ने कहा कि जब उन्होंने दुकानदार से दाम पूछा तो उसने “डॉन” का पोस्टर लेने को कहा और “राम राज्य” का पोस्टर मुफ्त में दे दिया। उन्होंने कहा कि बाद में कटे-फटे हिस्सों को ठीक कर इसे संरक्षित किया गया।

उस्मानी ने बताया कि वह करीब दो दशक से दुर्लभ पोस्टर जुटा रहे हैं और उनके संग्रह के लगभग हर पोस्टर की एक कहानी है।

“राम राज्य” के पोस्टर में प्रेम अदीब को राम, शोभना समर्थ को सीता और बद्री प्रसाद को महर्षि वाल्मीकि की भूमिका में दर्शाया गया है। इसका संगीत शंकर राव व्यास का और गीत रमेश गुप्ता के लिखे थे।

उन्होंने कहा कि प्रदर्शनी का उद्देश्य युवा पीढ़ी को भारतीय सिनेमा के एक दौर से परिचित कराना भी है। स्कूल के बच्चे और जेन-जी, जेन-अल्फा के दर्शक भी आ रहे हैं।

संग्रह में सोहराब मोदी की “पुकार” (1939) से लेकर 1980 के दशक की चुनिंदा फिल्मों तक के पोस्टर हैं। इनमें “बाजार” (1949), “शीश महल” (1950), “बाजी” (1951), “एक राज” (1953), “रेल का डिब्बा” (1953), “मध भरे नैन” (1955), “उड़न खटोला” (1955), “हकीकत” (1964), “सात हिंदुस्तानी” (1969) और “भुवन शोम” (1969) शामिल हैं।

कुछ पोस्टर छपे हुए नहीं बल्कि मूल पेंटिंग हैं। उस्मानी ने बताया कि “बाज़ी” का पोस्टर उन्हें मुंबई में किसी ने दिया था, जिस पर फफूंद लग गई थी और बाद में उसे साफ कर संरक्षित किया गया।

उद्घाटन में विशिष्ट अतिथि रहे फिल्म इतिहासकार करण बाली ने देव आनंद अभिनीत “बाजी” के बारे में कहा कि इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा में अर्बन नॉयर की शुरुआत की, जिसके बाद क्लब और कैबरे दृश्य फिल्मों में स्थापित हुए।

एक और उल्लेखनीय पोस्टर चेतन आनंद की 1962 के भारत-चीन युद्ध पर आधारित फिल्म ‘हकीकत’ (1964) का है।

लखनऊ के दास्तानगो हिमांशु बाजपेयी ने कहा कि यह पोस्टर असामान्य है क्योंकि इसमें अभिनेता के चित्र की जगह फिल्म के गीत के बोल प्रमुखता से हैं। गीत कैफी आजमी ने लिखे थे और संगीत मदन मोहन का था। “कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियो” जैसे गीत आज भी लोकप्रिय हैं।

बाजपेयी ने कहा कि फिल्म पोस्टर केवल प्रचार सामग्री नहीं, बल्कि अपने समय की चिंताओं और कलात्मक पसंद को भी दर्शाते हैं।

उस्मानी ने बताया कि पुराने पोस्टरों का संरक्षण चुनौतीपूर्ण है। इसके लिए सावधानीपूर्वक रखरखाव चाहिए और लखनऊ में पुनरुद्धार की सुविधाएं सीमित हैं, यह सुविधा मुंबई और दिल्ली जैसे कुछ ही शहरों में उपलब्ध है।

उनके लिए हर पोस्टर अपने समय के सिनेमाई और सामाजिक इतिहास का एक टुकड़ा है और इनमें फटा-पुराना “राम राज्य” का पोस्टर एक असाधारण कहानी समेटे है। अयोध्या लौटे राम पर आधारित फिल्म, एक युवा पत्रकार की गांधी से सिनेमा पर राय बदलने की अपील और महात्मा का सिनेमा हॉल जाकर फिल्म देखने का एकमात्र दर्ज अनुभव, इसकी विशेषता है।

भाषा किशोर आनन्द संतोष

संतोष