चुनाव में फिर से बना ब्राह्मण बड़ा मुद्दा
समर्थन के लिए राजनीतिक दल पढ़ रहे हैं ब्राह्मणों के कसीदे
भाजपा की तरफ दिखाई दे रहा ब्राह्मणों का सर्वाधिक झुकाव
Thursday 10 September 2026 03:26:34 PM
दिनेश शर्मा
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‘ब्राह्मण को दोस्ती करके हराया जा सकता है, लेकिन उससे लड़कर नहीं-अकबर। जंग में उतर जाने के बाद ब्राह्मण को रोकना शेर के मुंह में हाथ देने जैसा है-सिकंदर। अगर ब्राह्मण से कोई वस्तु चाहिए तो उससे मांग लो, धोखे से छीनने पर नामों निशान मिट जाएगा-मुहम्मद गौरी।’ हिंदुस्तान पर शासन करने वाले इन विश्वविख्यात इस्लामिक शासनकर्ताओं की इतिहास में ब्राह्मणों केबारे में यह राय कोई यूं ही नहीं है। ब्राह्मणों की बौद्धिक, रणनीतिक और कूटनीतिक सफलताओं से इतिहास भरा पड़ा है। और भी गैर इस्लामिक शासनकर्ताओं ने कहा हैकि ब्राह्मण को युद्ध में नीति में और शासन में पराजित करना नामुमकिन है, इन्हें केवल इनका विश्वास हासिल करके ही पराजित किया जा सकता है, इसीलिए ब्राह्मण राजनीति में ‘राजयोग’ का कारक और प्रचंड सलाहकार माना गया है! यह बात यहां इसलिए कही जा रही हैकि अब जब चुनाव सामने आ रहे हैं, ब्राह्मणों के महत्व पर चिंतन शुरू हो गए हैं और उनके कसीदे पढ़े जा रहे हैं, उनका समर्थन पाने केलिए राजनीतिक दलों में होड़ लगी है, जिन्हें कलतक मनुवादी कहकर हाशिए पर धकेला जा रहा था, आज उनमें ‘कस्तूरी’ नज़र आने लगी है।
ब्राह्मण हमेशा से ही राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक जीवन का केंद्र बिंदू रहा है, उसको चुनौती दी जाती रही है, मगर उसके बगैर काम भी नहीं चलता है, जिसका प्रमाण यह हैकि आज फिर ब्राह्मण राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक जीवन का मुख्य मुद्दा बन गया है। भाजपा, कांग्रेस, सपा और अन्य राजनीतिक दल इन्हें अपने राजनीतिक एजेंडे में रखकर विधानसभा और लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं। कैसी विडंबना हैकि जनसंख्या कम होते हुए भी ब्राह्मणों की सामाजिक और राजनीतिक ताकत प्रचंड है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के खिलाफ जबरदस्त जातीय नफरत पैदा करके बहुजन समाज पार्टी खड़ी हुई और यही ब्राह्मण मायावती केलिए सत्ता के प्रचंड कारक बने, यह अलग बात हैकि मायावती से यह ब्रह्मास्त्र संभाला नहीं गया और उनके जातीय एवं तुष्टिकरण के एजेंडे के चलते वह ब्रह्मास्त्र लौट गया। आज सभी राजनीतिक दल ब्राह्मणों के सहारे देश में सत्ता पर कब्जा करने की रणनीति पर निकले हैं। संगठनात्मक चुनावों में सभी राजनीतिक दल अपने पदाधिकारियों की सूची जारी करते हुए यह बता रहे हैंकि उन्होंने अपने संगठन में ब्राह्मणों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है।
ब्राह्मणों से नज़दीकियां बढ़ाने केलिए उनके कसीदे पढ़े जा रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपने को ब्राह्मण कह रहे हैं, कहीं से अपना ब्राह्मण गोत्र भी निकाल लिया है, प्रख्यात हिंदू मंदिरों की पूजा करते फिर रहे हैं जबकि कौन नहीं जानता वह एक पारसी की संतान हैं। अखिलेश यादव ने तो अपने पीडीए में पी से ‘पंडित’ का मंजीरा बजाना शुरू कर दिया है। बसपा अध्यक्ष मायावती ने ब्राह्मणों के समर्थन केलिए पहले से ही अपने यहां ब्राह्मण काडर स्थापित किया हुआ है और आज वह ब्राह्मणों की आलोचना सुनना पसंद नहीं करती हैं। भाजपा तो ब्राह्मणों को अपना परंपरागत वोट सहयोगी और समर्थक मानती है और भाजपा में उपेक्षित होने के बावजूद ब्राह्मण भाजपा से दूर नहीं जा रहा है, बाकी राजनीतिक दल भाजपा के इस दावे को सही नहीं मान रहा हो। ब्राह्मणों का लाभ उठाने के लिए समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में जैसे ही ब्राह्मण सेवा शुरू कर की है, भाजपा और कांग्रेस इससे तिलमिलाई हुई हैं। सपा ने सनातन ब्राह्मण समाज के एक संगठन और शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अपने ब्राह्मण एजेंडे से जोड़ लिया है।
आचार्य चाणक्य भी ब्राह्मण थे, जिन्होंने सदियों से सामाजिक राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्र में ब्राह्मणों के बुद्धिबल और उसकी उपयोगिता सिद्ध की है। उन्होंने राजा धनानंद के राजदरबार में अपमान करने पर धनानंद का साम्राज्य उखाड़ फेंका और सड़क चलते एक बालक को पढ़ाया लिखाया और एक समय बाद वहां का राजा बना दिया, जिन्हें आज चंद्रगुप्त मौर्य कहते हैं। राजनीति और समाज में एक तबका ऐसा भी है, जो हमेशा ब्राह्मणों से नफरत और असहज महसूस करता आया है, बल्कि उसका पूरा सामाजिक ताना-बाना और अस्तित्व ही ब्राह्मण विरोध पर टिका है। देश के सात राज्यों में चुनाव होने हैं, जिनमें सभी दल ब्राह्मणों के समर्थन का दावा कर रहे हैं। ब्राह्मणों का सर्वाधिक विरोध बसपा में देखने को मिला है, इसका ब्राह्मणों के खिलाफ आक्रामक संघर्ष का एक इतिहास है, जिसका बसपा को बड़ा नुकसान हुआ है और अंतत: मायावती को ब्राह्मणों की शरण में जाना पड़ा। इस विषय पर इतिहासकारों, राजनीतिज्ञों, सामाजिक चिंतकों ने समय-समय पर अपने-अपने नजरिये से खूब लिखा है। ब्राह्मण हमेशा से अपनी सामाजिक कूटनीतिक राजनीतिक संरचना और उसकी उपयोगिता के कारण दूसरों का ध्यान खींचता रहा है।
बसपा अध्यक्ष मायावती के ब्राह्मण प्रेम से बड़ा ज्वलंत उदाहरण और क्या होगा? ‘ब्राह्मण’ गैर ब्राह्मणों में उत्तर-दक्षिण भारत में समय-समय पर ब्राह्मणों के खिलाफ बड़े-बड़े आंदोलन हुए हैं। आलोचकों ने ब्राह्मणों के गुणों की आदर्श व्याख्याएं भी की हैं। इनकी पुष्टि के लिए अनगिनत दृष्टांत प्रस्तुत किए जा सकते हैं। कुछ लोग अपने नाम के आगेपीछे ‘शर्मा’ लिखकर ब्राह्मण होने का भ्रम पैदा करत हैं और इनकी आड़ में राजनीतिक लाटरी खुली हुई है। जनसंख्या अनुपात कम होने के बावजूद ब्राह्मण हमेशा से एक जटिल चुनौती कायम किए हुए है। शास्त्रों और समाज में ब्राह्मण को विशिष्ट मान्यता दी गई है। आजादी के आंदोलन में ब्राह्मणों का उल्लेखनीय आंदोलन माना जाता है। उत्तर भारत में और खासतौर से यूपी में इन तीन दशकों में ब्राह्मण या ब्राह्मणवाद का विरोध पहले चरम पर पहुंचा और अब यह सत्ता का कारक है। यही कारण है कि कल तक ब्राह्मणों के खिलाफ ज़हर उगलने वाले आज ब्राह्मणों का समर्थन पाने केलिए उनके आगे-पीछे भाग रहे हैं।
अतीत में देखें तो उत्तर-दक्षिण भारत में जाति-भेद का पहला शिकार ब्राह्मण ही हुआ है। दलित समाज के नेताओं ने इसे अपना खास हथियार बनाया और ब्राह्मण का विरोध किया, लेकिन यह भी हुआकि गैर ब्राह्मण भी ब्राह्मणों के पक्ष में उतरे, जिससे आजतक यह सिद्ध नहीं किया जा सका हैकि ब्राह्मण रंगभेद या अन्य तरीके से पक्षपात या दूसरों पर अत्याचार केलिए दोषी हैं। ब्राह्मण विरोधी ताकतों के लंबे ब्राह्मण विरोध केबाद आज उनके लिए सकारात्मक परिवर्तन आया है। राजनीतिक दलों में ब्राह्मणों का विरोध करते-करते उनका समर्थन हासिल करने या समर्थन देने की हवा सी चल पड़ी है। सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाषणों की भाषा ही बदल गई है। राजनीतिक टीकाकारों का अभिमत हैकि फिलहाल तो पहले की तरह ब्राह्मणों का भाजपा के लिए सर्वाधिक समर्थन नज़र आ रहा है।