सुनवाई से पहले जजों को ट्रेनिंग की जरूरत, मद्रास हाई कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?

Published on 18 अग॰ 2026

सुनवाई से पहले जजों को ट्रेनिंग की जरूरत, मद्रास हाई कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?

POCSO मामलों पर मद्रास HC सख्तImage Credit source: getty image

बच्चों से जुड़े यौन अपराध के मामलों में जल्द न्याय दिलाने के लिए देशभर में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स यानी FTSCs बनाई गई हैं. लेकिन अब इन अदालतों में सिर्फ तेजी से सुनवाई ही नहीं, बल्कि संवेदनशील तरीके से सुनवाई की जरूरत पर भी जोर दिया गया है. मद्रास हाई कोर्ट ने POCSO मामलों की सुनवाई करने वाले जजों को बच्चों से बातचीत और उनका बयान दर्ज करने की व्यावहारिक ट्रेनिंग देने की जरूरत बताई है. यह बात ऐसे समय सामने आई है, जब इन विशेष अदालतों पर मामलों का भारी बोझ है.

कानून मंत्रालय ने 23 जुलाई 2026 को राज्यसभा में बताया कि 30 अप्रैल 2026 तक देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 775 FTSC काम कर रही थीं. इनमें 398 विशेष POCSO कोर्ट शामिल हैं. यानी बच्चों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए अलग अदालतें तो हैं, लेकिन सवाल यह है कि वहां सुनवाई के दौरान बच्चों के साथ कितना संवेदनशील व्यवहार हो रहा है. सरकार के आंकड़े बताते हैं कि FTSCs में मामलों की संख्या बढ़ रही है.

लंबित मामलों की संख्या

साल 2023 में 81,471 मामले दर्ज हुए और 76,319 मामलों का निपटारा हुआ. इस साल के अंत में 2,02,175 मामले लंबित थे. 2024 में 88,902 मामले दर्ज हुए और 85,595 मामलों का निपटारा किया गया, लेकिन लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 2,04,122 हो गई. वहीं 2025 में नए मामलों की संख्या तेजी से बढ़ी और 1,43,936 मामले दर्ज हुए, जबकि केवल 66,500 मामलों का निपटारा हो सका. साल के अंत तक लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 2,45,579 हो गई.

जजों की ट्रेनिंग क्यों जरूरी?

इन आंकड़ों से साफ है कि अदालतों में नए मामलों की संख्या बढ़ रही है और लंबित मामलों का दबाव भी बढ़ रहा है. ऐसे में सुनवाई की गति के साथ-साथ प्रक्रिया को बेहतर और संवेदनशील बनाना भी जरूरी हो जाता है. मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि POCSO मामलों में बच्चे से सवाल पूछने का तरीका बेहद महत्वपूर्ण है. जज को ऐसा माहौल बनाना चाहिए, जिसमें बच्चा बिना डरे अपनी बात रख सके. कोर्ट के मुताबिक बच्चे से शुरुआत में नाम या दूसरी सामान्य जानकारी पूछना केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि बच्चे के साथ भरोसे का माहौल बनाने का तरीका भी हो सकता है.

बार-बार अदालत बुलाना कितना सही?

हाई कोर्ट ने सुझाव दिया कि जजों को बच्चों से बातचीत और उनका बयान दर्ज करने के लिए विशेष ट्रेनिंग दी जा सकती है. इसमें पुराने मामलों का अनुभव रखने वाले न्यायिक अधिकारियों की मदद, प्रैक्टिकल ट्रेनिंग और बच्चों से बातचीत के सही तरीके पर अभ्यास शामिल हो सकता है. मामले में पीड़ित बच्चे को दोबारा अदालत में बुलाने की मांग की गई थी. हाई कोर्ट ने बच्चे के हित को देखते हुए उसे दोबारा बुलाने के आदेश को रद्द कर दिया. कोर्ट ने माना कि बच्चे को बार-बार अदालत में बुलाने से वह पुराने डर और मानसिक परेशानी को दोबारा महसूस कर सकता है. इसे secondary victimisation यानी दोबारा मानसिक चोट का कारण माना जा सकता है.

अंकिता

अंकिता

शिव की नगरी काशी से अपने करियर की शुरुआत करने वाली अंकिता पाण्डेय ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पत्रकारिता में अपनी मास्टर्स की डिग्री पूरी की है.  पत्रकारिता में आने के लिए उन्होंने बनारस के लोकल न्यूज पेपर "काशीवार्ता" से अपनी शुरुआत की, बाद में दिल्ली जैसे महानगरी का रुख करते हुए उन्होंने TV9 भारतवर्ष में अक्टूबर साल 2023 से जुड़ी. आज वह इस ऑर्गनाइजेशन में बतौर सब-एडिटर काम कर रही हैं. क्राइम, एंटरटेनमेंट और अन्य सभी को न्यूज के साथ विजुअल तरीके से पेश करने में रुचि है. पत्रकारिता के अलावा कविताएं लिखना, फोटोग्राफी करना और म्यूजिक का भी शौक रखती हैं.

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