अमिताभ कांत का कॉलम:हमारे पास कहने को बहुत कुछ है, पर दुनिया को उन्हें सुनाएं तो
15 मिनट पहले
- कॉपी लिंक

अमिताभ कांत नीति आयोग के पूर्व सीईओ और भारत के पूर्व जी-20 शेरपा
भारत में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल 44 सम्पत्तियां हैं और 69 साइट अस्थाई सूची में हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन 3600 से अधिक केंद्रीय संरक्षित स्मारक हैं तथा राज्य पुरातत्व विभागों और धार्मिक ट्रस्टों के तहत भी बहुत-से स्थल हैं।
इनमें से कई जगहों पर पर्यटक शानदार वास्तुकला या धार्मिक स्थलों को देख तो लेते हैं, लेकिन इनके बारे में उन्हें कम ही जानकारी मिल पाती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि उस स्थल की कहानी दूरदराज के किसी म्यूजियम या रिजर्व कलेक्शन में रखी होती है।
हैरिटेज मैनेजमेंट पर नीति आयोग की एक रिपोर्ट में राखीगढ़ी, हस्तिनापुर, धोलावीरा, शिवसागर और आदिचनल्लूर जैसे प्रमुख स्थलों पर साइट म्यूजियमों का नेटवर्क बनाने का प्रस्ताव दिया गया है। हम्पी और सारनाथ में फ्लैगशिप परियोजनाओं की सिफारिश की गई है। संसदीय समितियों ने भी म्यूजियम और पुरातात्विक स्थलों पर इंटिग्रेटेड विजिटर सेंटर बनाने, बेहतर सुविधाएं देने और तकनीक की मदद से कहानी कहने की सुविधा देने की हिमायत की है।
हम सुनिश्चित करें कि हर विश्व धरोहर स्थल के पास एक म्यूजियम या इंटरप्रिटेशन सेंटर हो। उसका आकार-प्रकार संबंधित स्थल के अनुरूप हो सकता है, लेकिन उद्देश्य गंभीर होना चाहिए। ऐसे म्यूजियम में खुदाई से निकली वस्तुएं रखी जाएं, शोध केंद्र हों और स्थानीय समुदायों से जुड़े कार्यक्रम भी आयोजित हों। स्थानीय शिल्प और कला के प्रदर्शन को भी जगह दी जाए तो ये स्मारक ऐसे संस्थान बन सकते हैं, जो रोजगार पैदा करें, स्थानीय गौरव को बढ़ाएं और पर्यटकों को अधिक ठहराव के लिए आकर्षित करें।
भारत में सरकारी परियोजनाओं के अलावा प्राइवेट म्यूजियम और सार्वजनिक-निजी साझेदारियां भी सामने आ रही हैं। किरण नादर म्यूजियम ऑफ आर्ट दिल्ली में एक बड़ा परिसर बना रहा है, जिसे डेविड अडजाये ने डिजाइन किया है।
एक लाख वर्ग मीटर के इस परिसर में गैलरीज के साथ परफॉर्मेंस के लिए स्थान और लर्निंग सेंटर भी हैं। बेंगलुरु के म्यूजियम ऑफ आर्ट एंड फोटोग्राफी ने डिजिटल-फर्स्ट नजरिया अपनाते हुए संरक्षण और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में साझेदारियां की हैं।
मुंबई का डॉ. भाऊ दाजी लाड संग्रहालय दिखाता है कि साझा प्रबंधन से किसी संस्था को कैसे पुनर्जीवित किया जाता है। भुज के स्मृतिवन और पटना के बिहार म्यूजियम जैसे प्रोजेक्ट म्यूजियम को शहर के सामाजिक परिवेश का हिस्सा मानते हैं।
भारत के कंपनी एक्ट के तहत पात्र कंपनियों को अपने औसत शुद्ध लाभ का 2% हिस्सा सीएसआर (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) पर खर्च करना जरूरी होता है। सीएसआर विषयों में कला, संस्कृति और हेरिटेज संरक्षण भी शामिल हैं। फिर भी संस्कृति पर सीएसआर फंड का 3% से भी कम हिस्सा खर्च होता है।
इसके लिए सरकारी फंडिंग भी राष्ट्रीय बजट के 1% से भी कम है। जबकि अमेरिका में 2025 में निजी परोपकारी संस्थाओं ने कला, संस्कृति, मानविकी के क्षेत्र में 27 अरब डॉलर से अधिक का योगदान दिया। यूरोपीय कंपनियों ने भी ऐतिहासिक स्थलों के पुनरुद्धार के लिए पैसा दिया।
अगर हम म्यूजियमों में निवेश को सामाजिक खर्च के तौर पर देखें तो सीएसआर बोर्ड और परोपकारी संस्थाएं हम्पी, कोलकाता या दिल्ली के म्यूजियमों को ब्रांडिंग, शिक्षा व पर्यटन आधारित रोजगार के क्षेत्र में साझेदार के तौर पर देख सकेंगी, न कि दान पाने वाली संस्था के तौर पर।
भारत को नेशनल म्यूजियम, साइट म्यूजियम और सिटी म्यूजियमों का ऐसा नेटवर्क बनाने की जरूरत है, जो राजवंशों और पुरावशेषों के साथ ही स्थानों और समुदायों की कहानी भी बताए। दिल्ली के नेशनल म्यूजियम की हड़प्पा गैलरी में मोहनजोदड़ो की नृत्य करती युवती, पशुपति मुहर, राखीगढ़ी से मिला कंकाल और उस वक्त के पुरावशेष एकसाथ रखे गए हैं।
यह बताता है कि कैसे एक फोकस्ड गैलरी शहरी विकास, शिल्प और आस्था के हमारे राष्ट्रीय नैरेटिव को आधार देती है। अगर भारत अपने विश्व धरोहर स्थलों में इस प्रकार के संस्थान बना सकता है, कोलकाता के इंडियन म्यूजियम जैसे पुराने संग्रहालयों का आधुनिकीकरण कर सकता है और रायसीना हिल को एक म्यूजियम क्षेत्र में तब्दील कर सकता है तो उसके पास यकीनन अपनी सभ्यता के कथानक को भावी पीढ़ी तक ले जाने वाला इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद होगा।
अतीत कोई ऐसी कहानी नहीं है, जिसे सीमित दायरे में ही सुनाया जाए। अगर हम अपने संस्थानों को बेहतर तरीके से बनाएं तो हमारा अतीत वो सबसे ताकतवर चीज हो सकती है, जिसे हम दुनिया के सामने पेश कर सकते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
.
खबरें और भी हैं...
सैयद अता हसनैन का कॉलम: क्या शिया ईरान के खिलाफ सुन्नी गठजोड़ बनाया गया है?

- कॉपी लिंक
शेयर
प्रियदर्शन का कॉलम: चुनाव लड़ना ज्यादा जरूरी है या देश में कोई बदलाव लाना?

- कॉपी लिंक
शेयर
पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: सावन को चाहे जैसे मनाएं, पर एक तप से भी गुजरें

- कॉपी लिंक
शेयर
मेघना पंत का कॉलम: पीड़िता को ही कठघरे में खड़ा करने की आदत हमें क्या बताती है?

- कॉपी लिंक
शेयर