Hindi Kahani: नीरजा किचन में सुबक रही थी। मेरे कानों में उसका रूदन पड़ा।
‘‘नीरजा, तुम रो क्यों रही हो?’’उसने कोई जवाब नहीं दिया। वह पहले की तरह सुबकती रही। मुझसे रहा न गया। सेाफे से उठकर किचेन में आयी। प्यार से उसके बालों को सहलाती हुए अपने कथन को दोहराया। रूंधे कंठ से बोली,‘‘मेरा एक महीने के बाद बीए की परीक्षा है। पढने के लिए मोबाइल नहीं है।’’ नीरजा अपनी पढाई मोबाइल से करती थी और उसके पास साधारण मोबाइल था।
‘‘बस इतनी सी बात। परेशान मत होओ। मेरे पास एंड्रॉयड फोन है। तुम्हें दे दूंगी।’’सुनकर उसके होठों पर मुस्कान के भाव तिर गये।
नीरजा को मैने अपनी वृद्ध मां के देखभाल के लिए रखा था। पहले उसकी मां थी बाद में गांव चली गयी तो नीरजा को छोड़ गयी। जवान बेटी केा महानगर में छोड़ना कोई आसान काम नहीं था। इसके लिए बड़ा जिगर चाहिए। नीरजा सुदूर पूर्वी यूपी एक गांव की रहने वाली थी। पिता आटो चलाता था। घर में आर्थिक तंगी बनी रहती थी। नीरजा पढने में होशियार थी। वह पढलिखकर कुछ बनना चाहती थी। इण्टर तक की पढाई गांव में ही की। उसके पास चप्पल तक नहीं थे। नंगे पाव स्कूल जाती। मां गांव के एक संपन्न घर में खाना बनाने का काम करती थी। घर में एक छोटे भाई के अलावा अतिवृदध दादी थी। उनकी देखभाल करना आसान न था। छोटा भाई और वह खुद स्कूल चली जाती तब दादी के देखभाल के लिए कोई नहीं रहता। ऐसे में वह टिफिन के वक्त भागते हुए अपने दादी केा खाना खिलाने के लिए नंगे पाव आती।
अक्सर वापस स्कूल जाने में देर हो जाती तो मास्टर साहब उसे डांट लगाने से बाज नहीं आते। कभी—कभी तो छडी से मार भी देते। वह कुछ देर के लिए आंसू बहाती फिर पोंछ कर पढने बैठ जाती। वह सब सहते हुए अपनी पढाई के साथ—साथ दादी की भी देखभाल करती। उसकी दिली इच्छा छोटे भाई केा किसी प्राइवेट स्कूल में पढाने की। जब पहली बार हाईस्कूल में उसे वजीफा के रूप में 3000 हजार रूपये मिले तो तत्काल उसका दाखिला अंग्रेजी स्कूल में करवा दिया। गांव में सब उसकी “शादी'' की जिद करते। उसकी मां ने ठान लिया था कि वह नीरजा को अपनी तरह अनपढ नहीं बनायेगी बल्कि पढा लिखाकर अच्छा नागरिक बनायेगी। उसके पिता भी ''शादी'' के पक्ष में थे। वह नीरजा को बोझ समझते थेे। आये दिन गांव वालों के ताने से अजीज आकर नीरजा की मां ने एक एप के जरिए महानगर में मेरे घर काम पकड़ लिया। बाद में नीरजा केा मेरे यहां रखवा कर निशिंचत होकर गांव चली गयी। वह उच्च शिक्षा के पक्ष में थी।
नीरजा की पगार थी तेरह हजार रुपये हर माह। वह सारे रूपये अपने मां के पास भेज देती। पिता के ऊपर कर्जे थे जिसे वह अपने पगार से उतारती। इसके अलावा घर में जो भी खाना बनता वह खाती। वह दिन भर मेरे मां के पास रहती। बड़ा सा फ्लैट था जिसमें हर सुख सुविधा थी। सुबह—सुबह उसके जिम्मे बर्तन मांजने के अलावा झाडू पोंछा फिर खाना बनाकर मां को देना था। ज्यादा काम नहीं था। इसके बाद सारा दिन वह पढती या फिर सेाती। मुझे उससे सहानुभूति थी। मैं भी चाहती थी कि वह पढलिखकर अच्छा काम करें। एक रोज कहने लगी,‘‘यहां न आती तो अब तक मेरी “शादी हो चुकी हेाती।’’वह आगे कहती रही,‘‘दीदी, मैं कुछ बनना चाहती हूं। गांव के लेाग बहुत खराब है। मेरे बारें में गंदी—गंदी बातें करते है। उनकी नजर में मेैं बेशर्म थी क्योंकि मैं ''शादी के पक्ष में नहीं थी।’’ रूढिवादी सोच वाले गांववाले के बारें में क्या कहा जाए। लड़की जवान दिखी नहीं कि हाथ पीेले कर दो। बाद में पता नहीं क्या गुल खिलाए।
नीरजा का आज जन्मदिन था। मैंने उसके लिए केक मंगवाया साथ में एक नया परिधान। पहनकर वह बेहद खुश थी। केक काटते हुए उसके आंखों में आंसू आ गये।
‘फिर रोने लगी,‘‘मैंने टोका।
‘‘इतना प्यार दुलार मुझे आजतक नहीं मिला।’’वह भावविहृवल थी।
‘‘तुम मेरी छोटी बहन की तरह हो। जब बीए पास करके कुछ बन जाओगी तब मैं समझूंगी कि तुमने मेरे प्यार दुलार की कीमत अदा कर दी।’’ उसने हम सबके पैर छूए। यही वक्त था नीरजा को गिफ्ट देने का। मैंने पर्स में से एक नया एंड्रॉयड मोबाइल निकाल कर उसकी तरफ बढाया। मोबाइल लेते हुए उसके आंखों से मेरे प्रति कृतज्ञता के छलक उठें। उस क्षण मुझे असीम आनंद की अनुभूति हो रही थी। काम करने तो कई आयी मगर नीरजा जैसी कोई नहीं थी। किसी ने रूपये चुराये तो कोई किचेन में चोरी चोरी कुछ भी खा लिया। मगर नीरजा ने ऐसा कभी नहीं किया। आज मेरे दिल में उसके प्रति परमसंतोष का भाव था।
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