ये नैरोगेज का स्टेशन...: ट्रैक-प्लेटफॉर्म झाड़ियों में, छत गायब - Gwalior News

Published on 8 अग॰ 2026

ये नैरोगेज का स्टेशन...:ट्रैक-प्लेटफॉर्म झाड़ियों में, छत गायब

ग्वालियर32 मिनट पहलेलेखक: राजू शर्मा

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देश की सबसे पतली (0.61 मीटर) नैरोगेज रेल लाइन सरकारी लापरवाही की भेंट चढ़ गई। 1905 में शुरू हुई ऐतिहासिक ट्रेन 2020 तक दौड़ती रही। इसके बाद रेलवे ने इसका परिचालन तो बंद कर दिया, लेकिन 198 किलोमीटर लंबे ट्रैक, 29 स्टेशनों और उससे जुड़ी अरबों रुपए की सरकारी संपत्ति को लावा​रिस छोड़ दिया गया।

दैनिक भास्कर ने ग्वालियर से श्योपुर तक पूरे नैरोगेज कॉरिडोर के जमीनी हालात देखे। पड़ताल में सामने आया कि जहां कभी ट्रेन की सीटी गूंजती थी, वहां आज सड़कें बिछी हैं। रेलवे की जमीन पर मकान, दुकानें, गुमटियां और झोपड़ियां खड़ी हैं। कई जगह पटरियां ही नजर नहीं आतीं। 20 से ज्यादा स्टेशन खंडहर बन चुके हैं।

प्लेटफॉर्म झाड़ियों में दब गए हैं, भवनों की छतें टूट चुकी हैं और लोहे की संरचनाएं जंग खा रही हैं। ग्वालियर से श्योपुर के बीच बुजुर्ग लोगों से बात की तो वे बोले- कभी 5 रुपए में सफर हो जाता था, अब 50 में भी करना मुश्किल हो गया है।

ट्रैक विकास के दावे.. कब्जों पर चुप्पी देश की सबसे छोटी जिस नैरोगेज लाइन को 5 साल तक बचाया नहीं, अब उसके विकास के दावे किए जा रहे हैं। मास्टर प्लान-2035 में इस पर 18 से 30 मीटर चौड़ी वैकल्पिक सड़क प्रस्तावित है। लेकिन अतिक्रमण के सवाल पर सबकी चुप्पी है। रेलवे अब तक जमीन राज्य सरकार को हस्तांतरित भी नहीं कर पाया है।

जहां यात्रियों से रहती थी रौनक, वहां जंगल सा नजारा... यह नैरोगेज रेल का बामौर गांव स्टेशन है। यहां से कभी ट्रेन गुजरती थी और यात्री सवार होते थे। अब स्टेशन के चारों ओर जंगल सा नजारा है। छत गायब है, टिकट घर (इनसेट) खंडहर है, नैरोगेज ट्रैक झाड़ियों और जमीन में दब चुका है। बर्बादी की यह तस्वीर अफसरों की लापरवाही का नतीजा है।

निर्माण: 1894-95 में, ट्रेन पर ब्रेक 2020 में 1894-95 में सिंधिया रियासत ने इस लाइन का निर्माण शुरू कराया। 1905 में यह ट्रेन दौड़ने लगी। 400 किमी तक नेटवर्क फैला। कई लाइनें ब्रॉडगेज में बदल गईं। 2020 में ट्रेन बंद हुई तो पूरी लाइन लावारिस छोड़ दी।

जानें: 198 किमी नैरोगेज ट्रैक का गणित 1 पटरी की लंबाई: 6 मीटर, दोनों साइड 12 मी. दोनों तरफ कुल पटरियां: 66000 (डबल साइड) कुल वजन: 5,900.4 टन (59 लाख किलो) कीमत: ₹17.70 करोड़ रु. (लोहा 30 प्रति किलो)

सवाल: रेलवे ने क्यों नहीं की रखवाली? सालों तक रेलवे अपनी ही संपत्ति की रखवाली क्यों नहीं कर सका? इस दौरान अतिक्रमण बढ़ते गए, सरकारी जमीन घिरती गई। रेल विरासत रेलवे अधिकारियों की अनदेखी के बीच आंखों के सामने उजड़ती रही।

चंबल सफर

ग्वालियर से श्योपुर के बीच 29 स्टेशनों से गुजरती थी नैरोगेज... ग्वालियर स्टेशन के प्लेटफॉर्म-5 से नैरोगेज ट्रेन रवाना होती थी। घोसीपुरा, मोतीझील, मिलावली, बामौर गांव, अंबिकेश्वर, सुमावली, थरा, जौरा-अलापुर, सिकरौदा, भटपुरा, कैलारस, सेमई, पीपल चौकी, सबलगढ़, रामपहाड़ी, विजयपुर, कैमाराकलां, वीरपुर, सिल्लीपुर, इकडोरी, टर्राकलां, सिरोनी रोड, खोजीपुरा, दुर्गापुरी, गिरधरपुर और दांतरकलां होते हुए ट्रेन श्योपुरकलां पहुंचती थी।

जिम्मेदार बोले

नैरोगेज की जमीन पर कब्जे हटाए जाएंगे, रेलवे ग्रीन बेल्ट बनाएगा रेलवे ने ग्वालियर से श्योपुर तक नैरोगेज की जमीन को लावारिस नहीं छोड़ा है। सभी कब्जे हटाए जाएंगे। ग्वालियर से बानमोर के बीच स्टेशन और रेलवे की जमीन रेलवे लैंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (RLDA) को सौंप दी है। अथॉरिटी तय करेगी कि इसका उपयोग कैसे किया जाए। रेलवे नैरोगेज ट्रेक पर वन विभाग के सहयोग से ग्रीन बेल्ट विकसित करेगा। इस खाली जमीन पर बड़ी संख्या में पौधे लगाए जाएंगे, ताकि यह क्षेत्र हरित पट्टी बन सके। -डॉ शिवम शर्मा, सीपीआरओ उत्तर मघ्य रेलवे

नैरोगेज की नरकगाथा... 198 किमी ट्रैक पर 5 साल में हजारों कब्जे, 29 स्टेशन खंडहर, अरबों की विरासत बर्बाद

खुलासा-1: जहां ट्रेन दौड़ती थी, वहां अब सड़कें घोसीपुरा से लेकर बामौर, सुमावली, कैलारस और कई अन्य हिस्सों में रेलवे ट्रैक सड़क में बदल चुका है। कई जगह डामर की सड़क सीधे पटरियों के ऊपर बना दी गई। वर्षों तक किसी रेलवे अधिकारी ने इसे रोकने की कोशिश नहीं की।

खुलासा-2: रेलवे की भूमि पर कब्जों का साम्राज्य ट्रैक के दोनों ओर रेलवे की आरक्षित जमीन पर मकान और प्लाट कट गए हैं। दुकानें, गुमटियां और झोपड़ियां बन चुकी हैं। रेलवे नियमों के मुताबिक ट्रैक के दोनों ओर सुरक्षा क्षेत्र होना चाहिए। चित्र में ट्रैक से कुछ फीट की दूरी पर रेलवे की जमीन पर बना दो मंजिला मकान।

खुलासा-3: स्टेशन अब खंडहर-कचरा ठिया बने भास्कर टीम ने ग्वालियर से श्योपुर तक के रूट पर 20 से ज्यादा स्टेशन देखे। अधिकांश भवनों की छतें टूट चुकी हैं। दरवाजे-खिड़कियां गायब हैं। लोहे की संरचनाएं चोरी हो चुकी हैं या जंग खा रही हैं। वीरपुर नैरोगेज स्टेशन को लोगों ने कचरा ठिया बना लिया है।

खुलासा-4: न गार्ड न निगरानी, जुए के फड़ जमे 2020 में नैरोगेज ट्रेन बंद हुई। इसके बाद न सुरक्षा गार्ड तैनात किए गए, न नियमित निगरानी हुई और न ही अतिक्रमण रोकने की कार्रवाई। मोतीझील स्टेशन में लोग जुआ खेलते मिले। करोड़ों नहीं, अरबों रुपए की सरकारी संपत्ति बिना संरक्षण के छोड़ दी गई।

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