Khair Assembly Caste Equations: खैर विधानसभा के जातिगत समीकरण 2027

Published on 4 अग॰ 2026

अलीगढ़ जिले की खैर विधानसभा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित, किसान बहुल और जाट प्रभाव वाली प्रमुख सीट है। Khair Assembly Caste Equations को देखें तो जाट, ब्राह्मण, अनुसूचित जाति, मुस्लिम, वैश्य, ठाकुर और दूसरे पिछड़े समुदाय यहां चुनावी नतीजे को प्रभावित करते हैं। वर्ष 2026 की अंतिम मतदाता सूची में खैर विधानसभा के कुल 3,56,103 मतदाता दर्ज हैं। इनमें 1,94,336 पुरुष, 1,61,753 महिला और 14 थर्ड जेंडर मतदाता शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों के जातिगत समीकरण / जातीय समीकरण और ‘सोशल इंजीनियरिंग’ पर चुनावी परिणाम काफी हद तक निर्भर करता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों की मानें तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 एक ऐसा निर्णायक अवसर है जो राज्य की दीर्घकालिक राजनीतिक दिशा को स्पष्ट करेगा।

खैर विधानसभा पर वर्तमान में भाजपा का कब्जा है। वर्ष 2024 के उपचुनाव में भाजपा के सुरेंद्र दिलेर ने समाजवादी पार्टी की चारू कैन को 38,393 मतों से हराया था। इसके बाद मई 2026 में सुरेंद्र दिलेर को प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री बनाया गया। इससे पहले अनूप प्रधान ने 2017 और 2022 में लगातार दो बार भाजपा के लिए यह सीट जीती थी।

खैर विधानसभा एक नजर में

विवरणजानकारी
विधानसभा क्षेत्रखैर
विधानसभा संख्या71
जिलाअलीगढ़
लोकसभा क्षेत्रअलीगढ़
आरक्षणअनुसूचित जाति
वर्तमान विधायकसुरेंद्र दिलेर
वर्तमान विधायक की पार्टीभारतीय जनता पार्टी
वर्तमान पदविधायक एवं राज्यमंत्री
नवीनतम चुनाव2024 उपचुनाव
2024 उपचुनाव जीत का अंतर38,393 वोट
2026 कुल मतदाता3,56,103
पुरुष मतदाता1,94,336
महिला मतदाता1,61,753
थर्ड जेंडर मतदाता14
प्रमुख सामाजिक समूहजाट, ब्राह्मण, दलित, मुस्लिम, वैश्य और ठाकुर
क्षेत्रीय स्वरूपग्रामीण, कस्बाई और कृषि प्रधान
प्रमुख क्षेत्रखैर, जट्टारी, टप्पल और आसपास के गांव
प्रमुख मुद्देजाम, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन, रोजगार और आवारा पशु

खैर विधानसभा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। इसका अर्थ है कि यहां केवल अनुसूचित जाति वर्ग का प्रत्याशी विधानसभा चुनाव लड़ सकता है, लेकिन मतदान सभी जातियों और समुदायों के मतदाता करते हैं। यही कारण है कि प्रत्याशी की दलित सामाजिक पहचान के साथ जाट, ब्राह्मण, मुस्लिम और दूसरे समुदायों में उसकी स्वीकार्यता जीत का सबसे महत्वपूर्ण आधार बनती है।

Khair Assembly Caste Equations की सबसे प्रमुख धुरी जाट मतदाताओं के इर्द-गिर्द घूमती है। पुराने चुनावी आकलनों में खैर विधानसभा में जाट मतदाताओं की संख्या लगभग 1.10 लाख से 1.25 लाख के बीच बताई गई थी। सीट पर ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या को अलग-अलग पुराने आकलनों में करीब 50 हजार से 90 हजार के बीच रखा गया। अनुसूचित जाति मतदाता लगभग 45 से 50 हजार, मुस्लिम करीब 40 हजार, वैश्य लगभग 25 हजार और ठाकुर मतदाता करीब 20 हजार बताए गए थे।

इन अनुमानों में बड़ा अंतर बताता है कि विधानसभा स्तर पर उपलब्ध जातिवार संख्याएं आधिकारिक नहीं हैं। राजनीतिक दल, स्थानीय संगठन और चुनावी विश्लेषक अपने बूथवार आकलन के आधार पर अलग-अलग संख्या बताते हैं। वर्ष 2026 में मतदाता आधार भी लगभग 50 हजार कम हुआ है, इसलिए पुराने जातीय आंकड़ों को वर्तमान सटीक मतदाता संख्या नहीं माना जा सकता।

खैर विधानसभा का पुराना संकेतात्मक जातीय समीकरण

सामाजिक समूहपुराने चुनावी आकलनों में अनुमानचुनावी भूमिका
जाटलगभग 1.10 से 1.25 लाखसीट का सबसे प्रभावशाली किसान समुदाय
ब्राह्मणलगभग 50 से 90 हजारभाजपा सहित प्रमुख दलों के लिए अहम
अनुसूचित जातिलगभग 45 से 50 हजारआरक्षित सीट पर प्रत्याशी और मतदान दोनों में निर्णायक
मुस्लिमलगभग 40 हजारविपक्षी गठबंधन का महत्वपूर्ण आधार
वैश्य एवं व्यापारीलगभग 25 हजारखैर, जट्टारी और बाजार क्षेत्रों में प्रभाव
ठाकुर/राजपूतलगभग 20 हजारग्रामीण सवर्ण समीकरण में महत्वपूर्ण
अन्य OBCअलग-अलग गांवों में प्रभावकरीबी मुकाबले में बूथवार निर्णायक
महिला एवं युवाबड़ी संख्यारोजगार, शिक्षा, सुरक्षा और सुविधाओं से प्रभावित

निर्वाचन आयोग मतदाताओं की जाति अथवा धर्म के आधार पर विधानसभा-वार आधिकारिक सूची जारी नहीं करता। इसलिए ऊपर दी गई संख्या पुराने स्थानीय और राजनीतिक अनुमान हैं। इन्हें जोड़कर कुल मतदाता संख्या निकालना या इन्हें 2026 की आधिकारिक जातिवार मतदाता सूची मानना उचित नहीं होगा।

2026 में खैर विधानसभा के 3,56,103 मतदाता

10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची के अनुसार खैर विधानसभा में कुल 3,56,103 मतदाता हैं। पुरुष मतदाताओं की संख्या 1,94,336 और महिला मतदाताओं की संख्या 1,61,753 है। थर्ड जेंडर श्रेणी में 14 मतदाता पंजीकृत हैं।

मतदाता वर्ग2026 मतदाता
पुरुष मतदाता1,94,336
महिला मतदाता1,61,753
थर्ड जेंडर मतदाता14
कुल मतदाता3,56,103

पुरुष और महिला मतदाताओं के बीच 32,583 का अंतर है। प्रति एक हजार पुरुष मतदाताओं पर लगभग 832 महिला मतदाता दर्ज हैं। महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 45.42 प्रतिशत है।

खैर विधानसभा का महिला मतदाता आधार 2024 के उपचुनाव में भाजपा और समाजवादी पार्टी के दोनों प्रमुख उम्मीदवारों को मिले संयुक्त मतों से भी अधिक है। इसलिए राशन, स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, परिवहन, महंगाई और घरेलू आय से जुड़े विषय जातीय समीकरण के साथ समान रूप से प्रभावी हो सकते हैं।

मतदाता पुनरीक्षण के बाद 50,444 नामों की शुद्ध कमी

विशेष पुनरीक्षण से पहले खैर विधानसभा में 4,06,547 मतदाता दर्ज थे। अंतिम सूची में यह संख्या घटकर 3,56,103 रह गई। इस प्रकार 50,444 मतदाताओं की शुद्ध कमी हुई, जो पुराने आधार का करीब 12.41 प्रतिशत है।

मतदाता सूची की स्थितिमतदाता
विशेष पुनरीक्षण से पहले4,06,547
2026 की अंतिम सूची3,56,103
शुद्ध कमी50,444
अनुमानित गिरावटलगभग 12.41%

यह कमी 2024 के उपचुनाव की 38,393 वोट वाली जीत से करीब 12 हजार अधिक है। हालांकि इससे किसी पार्टी, जाति या समुदाय को निश्चित लाभ अथवा नुकसान मानना सही नहीं होगा। नाम हटने के पीछे मृत्यु, स्थानांतरण, दोहरी प्रविष्टि और अनुपस्थिति सहित कई प्रशासनिक कारण हो सकते हैं।

हटाए गए मतदाताओं की राजनीतिक पसंद, जाति या धर्म के अनुसार कोई आधिकारिक विवरण उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद 50 हजार से अधिक मतदाताओं की कमी से सभी दलों को अपने पुराने समर्थकों और बूथवार सूची का दोबारा सत्यापन करना होगा।

अलीगढ़ जिले की तीसरी सबसे बड़ी विधानसभा बनी खैर

वर्ष 2026 की अंतिम मतदाता सूची में अलीगढ़ जिले के कुल मतदाताओं की संख्या 24,10,173 है। मतदाता संख्या के लिहाज से अतरौली जिले की सबसे बड़ी विधानसभा है। इसके बाद इगलास और खैर का स्थान है।

अलीगढ़ जिले की विधानसभा2026 कुल मतदाता
अतरौली3,58,548
इगलास3,57,318
खैर3,56,103
बरौली3,44,136
कोल3,42,818
छर्रा3,40,647
अलीगढ़3,10,603
जिला कुल24,10,173

अतरौली और खैर के मतदाता आधार में केवल 2,445 का अंतर है। इससे स्पष्ट है कि खैर जिले की सबसे बड़ी ग्रामीण सीटों में शामिल है। यहां गांव, कस्बा और बूथ स्तर पर मजबूत संगठन तैयार करना सभी प्रमुख दलों के लिए जरूरी रहेगा।

2024 के मुकाबले 52,638 मतदाता कम

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के समय खैर विधानसभा खंड में कुल 4,08,741 मतदाता दर्ज थे। वर्ष 2026 की अंतिम सूची में संख्या घटकर 3,56,103 रह गई। दोनों सूचियों के बीच 52,638 मतदाताओं का अंतर है, जो 2024 के मतदाता आधार का लगभग 12.88 प्रतिशत है।

चुनाव अथवा सूचीकुल मतदाता
2024 लोकसभा चुनाव4,08,741
2024 विधानसभा उपचुनाव4,06,371
2026 अंतिम मतदाता सूची3,56,103
2024 लोकसभा से 2026 का अंतर52,638 कम

वर्ष 2024 के उपचुनाव में कुल 4,06,371 मतदाता थे, जिनमें से लगभग 1.87 लाख मतदाताओं ने मतदान किया था। उपचुनाव का मतदान प्रतिशत करीब 46.1 प्रतिशत रहा। इसके विपरीत 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान लगभग 61 प्रतिशत था।

मतदाता संख्या और मतदान प्रतिशत के बदलाव से यह स्पष्ट होता है कि केवल सामाजिक समर्थन पर्याप्त नहीं है। जिस दल का बूथ संगठन अपने समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने में सफल होगा, उसे करीबी मुकाबले में महत्वपूर्ण बढ़त मिल सकती है।

जाट मतदाता खैर की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत

खैर विधानसभा को लंबे समय से जाट प्रभाव वाली सीट माना जाता है। खैर, टप्पल, जट्टारी और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में जाट समाज का खेती, ग्राम पंचायत, सहकारी संस्थाओं और किसान संगठनों में मजबूत प्रभाव है। पुराने राजनीतिक आकलन इस समुदाय की संख्या एक लाख से अधिक बताते हैं।

वर्ष 2007 और 2012 में राष्ट्रीय लोकदल ने लगातार दो चुनाव जीते थे। वर्ष 2007 में सत्यपाल सिंह और 2012 में भगवती प्रसाद विधायक चुने गए। आरक्षित सीट होने के बावजूद राष्ट्रीय लोकदल ने दलित उम्मीदवार के साथ अपने जाट-किसान आधार का सफल तालमेल बनाया था।

वर्ष 2017 के बाद भाजपा ने जाट मतों के बड़े हिस्से को अपने दलित, ब्राह्मण, वैश्य और दूसरे हिंदू सामाजिक आधार के साथ जोड़ लिया। भाजपा को राष्ट्रीय लोकदल के वर्तमान गठबंधन का भी लाभ मिल सकता है। लेकिन जाट वोट का वास्तविक हस्तांतरण स्थानीय प्रत्याशी, किसान समस्याओं और गठबंधन कार्यकर्ताओं के तालमेल पर निर्भर करेगा।

वर्ष 2024 के उपचुनाव में भाजपा और रालोद एक साथ थे। भाजपा प्रत्याशी को 1,00,181 वोट मिले और उसने 38,393 मतों से जीत दर्ज की। यह परिणाम बताता है कि कम मतदान के बावजूद गठबंधन अपना संगठित आधार मतदान केंद्र तक पहुंचाने में सफल रहा।

अनुसूचित जाति वोट प्रत्याशी चयन से लेकर नतीजे तक निर्णायक

खैर विधानसभा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। इसलिए भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस और दूसरे दलों को अनुसूचित जाति वर्ग से ही प्रत्याशी उतारना होता है। लेकिन अनुसूचित जाति एक समान राजनीतिक समूह नहीं है। यहां वाल्मीकि, जाटव और अनुसूचित जाति की दूसरी उपजातियों के बीच प्रत्याशी की सामाजिक पहचान का अलग प्रभाव पड़ सकता है।

अनूप प्रधान वाल्मीकि समाज से आते हैं और उन्होंने 2017 तथा 2022 में लगातार दो बार भाजपा को बड़ी जीत दिलाई। वर्ष 2024 में भाजपा ने वाल्मीकि समाज से आने वाले सुरेंद्र दिलेर को उम्मीदवार बनाया। सुरेंद्र दिलेर की पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि और वाल्मीकि पहचान ने भाजपा को अपने गैर-जाटव दलित आधार को मजबूत रखने में मदद की। वर्ष 2026 में उन्हें राज्यमंत्री बनाना भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वाल्मीकि प्रतिनिधित्व के राजनीतिक संदेश के रूप में देखा गया।

बसपा का खैर में पुराना आधार रहा है। पार्टी वर्ष 2002 में सीट जीत चुकी है और 2017 तथा 2022 में दूसरे स्थान पर रही। वर्ष 2022 में बसपा की चारू कैन ने 65,302 वोट हासिल किए थे। हालांकि 2024 के उपचुनाव में बसपा प्रत्याशी केवल 13,365 मतों तक सीमित रह गया।

यह गिरावट बताती है कि बसपा का परंपरागत दलित आधार भाजपा, समाजवादी पार्टी और आजाद समाज पार्टी सहित अलग-अलग विकल्पों की ओर जा सकता है। वर्ष 2027 में बसपा का उम्मीदवार और संगठन अनुसूचित जाति मतों के विभाजन को प्रभावित करेगा।

ब्राह्मण वोट भाजपा की बढ़त का महत्वपूर्ण आधार

खैर विधानसभा में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या को लेकर पुराने आकलनों में बड़ा अंतर मिलता है। कुछ आकलन करीब 50 हजार और कुछ लगभग 90 हजार ब्राह्मण मतदाता बताते हैं। संख्या चाहे जो हो, खैर और जट्टारी के कस्बाई क्षेत्रों तथा अनेक गांवों में ब्राह्मण समाज का चुनावी प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है।

भाजपा ने वर्ष 2017 और 2022 में दलित प्रत्याशी के साथ ब्राह्मण, जाट, वैश्य, ठाकुर और दूसरे गैर-दलित मतदाताओं का बड़ा हिस्सा एकजुट किया। वर्ष 2022 में पार्टी को 1,39,643 वोट और 55.55 प्रतिशत वोट शेयर मिला। इतना बड़ा समर्थन किसी एक जाति के आधार पर संभव नहीं था।

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में खैर विधानसभा खंड में समाजवादी पार्टी भाजपा से 1,401 वोट आगे रही। यह छोटा अंतर बताता है कि ब्राह्मण, जाट और दूसरे भाजपा समर्थक समूहों के मतदान में सीमित कमी भी मुकाबले को प्रभावित कर सकती है।

वर्ष 2027 में भाजपा प्रत्याशी, स्थानीय संगठन और सरकार के प्रति समर्थन ब्राह्मण मतों की दिशा तय करेंगे। विपक्ष किसी स्थानीय ब्राह्मण नेतृत्व या व्यापक सामाजिक समीकरण के जरिए भाजपा के इस आधार में सीमित सेंध लगाने की कोशिश कर सकता है।

मुस्लिम मतदाता विपक्ष के लिए महत्वपूर्ण, लेकिन अकेले पर्याप्त नहीं

पुराने चुनावी आकलनों में खैर विधानसभा में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 40 हजार बताई गई है। खैर कस्बे, जट्टारी, टप्पल और आसपास के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं की महत्वपूर्ण मौजूदगी है।

समाजवादी पार्टी के लिए मुस्लिम वोट महत्वपूर्ण शुरुआती आधार हो सकता है। लेकिन खैर जैसी जाट और ब्राह्मण प्रभाव वाली सुरक्षित सीट पर केवल मुस्लिम और सीमित दलित समर्थन से भाजपा को हराना कठिन है। विपक्ष को जाट, जाटव, वाल्मीकि, ब्राह्मण और छोटे OBC समुदायों का भी समर्थन जोड़ना होगा।

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने खैर विधानसभा खंड में भाजपा पर 1,401 वोट की बढ़त बनाई थी। समाजवादी पार्टी के बिजेंद्र सिंह को 95,606 और भाजपा के सतीश कुमार गौतम को 94,205 वोट मिले। बसपा को 31,037 मत प्राप्त हुए।

लोकसभा चुनाव के कुछ महीने बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में तस्वीर बदल गई। भाजपा को 1,00,181 और समाजवादी पार्टी को 61,788 वोट मिले। इससे साफ है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार, मतदान प्रतिशत और स्थानीय गठबंधन अलग परिणाम पैदा कर सकते हैं।

वैश्य और व्यापारी मतदाताओं का कस्बाई प्रभाव

पुराने आकलनों में वैश्य और व्यापारी मतदाताओं की संख्या करीब 25 हजार बताई गई थी। खैर और जट्टारी के बाजार, दुकानें, कृषि व्यापार, परिवहन और छोटे व्यवसाय इस वर्ग की आर्थिक तथा सामाजिक भूमिका को बढ़ाते हैं।

भाजपा को व्यापारी वर्ग में लंबे समय से मजबूत समर्थन मिलने की उम्मीद रहती है। कानून-व्यवस्था, बिजली, सड़क, कर व्यवस्था, बाजार में जाम और परिवहन इस वर्ग के प्रमुख मुद्दे हैं।

खैर के मुख्य बाजार में जाम की समस्या लगातार उठती रही है। स्कूल बसों, निजी वाहनों और बाजार में बढ़ती आवाजाही के कारण सुबह-शाम लोगों को परेशानी होती है। सड़क सुधार के बावजूद स्थायी ट्रैफिक प्रबंधन की मांग बनी हुई है।

विपक्ष स्थानीय जाम, व्यापारिक सुविधाओं और सड़क की गुणवत्ता को मुद्दा बनाकर व्यापारी मतदाताओं में भाजपा की बढ़त कम करने की कोशिश कर सकता है।

ठाकुर और दूसरे सवर्ण समुदाय

पुराने चुनावी अनुमानों में खैर विधानसभा के ठाकुर अथवा राजपूत मतदाताओं की संख्या करीब 20 हजार बताई गई थी। संख्या जाट और ब्राह्मण मतदाताओं की तुलना में कम हो सकती है, लेकिन कई ग्रामीण मतदान केंद्रों पर इनका प्रभाव महत्वपूर्ण है।

ठाकुर मतदाता भाजपा के व्यापक सवर्ण और ग्रामीण हिंदू आधार में शामिल माने जाते हैं। विपक्ष मजबूत स्थानीय प्रत्याशी, किसान मुद्दों या भाजपा के भीतर टिकट असंतोष के जरिए इस आधार में सीमित सेंध लगाने की कोशिश कर सकता है।

छोटे OBC समुदाय बूथ स्तर पर बदल सकते हैं परिणाम

खैर विधानसभा में सैनी, पाल, बघेल, कश्यप, प्रजापति, लोधी और दूसरे पिछड़े समुदाय अलग-अलग गांवों में मौजूद हैं। इनकी विधानसभा-स्तरीय आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है, लेकिन बूथवार मतदान में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

भाजपा गैर-यादव OBC मतदाताओं को जाट, ब्राह्मण और दलित गठबंधन के साथ बनाए रखना चाहेगी। समाजवादी पार्टी अपनी PDA रणनीति के जरिए छोटे पिछड़े वर्गों और दलित समूहों में समर्थन बढ़ाने का प्रयास करेगी।

राष्ट्रीय लोकदल का ग्रामीण नेटवर्क भाजपा के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन छोटे पिछड़े समुदायों में उम्मीदवार की स्थानीय उपलब्धता और पंचायत स्तर का संपर्क अधिक प्रभावी रहता है।

2024 के उपचुनाव में भाजपा की 38,393 वोट से जीत

वर्ष 2024 का उपचुनाव अनूप प्रधान के इस्तीफे के बाद हुआ था। भाजपा ने सुरेंद्र दिलेर, समाजवादी पार्टी ने चारू कैन, बसपा ने पहल सिंह और आजाद समाज पार्टी ने नितिन कुमार चोटेल को उम्मीदवार बनाया था।

उम्मीदवारपार्टीवोटवोट शेयर
सुरेंद्र दिलेरभाजपा1,00,18154.00%
चारू कैनसमाजवादी पार्टी61,78833.31%
पहल सिंहबसपा13,3657.20%
नितिन कुमार चोटेलआजाद समाज पार्टी8,2694.46%
भूपेंद्र कुमार धनगरराष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी1,1430.62%
NOTA7600.41%
जीत का अंतर38,39320.69%

उपचुनाव में कुल 4,06,371 मतदाता थे और लगभग 1.87 लाख मतदाताओं ने मतदान किया। मतदान प्रतिशत लगभग 46.1 प्रतिशत रहा। कम मतदान के बावजूद भाजपा अपने संगठित समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने में सफल रही।

बसपा और आजाद समाज पार्टी को मिलाकर करीब 21,600 वोट मिले। दलित मतों का यह विभाजन समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती बना, जबकि भाजपा का वाल्मीकि-जाट-ब्राह्मण और गठबंधन आधारित समर्थन एकजुट दिखाई दिया।

2022 में भाजपा ने 74,341 वोट से जीती सीट

वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के अनूप सिंह उर्फ अनूप प्रधान वाल्मीकि को 1,39,643 वोट और 55.55 प्रतिशत वोट शेयर मिला। बसपा की चारू कैन को 65,302 और राष्ट्रीय लोकदल के भगवती प्रसाद को 41,644 वोट प्राप्त हुए। भाजपा ने 74,341 मतों से चुनाव जीता।

उम्मीदवारपार्टीवोटवोट शेयर
अनूप प्रधान वाल्मीकिभाजपा1,39,64355.55%
चारू कैनबसपा65,30225.98%
भगवती प्रसादराष्ट्रीय लोकदल41,64416.57%
मोनिकाकांग्रेस1,5140.60%
NOTA1,4540.58%
मूलचंदनिर्दलीय8440.34%
जीत का अंतर74,34129.57%

वर्ष 2022 में राष्ट्रीय लोकदल समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में था। इसके बावजूद जाट प्रभाव वाली सीट पर रालोद तीसरे स्थान पर रहा। इससे संकेत मिलता है कि जाट मतों का बड़ा हिस्सा भाजपा और उसके स्थानीय उम्मीदवार के साथ गया होगा। समुदायवार मतदान का आधिकारिक विवरण उपलब्ध नहीं है।

2017 में भाजपा ने 70,721 वोट से पलटी थी सीट

वर्ष 2017 में भाजपा के अनूप प्रधान को 1,24,198 वोट मिले। बसपा के राकेश कुमार मौर्य को 53,477 और राष्ट्रीय लोकदल के ओमपाल सिंह को 41,888 वोट प्राप्त हुए। भाजपा ने 70,721 वोट से जीत दर्ज की।

उम्मीदवारपार्टीवोटवोट शेयर
अनूप प्रधानभाजपा1,24,19853.51%
राकेश कुमार मौर्यबसपा53,47723.04%
ओमपाल सिंहराष्ट्रीय लोकदल41,88818.05%
प्रशांत कुमारसमाजवादी पार्टी7,4963.23%
NOTA1,6510.72%
जीत का अंतर70,72130.47%

वर्ष 2017 में भाजपा ने रालोद से सीट छीनी थी। पार्टी ने अनुसूचित जाति प्रत्याशी के साथ जाट, ब्राह्मण, वैश्य और दूसरे ग्रामीण हिंदू समुदायों के मतों का व्यापक एकीकरण किया।

2012 में राष्ट्रीय लोकदल ने 38,774 वोट से जीती थी सीट

वर्ष 2012 में राष्ट्रीय लोकदल के भगवती प्रसाद को 93,470 वोट और 48.76 प्रतिशत वोट शेयर मिला। बसपा की राजरानी को 54,696 और भाजपा के अनूप को 26,609 वोट मिले। रालोद ने 38,774 मतों से जीत दर्ज की।

उम्मीदवारपार्टीवोटवोट शेयर
भगवती प्रसादराष्ट्रीय लोकदल93,47048.76%
राजरानीबसपा54,69628.53%
अनूपभाजपा26,60913.88%
अन्य उम्मीदवारविभिन्न दल16,9108.82%
जीत का अंतर38,77420.23%

वर्ष 2012 में रालोद का जाट-किसान और दलित प्रत्याशी वाला समीकरण सफल रहा। पांच वर्ष बाद यही जाट प्रभाव भाजपा के व्यापक सामाजिक गठबंधन में शामिल होता दिखाई दिया।

पिछले चार विधानसभा चुनावों का तुलनात्मक परिणाम

चुनावविजेतापार्टीविजेता के वोटजीत का अंतर
2012भगवती प्रसादराष्ट्रीय लोकदल93,47038,774
2017अनूप प्रधानभाजपा1,24,19870,721
2022अनूप प्रधानभाजपा1,39,64374,341
2024 उपचुनावसुरेंद्र दिलेरभाजपा1,00,18138,393

वर्ष 2017 से भाजपा ने लगातार तीन चुनाव जीते हैं। हालांकि 2024 के उपचुनाव में भाजपा के वोट और जीत का अंतर 2022 की तुलना में घटा, जिसका बड़ा कारण कम मतदान भी था।

खैर विधानसभा का राजनीतिक इतिहास

खैर विधानसभा में अलग-अलग दौर में कांग्रेस, जनता दल, भाजपा, बसपा और राष्ट्रीय लोकदल को सफलता मिली है। पिछले छह चुनावों में बसपा, रालोद और भाजपा तीनों दल सीट जीत चुके हैं।

चुनाव वर्षविजेतापार्टी
1996ज्ञानवतीभाजपा
2002प्रमोद गौड़बसपा
2007सत्यपाल सिंहराष्ट्रीय लोकदल
2012भगवती प्रसादराष्ट्रीय लोकदल
2017अनूप प्रधानभाजपा
2022अनूप प्रधानभाजपा
2024 उपचुनावसुरेंद्र दिलेरभाजपा

यह राजनीतिक इतिहास बताता है कि सीट पर जाट और अनुसूचित जाति का तालमेल सबसे प्रभावी रहा है। जिस दल ने मजबूत अनुसूचित जाति उम्मीदवार के साथ जाट और सवर्ण मतदाताओं को जोड़ा, उसे सफलता मिली।

2024 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को 1,401 वोट की बढ़त

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में खैर विधानसभा खंड का परिणाम विधानसभा उपचुनाव से बिल्कुल अलग रहा। समाजवादी पार्टी के बिजेंद्र सिंह को 95,606, भाजपा के सतीश कुमार गौतम को 94,205 और बसपा के हितेंद्र कुमार को 31,037 वोट मिले। समाजवादी पार्टी ने भाजपा पर केवल 1,401 वोट की बढ़त बनाई।

2024 लोकसभा: खैर विधानसभा खंडवोट
समाजवादी पार्टी95,606
भाजपा94,205
बसपा31,037
अन्य उम्मीदवार3,676
NOTA918
कुल मतदान2,25,442
समाजवादी पार्टी की बढ़त1,401

लोकसभा चुनाव में खैर का मतदान प्रतिशत करीब 55.15 प्रतिशत रहा। पांच महीने बाद विधानसभा उपचुनाव में मतदान घटकर लगभग 46.1 प्रतिशत रह गया और भाजपा ने 38 हजार से अधिक मतों की जीत दर्ज की।

दोनों परिणाम दिखाते हैं कि खैर में भाजपा का आधार मजबूत है, लेकिन सीट पूरी तरह एकतरफा नहीं है। विपक्ष सही उम्मीदवार, अधिक मतदान और जाट-दलित-मुस्लिम तालमेल के जरिए मुकाबले को करीबी बना सकता है।

भाजपा का चुनावी गणित क्या है?

खैर में भाजपा की ताकत वाल्मीकि और दूसरे अनुसूचित जाति मतदाताओं के साथ जाट, ब्राह्मण, वैश्य, ठाकुर और गैर-यादव OBC समर्थन से बनती है।

वर्तमान विधायक सुरेंद्र दिलेर को राज्यमंत्री बनाए जाने से भाजपा अनुसूचित जाति और विशेषकर वाल्मीकि समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संदेश दे सकती है। उनके परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि और स्थानीय संगठन भी पार्टी को लाभ देते हैं।

राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन भाजपा को जाट और किसान मतदाताओं के बीच अतिरिक्त संगठनात्मक मजबूती देता है। पार्टी को 2027 में अपने दलित उम्मीदवार के साथ जाट और ब्राह्मण वोटों का पिछला तालमेल बनाए रखना होगा।

भाजपा के सामने मतदाता सूची में हुई 50 हजार से अधिक की कमी, स्थानीय सत्ता विरोधी भावना, ट्रैफिक, स्वास्थ्य और शिक्षा की समस्याएं प्रमुख चुनौतियां रहेंगी।

समाजवादी पार्टी के लिए जीत का रास्ता

समाजवादी पार्टी ने वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में खैर विधानसभा खंड में भाजपा को 1,401 वोट से पीछे छोड़ दिया था। यह परिणाम विपक्ष के लिए सबसे मजबूत चुनावी आधार है। हालांकि उपचुनाव में चारू कैन को 61,788 वोट ही मिले और भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज की।

सपा के लिए मुस्लिम और दलित मतदाता शुरुआती आधार हो सकते हैं। चारू कैन की दलित सामाजिक पहचान और जाट परिवार से संबंध ने 2024 के उपचुनाव में जाट-दलित-महिला समीकरण बनाने का प्रयास किया था, लेकिन यह भाजपा के गठबंधन को तोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं रहा।

वर्ष 2027 में समाजवादी पार्टी को जाट मतदाताओं में अधिक समर्थन, अनुसूचित जाति के भीतर व्यापक स्वीकार्यता और ब्राह्मण तथा छोटे OBC समुदायों में सीमित सेंध लगानी होगी। केवल मुस्लिम और दलित वोटों के एक हिस्से से भाजपा का मुकाबला करना कठिन रहेगा।

बसपा के लिए चुनौती और अवसर

खैर सुरक्षित सीट पर बसपा का पुराना राजनीतिक आधार रहा है। पार्टी ने 2002 में सीट जीती और 2017 तथा 2022 में दूसरे स्थान पर रही। वर्ष 2022 में बसपा को 65,302 वोट मिले थे।

लेकिन 2024 के उपचुनाव में बसपा केवल 13,365 वोट तक सिमट गई। आजाद समाज पार्टी को भी 8,269 मत मिले। इससे दलित वोटों के भीतर बढ़ती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा सामने आई।

बसपा मजबूत जाटव या सर्वसमाज स्वीकार्यता वाला प्रत्याशी उतारती है तो अपने पुराने आधार का हिस्सा वापस पा सकती है। बसपा और आजाद समाज पार्टी दोनों सक्रिय रहती हैं तो अनुसूचित जाति वोटों का विभाजन भाजपा या समाजवादी पार्टी को लाभ दे सकता है।

सड़क और ट्रैफिक खैर का बड़ा चुनावी मुद्दा

खैर कस्बे के मुख्य बाजार में ट्रैफिक जाम स्थानीय लोगों की प्रमुख समस्या है। स्कूल बसों, दोपहिया वाहनों, व्यावसायिक वाहनों और बाजार में अतिक्रमण के कारण सुबह तथा शाम के समय आवागमन मुश्किल हो जाता है।

अलीगढ़-पलवल मार्ग के जर्जर हिस्से पर वर्ष 2026 में करीब 950 मीटर सड़क का डामरीकरण किया गया। इससे स्थानीय लोगों को गड्ढों और धूल से राहत मिली, लेकिन विधानसभा क्षेत्र के दूसरे मार्गों पर भी स्थायी सुधार की मांग बनी हुई है।

सड़क और जाम की समस्या जाट, ब्राह्मण, मुस्लिम या दलित किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है। व्यापारियों, छात्रों, किसानों और दैनिक यात्रियों के लिए यह साझा मुद्दा है।

स्वास्थ्य सुविधा और ट्रामा सेंटर की मांग

खैर में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र होने के बावजूद गंभीर मरीजों को उपचार के लिए अलीगढ़ या निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है। क्षेत्र में ट्रामा सेंटर और बेहतर विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाओं की मांग लंबे समय से उठती रही है।

खैर और टप्पल क्षेत्र प्रमुख सड़कों तथा एक्सप्रेसवे के नजदीक हैं। दुर्घटनाओं की स्थिति में त्वरित उपचार के लिए आधुनिक ट्रामा सेंटर स्थानीय चुनावी मांग बन सकता है।

भाजपा विकास कार्यों और आयुर्वेदिक केंद्र जैसी योजनाओं को उपलब्धि के रूप में पेश कर सकती है, जबकि विपक्ष विशेषज्ञ डॉक्टर, जांच और आपातकालीन सुविधाओं की कमी को मुद्दा बनाएगा।

शिक्षा, बस सेवा और युवाओं का रोजगार

खैर में राजकीय कन्या इंटर कॉलेज, उच्च शिक्षा की बेहतर सुविधा और कौशल प्रशिक्षण से जुड़े संस्थानों की मांग उठती रही है। छात्र-छात्राओं को कई पाठ्यक्रमों के लिए अलीगढ़ अथवा दूसरे शहरों की ओर जाना पड़ता है।

अलीगढ़ से खैर के बीच शुरू हुई इलेक्ट्रिक बस सेवा बंद होने से विद्यार्थियों, कर्मचारियों और आम यात्रियों को परेशानी की शिकायत भी सामने आई है। बेहतर सार्वजनिक परिवहन और बस स्टैंड को लेकर मतदाताओं की अपेक्षाएं बनी हुई हैं।

यमुना एक्सप्रेसवे और नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नजदीक होने के कारण खैर क्षेत्र में औद्योगिक तथा लॉजिस्टिक्स विकास की संभावना है। स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और कौशल प्रशिक्षण इस विकास के वास्तविक लाभ का पैमाना बनेगा।

किसान, खाद और निराश्रित गोवंश

खैर कृषि प्रधान विधानसभा है। किसान परिवारों के लिए खाद की उपलब्धता, सिंचाई, बिजली, फसल मूल्य, ग्रामीण सड़क और आवारा पशुओं की समस्या महत्वपूर्ण है।

निराश्रित गोवंश से फसल बचाने के लिए किसानों को खेतों की रात-दिन निगरानी करनी पड़ती है। विपक्ष इसे ग्रामीण नाराजगी से जोड़ने की कोशिश करेगा, जबकि भाजपा गोशालाओं और किसान योजनाओं को सामने रखेगी। खैर के हालिया स्थानीय आकलनों में खाद, आवारा पशु और ग्रामीण सुविधाएं प्रमुख समस्याओं में शामिल रही हैं।

2026 की नई मतदाता सूची ने बदला बूथवार गणित

खैर विधानसभा में 50,444 मतदाताओं की शुद्ध कमी के बाद 2022 और 2024 के पुराने बूथवार आंकड़ों को 2027 पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस, रालोद और आजाद समाज पार्टी को अपने समर्थकों के नाम नई सूची में जांचने होंगे।

भाजपा को जाट, ब्राह्मण, वाल्मीकि और व्यापारी बहुल बूथों पर पुरानी सूची सत्यापित करनी होगी। समाजवादी पार्टी को मुस्लिम, दलित और विपक्ष समर्थक ग्रामीण क्षेत्रों में नाम जुड़वाने तथा मतदान प्रतिशत बढ़ाने पर जोर देना होगा।

बसपा और आजाद समाज पार्टी को अनुसूचित जाति बहुल बूथों पर अपना संगठन दोबारा मजबूत करना होगा। नाम कटने या मतदान केंद्र बदलने की जानकारी समय पर मतदाताओं तक नहीं पहुंची तो उसका सीधा असर मतदान प्रतिशत पर पड़ेगा।

2027 में इन दस सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों पर रहेगी नजर

पहला सवाल जाट मतदाताओं की दिशा का होगा। भाजपा-रालोद गठबंधन को जाट और किसान मतों में बढ़त मिल सकती है, लेकिन उम्मीदवार तथा किसान समस्याएं वास्तविक वोट ट्रांसफर तय करेंगी।

दूसरा, अनुसूचित जाति प्रत्याशी की उपजातीय पहचान होगी। वाल्मीकि, जाटव और दूसरे दलित समुदायों में उम्मीदवार की स्वीकार्यता सबसे महत्वपूर्ण रहेगी।

तीसरा, ब्राह्मण मतदाताओं का रुख होगा। भाजपा अपने इस बड़े समर्थक आधार को बनाए रखना चाहेगी, जबकि विपक्ष सीमित सेंध लगाने की कोशिश करेगा।

चौथा, मुस्लिम मतों की एकजुटता होगी। समाजवादी पार्टी, बसपा और दूसरे उम्मीदवारों के बीच मुस्लिम मतों का वितरण मुख्य विपक्ष की ताकत तय करेगा।

पांचवां, बसपा और आजाद समाज पार्टी का प्रदर्शन होगा। दोनों दल अनुसूचित जाति मतों में भाजपा और सपा की हिस्सेदारी को प्रभावित कर सकते हैं।

छठा, सुरेंद्र दिलेर का मंत्री पद होगा। भाजपा इसे स्थानीय प्रतिनिधित्व और वाल्मीकि समाज के सम्मान के रूप में पेश करेगी।

सातवां, 2024 लोकसभा की सपा बढ़त होगी। सपा यह साबित करने की कोशिश करेगी कि सीट पर भाजपा को चुनौती देने वाला सामाजिक आधार मौजूद है।

आठवां, जाम, स्वास्थ्य और शिक्षा के मुद्दे होंगे। स्थानीय सुविधाओं से जुड़ी नाराजगी जातीय सीमाओं से बाहर मतदाताओं को प्रभावित कर सकती है।

नौवां, महिला और युवा मतदाता होंगे। रोजगार, परिवहन, सुरक्षा और शिक्षा इनके मतदान को प्रभावित करेंगे।

दसवां और सबसे नया फैक्टर 2026 की 3,56,103 मतदाताओं वाली सूची है। करीब 50 हजार मतदाताओं की शुद्ध कमी के बाद सभी दलों को बूथवार चुनावी गणित नए सिरे से तैयार करना होगा।

वर्ष 2012 में रालोद की 38,774 वोट की जीत, 2017 में भाजपा की 70,721 वोट की बढ़त, 2022 में 74,341 वोट की विजय, 2024 लोकसभा चुनाव में सपा की 1,401 वोट की विधानसभा-खंड बढ़त और उसी वर्ष उपचुनाव में भाजपा की 38,393 मतों की जीत खैर की बदलती राजनीति को दिखाती है। भाजपा का वाल्मीकि-जाट-ब्राह्मण गठबंधन मजबूत है, लेकिन लोकसभा परिणाम बताता है कि अधिक मतदान और व्यापक विपक्षी तालमेल से मुकाबला करीबी हो सकता है।

प्रदेश की दूसरी सीटों के सामाजिक और राजनीतिक आंकड़ों के लिए उत्तर प्रदेश के 403 विधानसभा के जातिगत समीकरण की विस्तृत कवरेज पढ़ी जा सकती है।

प्रत्याशियों, गठबंधन, टिकट वितरण और सीटवार राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े अपडेट के लिए 2027 के विधानसभा चुनाव की विस्तृत कवरेज पढ़ें।

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