नई दिल्ली, 2 अगस्त 2026: सुप्रीम कोर्ट ने भारत की केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को आदेशित किया है कि वह आवारा जानवरों के मामले में निर्धारित कानूनों का अक्षरशः पालन करें। यह आदेश निशा बनाम नगर परिषद संगरूर एवं अन्य मामले का अंतिम निर्णय सुनाते हुए दिया गया। इस मामले में न्याय की लड़ाई के लिए 19 साल लंबा संघर्ष करना पड़ा।
Stray Animals: Supreme Court Issues New Order, Directs Strict Compliance
- सभी राज्यों में पशुओं से संबंधित कानूनों को अक्षरशः लागू किया जाए।
- आवारा पशुओं के कारण होने वाली दुर्घटनाओं (पैदल या वाहन) के लिए मुआवजे की एक स्थायी व्यवस्था/नियम बनाए जाएं।
- सभी पालतू और आवारा पशुओं की टैगिंग (Tagging) अनिवार्य की जाए ताकि उनके मालिकों की पहचान हो सके।
- नगर निगमों और विभागों में एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए जो पशु शेल्टर और टैगिंग की निगरानी करे।
अदालत ने इस फैसले की प्रतियां सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और कानूनी सेवा प्राधिकरणों को उचित कार्रवाई के लिए भेजने का निर्देश दिया है।
आवारा पशुओं की समस्या और कानूनी प्रावधान
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के माध्यम से देश में आवारा पशुओं की बढ़ती समस्या और उनके कारण होने वाली मौतों पर गहरी चिंता व्यक्त की। पीठ ने निम्नलिखित कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख किया:
अनुच्छेद 48: राज्य का यह कर्तव्य है कि वह कृषि और पशुपालन को आधुनिक तरीके से व्यवस्थित करे।
अनुच्छेद 51-A(g): प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया भाव रखे।
पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960: इसकी धारा 3 और 11 पशुओं को दर्द और पीड़ा से बचाने की बात करती है।
कैटल ट्रेसपास एक्ट, 1871 (Cattle-Trespass Act): यह कानून लावारिस पशुओं को 'पाउंड' (Pound) में रखने और उनके मालिकों पर जुर्माना लगाने का प्रावधान करता है।
पंजाब म्युनिसिपल बाय-लॉज, 2006: इसके नियम 10(b) में आवारा पशुओं के पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए एक फंड की व्यवस्था की गई है।
अदालत ने यह भी बताया कि 2018-2020 के बीच भारत में जानवरों के हमले के कारण 3,860 लोगों की जान गई है।
निशा बनाम नगर परिषद संगरूर एवं अन्य मामला
यह दुखद घटना 21 सितंबर, 2007 की है। पंजाब के संगरूर में विजय कुमार नामक व्यक्ति सड़क पर पैदल चल रहे थे, तभी अचानक एक आवारा सांड ने उन पर हमला कर दिया। इस हमले में उनके सिर पर गंभीर चोट आई और वे बेहोश हो गए। घटना की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज कराई गई और डीडीआर (DDR) प्रविष्टि भी की गई। विजय कुमार ने अपने जीवनकाल में अधिकारियों से मुआवजे की मांग की थी, लेकिन उन्हें कोई सहायता नहीं मिली। उनकी मृत्यु के बाद, उनकी पत्नी निशा (अपीलकर्ता) ने न्याय की लड़ाई जारी रखी। उन्होंने 2 मार्च, 2010 को संगरूर के डिप्टी कमिश्नर के पास 1 करोड़ रुपये के मुआवजे के लिए आवेदन किया। हालांकि, प्रशासन ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि उनके पास मुआवजे के लिए कोई फंड उपलब्ध नहीं है। इसके बाद, निशा ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में रिट याचिका (CWP No. 17331 of 2010) दायर की।
हाई कोर्ट के दो विरोधाभासी फैसले
सिंगल जज का फैसला (27 मई, 2019): हाई कोर्ट के विद्वान एकल न्यायाधीश ने पीड़ित परिवार के पक्ष में फैसला सुनाया। उन्होंने मोटर वाहन अधिनियम (MVA), 1988 के सिद्धांतों को आधार बनाते हुए मृतक की आयु और आय के अनुसार 29,32,000 रुपये का मुआवजा और 6% वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया।
डिवीजन बेंच का फैसला (12 नवंबर, 2025): नगर परिषद ने इस फैसले को चुनौती दी। हाई कोर्ट की खंडपीठ (Division Bench) ने एकल न्यायाधीश के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार में 'तथ्यों के विवाद' का निपटारा नहीं किया जा सकता। अदालत ने निशा को 'सिविल कोर्ट' जाने की सलाह दी।
सुप्रीम कोर्ट: पीड़ित को उपचारहीन (Remediless) नहीं छोड़ सकते
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की खंडपीठ के तर्क को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति संजय करोल ने कहा कि घटना 2007 की है और रिट याचिका 2010 से लंबित थी। इतने लंबे समय (लगभग 19 वर्ष) के बाद पीड़ित को फिर से सिविल कोर्ट भेजना न्याय का उपहास होगा और उन्हें उपचारहीन (Remediless) बना देगा। अदालत ने गौर किया कि प्रशासन ने कभी भी घटना की सच्चाई पर सवाल नहीं उठाया था, इसलिए यह कहना गलत था कि मामले में तथ्यों का कोई बड़ा विवाद है।
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