पेंच टाइगर रिजर्व में मछली माफिया का आतंक: PMO तक पहुंची शिकायत के बाद NTCA ने एमपी से मांगी एक्शन टेकन रिपोर्ट - Bhopal News

Published on 12 अग॰ 2026

पेंच टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र (तोतलाडोह बांध) में चल रहे करोड़ों की कमाई के अवैध मछली कारोबार और संगठित माफिया के खिलाफ केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) ने इस मामले में मप्र सरकार से जवाब तलब करते हुए तत्

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गौरतलब है कि पेंच टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने पेंच नदी पर महाराष्ट्र की सीमा में बने तोतलादोह डैम से मछली पकड़ने की सभी गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है। इसके बावजूद मप्र की सीमा से प्रवेश कर संगठित मछली माफिया पिछले कई सालों से बेखौफ होकर मछलियों के शिकार में लिप्त है।

NTCA ने एमपी से मांगी रिपोर्ट

एनटीसीए ने मप्र के पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ (मुख्य वन्यजीव वार्डन) को लिखे पत्र में इस शिकायत की गंभीरता से जांच कराने और मछली माफिया के विरुद्ध ठोस कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही यह भी उल्लेख किया है कि मप्र सरकार की ओर से इन अवैध गतिविधियों को रोकने को लेकर पूर्व में उठाए गए कदम प्रभावी साबित नहीं हुए हैं।

डायनामाइट से हो रहा शिकार

इस मामले में छिंदवाड़ा निवासी कैप्टन ब्रजेश भारद्वाज ने पीएमओ को भेजी शिकायत में कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं, जिसके बाद एनटीसीए ने मप्र सरकार से जवाब मांगा है। शिकायत के मुताबिक, मछली माफिया जलाशय में मछलियां पकड़ने के लिए पेंच नदी और तोतलादोह डैम में डायनामाइट जैसे खतरनाक विस्फोटकों का उपयोग करता है ताकि मछलियां मरकर ऊपर आ जाएं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जब वन विभाग का गश्ती दल या विशेष बाघ सुरक्षा बल इन्हें रोकने की कोशिश करते हैं, तो उन पर भी फायर बम और बंदूकों से जानलेवा हमले किए जाते हैं।

हाल ही में नागपुर उच्च न्यायालय ने भी अपने एक अंतरिम आदेश में वन कर्मियों की नावों को आग के हवाले किए जाने की घटना पर गंभीर चिंता जताई थी। इस हिंसक माहौल के कारण पेंच नदी के आसपास के संवेदनशील कोर क्षेत्रों में वन विभाग का स्थानीय अमला गश्ती करने में भी लाचार महसूस कर रहा है।

सैकड़ों करोड़ का टर्नओवर और छिंदवाड़ा-सिवनी के रास्ते महाराष्ट्र सप्लाई

शिकायत के मुताबिक, तोतलादोह डैम से मछली पकड़ने का यह अवैध कारोबार अब एक संगठित सिंडिकेट का रूप ले चुका है, जिसका वार्षिक टर्नओवर सैकड़ों करोड़ रुपये का हो चुका है। बफर जोन के गुमतरा, पुलपुलडोह, टेकारी और परासपानी जैसे दर्जनों गांवों से हर शाम सैकड़ों की संख्या में लोग पैदल ही कोर एरिया की दीवार फांदकर घुसपैठ करते हैं।

रात भर अवैध शिकार करने के बाद सुबह 5 से 9 बजे के बीच इस माल को ठिकाने लगाया जाता है। अवैध रूप से पकड़ी गई ये मछलियां मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा और सिवनी जिलों के गुप्त रास्तों से होते हुए रात के अंधेरे में महाराष्ट्र के नागपुर, सावनेर और खापा जैसे बड़े बाजारों में बिकने भेजी जाती हैं। इस पूरे काले कारोबार को अंजाम देने के लिए टाटा 407, महिंद्रा पिकअप/बोलेरो और मारुति वैन जैसे वाहनों का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है।

वर्ष 2001 में 145 मछुआरा परिवारों को दिया जा चुका है पुनर्वास पैकेज

ऐतिहासिक दस्तावेजों और सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, पेंच नेशनल पार्क के अंतिम गठन से पहले यहां के स्थानीय लोगों के अधिकारों का पूरी तरह निपटारा किया जा चुका था। वर्ष 2001-02 में छिंदवाड़ा कलेक्टर के माध्यम से यहां के 145 पात्र मछुआरा परिवारों को विस्थापित और शिफ्ट किया गया था।

इन सभी परिवारों के बीच पुनर्वास और मुआवजे के तौर पर कुल 72 लाख रुपये की राशि बांटी गई थी। इसके अलावा कई मछुआरों को वन विभाग में ही चौकीदार व गश्ती दल में शामिल कर रोजगार भी दिया गया था। इस पुनर्वास के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को ठेंगा दिखाकर क्षेत्र में अवैध शिकार का यह खेल लगातार जारी है।

जलीय जैव-विविधता और बाघों के संरक्षण को गंभीर खतरा

तोतलादोह जलाशय केवल मछलियों का नहीं, बल्कि दुर्लभ मगरमच्छों, कछुओं और जलपक्षियों का भी प्राकृतिक शरणस्थल है। माफिया के गुर्गे अपनी नावों की आवाजाही का रास्ता साफ करने के लिए पानी के भीतर मौजूद उन सूखे पेड़ों को उखाड़ रहे हैं, जो प्रवासी पक्षियों के घोंसले बनाने के काम आते हैं।

कोर क्षेत्र में इतनी भारी इंसानी दखलअंदाजी, प्लास्टिक कचरा और आग जलाने से राष्ट्रीय पशु बाघ के प्राकृतिक आवास को अपूरणीय क्षति पहुंच रही है। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस सशस्त्र घुसपैठ को तुरंत नहीं रोका गया, तो इसकी आड़ में अंतरराष्ट्रीय शिकारी पेंच के बाघों को भी अपना निशाना बना सकते हैं।

सीमाओं में बदलाव या प्रतिबंध हटाने से केंद्र का साफ इनकार

यह मामला पहले में लोकसभा में भी उठ चुका है, जहां वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाए बिना आदिवासियों के लिए मछली पकड़ने का एक सुरक्षित कॉरिडोर बनाने की मांग की गई थी। इस पर केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने संसद में स्पष्ट किया था कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत नेशनल पार्क के कोर एरिया में किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि पूरी तरह प्रतिबंधित है।

केंद्र सरकार ने साफ कर दिया था कि पेंच नेशनल पार्क की सीमाओं में किसी भी प्रकार का बदलाव करने या मछली पकड़ने पर लगा प्रतिबंध हटाने का कोई भी प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।