Pitru Paksha 2026: पूर्वज से पहले क्यों जरूरी है ऋषि तर्पण, नहीं करने पर क्या होगा; पहले जान लें तारीख और महत्व
Updated: Mon, 7 Sep 2026 09:04 PM (IST)
पितृ पक्ष में ऋषि तर्पण को दर्शाती तस्वीर (AI Generated Image)
Pitru Paksha 2026 Rishi Tarpan: पितृ पक्ष में पितृ देव से पहले ऋषि तर्पण करने की परंपरा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके पिछे की वजह क्या है? इसके बारे में शास्त्रों में क्या कहा गया है.
Pitru Paksha 2026 Rishi Tarpan: मिथिला और महावीर पंचांग के अनुसार, इस साल पितृ पक्ष का आरंभ 26 सितंबर से होने वाला है. इस दिन भाद्रपद (भादो) की पूर्णिमा तिथि है. इसलिए इस दिन ऋषियों के नाम से तर्पण किया जाएगा. इसके अलावा इस दिन उन पूर्वजों के लिए तर्पण, पिंडदान या श्राद्ध कर्म किया जाएंगे जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि में हुई. इस साल आश्विन कृष्ण प्रतिपदा तिथि से अमावस्या तक पूर्वजों के लिए तर्पण, पिंडदान या श्राद्ध किया जाएगा. आइए, जानते हैं कि पूर्वज से पहले ऋषि का तर्पण क्यों जरूरी है, यह किस तारीख को किया जाएगा और इसका महत्व क्या है.
पितर से पहले क्यों जरूरी हो ऋषि तर्पण
धर्मशास्त्र के मुताबिक, भाद्रपद पूर्णिमा के दिन ऋषियों का तर्पण करना जरूरी है. शास्त्रों के अनुसार, मनुष्य पर जन्म लेता है तब से ही वह ऋषि, देवता और पितर (पूर्वज) का ऋणी हो जाता है. इसे ऋषि ऋण, देव ऋण और पितृ ऋण के नाम से जाना जाता है.
इसलिए पितृ पक्ष में इनके लिए तर्पण करने की परंपरा है. कर्मकांड के जानकार पं. धर्मनाथ झा ने बताया कि पितृ पक्ष में पितृ तर्पण से पहले ऋषि तर्पण करना जरूरी है क्योंकि इसके बिना पूर्वज भी तर्पण, पिंडदान या श्राद्ध कर्म स्वीकार नहीं करते.
पितृ पक्ष में कब होगा ऋषि तर्पण
पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि गुरुवार, 26 सितंबर 2026 को है. ऐसे में इस दिन ऋषि तर्पण किया जाएगा. ऐसा इसलिए क्योंकि शास्त्रों में ऋषि तर्पण के लिए भाद्रपद पूर्णिमा तिथि का स्पष्ट उल्लेख है.
| तिथि | दिनांक | समय |
| पूर्णिमा तिथि आरंभ | 25 सितंबर 2026 | रात- 11: 06बजे |
| पूर्णिमा तिथि समाप्त | 26 सितंबर 2026 | रात 10:18 बजे |
| उदया तिथि के अनुसार पूर्णिमा | 26 सितंबर, शनिवार | पूरे दिन मान्य |
पितृ पक्ष में सबसे पहले अगस्त्य ऋषि का तर्पण क्यों?
वैदिक परंपरा के अनुसार, भाद्रपद पूर्णिमा तिथि पर सबसे पहले और विशेष रूप से अगस्त्य ऋषि के लिए तर्पण किया जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि शास्त्रों में उन्हें पितृ पूजन का अधिकारी, विघ्नों को दूर करने वाला और तर्पण, पिंडदान या श्राद्ध का साक्षी बताया गया है.
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देव और ऋषि तर्पण की विधि
- भाद्रपद पूर्णिमा के दिन ऋषि तर्पण के दौरान क्रम से देवता, ऋषि और पितर यानी पूर्वज का तर्पण किया जाता है. देव तर्पण के लिए पूरब की ओर मुंह करके जनेऊ को गले में आगे की ओर (हृदय की तरफ) रखें.
- दाहिने हाथ की उंगलियों के आगे वाले हिस्से (देवतीर्थ) से देवता को बारी-बारी से जल देना चाहिए. इस दौरान ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेव) का ध्यान करना चाहिए.
- यह नियम नदियों के लिए है. अर्धा से भी देवता को जल दिया जा सकता है.
- ऋषि तर्पण के दौरान उत्तर दिशा की ओर मुंह करके हथेली के ऋषि तीर्थ से ऋषि (अगस्त्य) को जल अर्पित करना चाहिए.

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