सुबह की पहली किरण के साथ घर के काम निपटाकर खेत की ओर निकलना हाथों में खेती के औजार लेना और पूरे दिन खेत में काम करना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रहा है। फसल बोने से लेकर निराई-गुड़ाई, खाद डालने और कटाई तक वे खेती में पुरुषों के साथ बराबर मेहनत करती हैं। हां वो बात अलग है कि खेती में उनकी मेहनत होने के बावजूद जमीन के दस्तावेज अक्सर उनके नाम नहीं होते।
रिपोर्ट – पिंकी, लेखन – रचना

खेतों में काम कर रही हैं महिलाएं (फोटो साभार: पिंकी)
महिलाओं का दिन किसी के आदेश का इंतजार नहीं करता है। वो सुबह होते ही घर और खेतों के जिम्मेदारियां संभालने में जुट जाती हैं बिना किसी के आदेश के। क्योंकि उन्हें पता होता है कि घर के काम के लिए उन्हे कोई आदेश नहीं करेगा मानो घर में काम की रजिस्ट्री हो गई हो। ठीक ऐसी ही खेती का काम भी उनके जीवन से अलग नहीं है। ख़ासकर गांव की महिलाएँ। फिर जब उनके अधिकार जैसे घर के ज़मीन के पट्टे की बात आती है तो महिलाओं का जैसे अहेमियत ही खत्म हो जाता है। मानो वे घर के सदस्य ही नहीं होते हैं। इसी ज़मीन के पट्टे को अपने नाम करने के लिए घर वालों के साथ समाज से भी लड़ना पड़ता है। वो इस लिए क्योंकि समाज में कहीं ये नियम नहीं है कि घर खेत या किसी भी जमीन में किसी महिला का नाम हो।
धान बेचने के लिए टोकन कटवाना हो, सरकारी मंडी में पंजीयन कराना हो, बैंक से कृषि ऋण लेना हो या खेत में खेती से जुड़े किसी भी तरीके का काम हो ये अब ये काम गांव की महिलाएं खुद कर रही हैं। कभी इन्हीं कामों के लिए उन्हें घर के पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता था। जमीन पर खेती करने के बावजूद उन्हें यह तक ठीक से पता नहीं होता था कि जिस जमीन पर वे काम कर रही हैं उसका पट्टा क्या होता है और उसमें उनका कितना हिस्सा या रकबा दर्ज है।
अब बदलाव की हवा चलने लगी है। छत्तीसगढ़ के ग्राम पंचायत खोसड़ा के आश्रित ग्राम दलदली में कुछ महिलाओं के नाम जमीन का पट्टा होने के बाद उनके काम करने और फैसले लेने के तरीके अब बदलने लगे हैं। जमीन के कागजों में अपना नाम दर्ज होने के बाद महिलाएँ खेत में काम करने के साथ जमीन से जुड़े सरकारी कामों, बैंक और खेती के फैसलों में भी अपनी मौजूदगी दे रही हैं।
वे महिलाएं जिन्होंने जमीन का पट्टा अपने नाम किया
75 साल की नीरबाई के लिए खेत कोई नई जगह नहीं है। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह खेत तक जाती हैं और खेती के काम में अपना हिस्सा और जिम्मेदारी निभाती हैं। कुछ साल पहले तक जिस जमीन पर वह खेती करती थीं उस जमीन के कागजों में उनका नाम नहीं था। जमीन उनकी जिंदगी का हिस्सा थी पर कागजों पर वह जमीन उनकी नहीं थी।

नीरबाई खेत में काम कर रही है (फोटो साभार: पिंकी)
अब उनके नाम पर जमीन का पट्टा है। इसके साथ ही नीरबाई के लिए जमीन को देखने का नजरिया भी बदला है। अब वह सिर्फ खेत में काम करने तक सीमित नहीं हैं जमीन से जुड़े कामों की जिम्मेदारी भी वो खुद उठाती हैं। बैंक का काम हो या सरकारी दफ्तर जाना वह अब इन कामों के लिए किसी और का इंतजार नहीं करतीं।
खेती में भी उनकी भूमिका पहले से अलग हुई है। खेत में खाद का छिड़काव करना हो तो वह खुद यह काम कर लेती हैं। जमीन के कागजों में अपना नाम होने के बाद उनमें यह भरोसा आया है कि खेत और उससे जुड़े फैसलों की जिम्मेदारी वह खुद भी संभाल सकती हैं।
अब 73 साल की छीबाई को ही देख लो उनका नाम जमीन के कागज होने के बाद खेती से जुड़े कामों में उनकी भागीदारी और भी बढ़ गई है। अब वह सरकारी मंडी में अपने धान का रजिस्ट्रेशन खुद कराती हैं। समिति से खाद भी खुद लाती हैं। धान की बिक्री के लिए टोकन कटवाने और धान कटवाने का काम भी वह खुद कराती हैं ताकि फसल बेचने के समय किसी तरह की रुकावट न आए।

खेतों में अनाज लगा रही है महिला (फोटो साभार: पिंकी)
इसी तरह अब 30 साल की मोना बाई भी जमीन के कागज अपने नाम होने को महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता से जोड़कर देखती हैं। उनका कहना है कि जब से जमीन के कागज उनके नाम बने हैं तब से कुछ महिलाएं आत्मनिर्भर हुई हैं। अब बैंक से कृषि ऋण लेने में कोई झिझक या डर नहीं होती है।
इन महिलाओं की जीवन में बदलाव किसी बड़े ऐलान की तरह नहीं आया। यह धीरे-धीरे उनके रोजमर्रा के कामों में दिखाई देने लगा कभी बैंक की कतार में खड़ी नीरबाई के रूप में, कभी मंडी में अपने धान का रजिस्ट्रेशन कराती छीबाई के रूप में और कभी कृषि ऋण की बात करती मोना बाई के रूप में। खेत में उनके हाथ पहले भी मिट्टी से सने रहते थे फसल पर उनकी मेहनत पहले भी थी बस उस जमीन के कागजों पर उनका नाम नहीं था।
भारत में महिलाओं के ज़मीन पर मालिकाना हक को लेकर उपलब्ध मौजूदा आंकड़ा व्यापक नहीं है। लेकिन फिर भी यह एक निराशाजनक तस्वीर पेश करता है। आर्थिक रूप से सक्रिय महिलाओं में 80 फ़ीसद महिलाएं कृषि के क्षेत्र में काम करती हैं लेकिन उनमें से केवल 13 फ़ीसद महिलाओं के पास ही खेती की जमीन का मालिकाना हक है।
खेत में काम किसी और का और नाम किसका
गांवों में महिलाएं पीढ़ियों से खेती का हिस्सा रही हैं। सुबह की पहली किरण के साथ घर के काम निपटाकर खेत की ओर निकलना हाथों में खेती के औजार लेना और पूरे दिन खेत में काम करना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रहा है। फसल बोने से लेकर निराई-गुड़ाई, खाद डालने और कटाई तक वे खेती में पुरुषों के साथ बराबर मेहनत करती हैं। हां वो बात अलग है कि खेती में उनकी मेहनत होने के बावजूद जमीन के दस्तावेज अक्सर उनके नाम नहीं होते।
देखा जाए तो ज़्यादातर ग्रामीण परिवारों में जमीन का पट्टा अक्सर पिता, पति या परिवार के किसी दूसरे पुरुष सदस्य के नाम पर होता है। महिला मायके में हो तो पिता की जमीन पर उसका नाम नहीं होता और शादी के बाद ससुराल पहुंचने पर भी जमीन के कागज उसके नाम होने की संभावना कम ही रहती है।

काम कर के लौटती महिला (फोटो साभार: पिंकी)
जमीन पर खेती करने और घर-परिवार की जिम्मेदारियां संभालने के बीच महिलाओं को अपने ही अधिकारों की पूरी जानकारी नहीं थी। पट्टा क्या होता है, जमीन के कागजों में नाम होने का क्या मतलब है और जमीन से जुड़े कौन-कौन से अधिकार उन्हें मिल सकते हैं, इसके बारे में भी उन्हें पहले ज्यादा जानकारी नहीं थी।
इसी बीच गांव की कुछ महिलाएं दलित आदिवासी मंच से जुड़ीं। संगठन पिछले करीब 15 वर्षों से गांव में जल, जंगल और जमीन के मुद्दों पर काम कर रहा है। महिलाओं के साथ काम करते हुए संगठन ने उन्हें उनके हक और अधिकारों के बारे में समझाना शुरू किया। बातचीत सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं रही। महिलाओं को घरेलू हिंसा क्या है, किस तरह के व्यवहार को हिंसा कहा जा सकता है और जेंडर समानता जैसे मुद्दों पर भी जानकारी दी गई। इसी प्रक्रिया में महिलाओं को जमीन के पट्टे के बारे में भी जानकारी मिली।
80 दावे, 65 पट्टे और इनमें पांच महिलाएं
दलदली गांव में जमीन के अधिकार को लेकर संगठन के प्रयासों के बाद कुल 80 दावा फॉर्म भरे गए। इनमें से अभी तक 65 पट्टे ग्रामवासियों को मिल चुके हैं। इन 65 पट्टों में इन पांच महिलाओं के नाम भी शामिल हैं। संगठन के अनुसार, गांव में और भी महिलाओं को जमीन का पट्टा उनके नाम कराने के लिए आवेदन करने की पहल की गई है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि महिलाओं पर किसी तरह का दबाव डालकर उनके नाम पट्टा नहीं कराया जा रहा है। इसमें परिवार की सहमति और महिला की अपनी इच्छा को देखते हुए ये बदलाव का काम किया जा रहा है।

महिलाओं का बना ज़मीन का पट्टा (फोटो साभार: पिंकी)
लेकिन जमीन अपने नाम कराने की बात सामने आई तो सभी महिलाओं ने तुरंत इसके लिए हामी नहीं भरी। कुछ महिलाओं ने कहा कि वे जमीन के पट्टे की जिम्मेदारी नहीं उठा पाएंगी। किसी ने कहा कि इसे बेटे के नाम कर दिया जाए तो किसी ने पोते या नातिन के नाम करने की बात कही।
इसे सिर्फ महिलाओं की अपनी झिझक मान लेना शायद पूरी कहानी नहीं बताता। आखिर उन्होंने यह सोच सीखी कहां से? जिस समाज में जमीन संभालना, सरकारी दफ्तर जाना, बैंक का काम करना और खेती से जुड़े बड़े फैसले लेना हमेशा पुरुषों की जिम्मेदारी माना गया हो वहां महिलाओं का खुद यह मान लेना कि “मैं यह नहीं कर पाऊंगी” अचानक पैदा हुई सोच नहीं है। सालों से उन्हें यही बताया और दिखाया गया है कि जमीन और उससे जुड़े फैसले पुरुष ही संभाल सकते हैं। धीरे-धीरे यह धारणा महिलाओं की अपनी सोच का भी हिस्सा बन गई।
इसीलिए कई बार कोई महिला अपने नाम जमीन लेने के बजाय परिवार के किसी पुरुष सदस्य के नाम इसे कराने को ज्यादा सुरक्षित या आसान समझती है। वह यह नहीं कह रही होती कि उसे जमीन का अधिकार नहीं चाहिए बल्कि उसके भीतर यह भरोसा ही नहीं बन पाया होता कि वह इस अधिकार के साथ आने वाली जिम्मेदारी खुद संभाल सकती है। संगठन के अनुसार जब तक महिला खुद यह नहीं कहती कि जमीन का दावा उसके नाम पर किया जाए तब तक उसके नाम पर दावा फॉर्म पूरा नहीं किया जाता। यानी किसी महिला के नाम सिर्फ इसलिए जमीन नहीं की जाती कि उसका नाम दस्तावेज में होना चाहिए। पहले जरूरी है कि वह खुद अपने अधिकार को समझे उस जिम्मेदारी को स्वीकार करे और अपनी इच्छा से कहे “हां यह जमीन मेरे नाम पर हो।”
न मायके में जमीन न ही ससुराल में
महिलाओं के नाम जमीन करने की जरूरत को समझने के लिए उस सामाजिक सोच को भी समझना जरूरी है जिसके कारण लंबे समय तक जमीन के दस्तावेज पुरुषों के नाम होते रहे। ये बदलाव इस लिए भी जरुरी हो जाता है क्योंकि अक्सर बेटी जब शादी के बाद अपने मायके की जमीन में हिस्सा मांगती है तो लोग सवाल करते हैं कि अब उसका उस घर से क्या रिश्ता है। परिवार और समाज में यह सोच आज भी कई जगह दिखाई देती है कि बेटी शादी के बाद दूसरे घर की हो गई इसलिए मायके की जमीन में उसका हिस्सा नहीं होना चाहिए। लेकिन जमीन के अधिकार का सवाल शादी के साथ खत्म नहीं हो जाता।

ज़मीन का पट्टा (फोटो साभार: पिंकी)
अगर किसी महिला का मायके की जमीन में हिस्सा नहीं है तो कम से कम उसके ससुराल की जमीन में उसके नाम का अधिकार होना चाहिए। क्योंकि महिला भी उसी जमीन पर खेती करती है परिवार और खेती दोनों को संभालती है और जमीन से जुड़ी जिम्मेदारियों में बराबर की भागीदार होती है।
सुबह की पहली किरण के साथ घर का काम खत्म कर खेत की ओर निकलने वाली इन महिलाओं की जिंदगी में बदलाव किसी एक दिन में नहीं आया है। ये उनके सालों की लड़ाई और एड़ी घिसते साड़ी लपेटते हुए हुए मेहनत का सफर है।
महिलाएं कहती हैं करीब 2012-13 के आसपास उन्होंने दलित आदिवासी मंच से जुड़ना शुरू किया।संगठन ने उन्हें यह समझाया कि अपने हक की बात संबंधित अधिकारियों के सामने कैसे रखनी है ताकि वे सिर्फ दूसरों की मदद पर निर्भर न रहें। इसके बाद महिलाओं ने अपने जमीन के अधिकार के लिए कई बार जिला मुख्यालय का रुख अपनाया। उन्होंने कलेक्टर को आवेदन देकर अपनी समस्याएं बताईं और तहसीलदार समेत दूसरे अधिकारियों से मुलाकात की। अपनी मांग प्रशासन तक पहुंचाने के लिए आंदोलन भी किए। संगठन ने इस पूरी प्रक्रिया में महिलाओं का भरपूर साथ दिया। कई बार संगठन के लोग कई-कई दिनों तक गांव में रुककर महिलाओं की समस्याएं समझते, आवेदन तैयार कराने और अधिकारियों तक उनकी बात पहुंचाने में मदद करते रहे।
उन्ही महिलाओं के मुताबिक संगठन की लगातार कोशिशों के बाद आज कई जगह उन्हें जमीन का पट्टा मिल पाया है। आगे भी दूसरी महिलाओं के नाम पर पट्टे बनवाने की कोशिश जारी है। हालांकि संगठन अकेले यह काम आगे नहीं बढ़ा सकता। महिलाओं को भी अपनी सभी बातें सभी के सामने रखने के लिए आगे आना उतना ही जरुरी है। संगठन रास्ता दिखा सकता है और साथ खड़ा भी हो सकता है पर पहल महिला को खुद करनी होगी। क्योंकि अधिकार की लड़ाई तब ही पूरी होती है जब उस लड़ाई में महिला की अपनी आवाज भी शामिल हो।
कानून क्या कहता है: जमीन पर महिलाओं के अधिकार
अगर संवैधानिक और कानूनी नजरिए से देखें तो भारत के संविधान का अनुच्छेद 300A कहता है कि किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से कानून के अधिकार के बिना वंचित नहीं किया जा सकता। यानी किसी की संपत्ति सिर्फ मनमाने तरीके से नहीं छीनी जा सकती। हालांकि संविधान में ऐसा कोई सामान्य नियम नहीं है कि हर जमीन का पट्टा अनिवार्य रूप से महिला के नाम ही होना चाहिए। महिलाओं के जमीन और पैतृक संपत्ति से जुड़े अधिकार अलग-अलग कानूनों में तय किए गए हैं।
महिलाओं के पैतृक संपत्ति के अधिकार को मजबूत करने में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 और 2005 का संशोधन महत्वपूर्ण है। 2005 में कानून में बदलाव के बाद हिंदू परिवार की बेटी को पैतृक संयुक्त संपत्ति में बेटे के बराबर अधिकार मिला। यानी बेटी भी उस संपत्ति में बेटे की तरह हिस्सेदार मानी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा मामले में भी साफ किया कि बेटी को यह अधिकार जन्म से मिलता है। इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि 9 सितंबर 2005 को उसके पिता जीवित हों।
इसी कानून की धारा 14 भी महिलाओं के संपत्ति के अधिकार को मजबूत करती है। इसके तहत किसी हिंदू महिला के पास जो संपत्ति है वह कानून में बताई गई परिस्थितियों के अनुसार उसकी अपनी संपत्ति मानी जाती है सिर्फ सीमित अधिकार वाली संपत्ति नहीं। इसमें उसे विरासत में मिली, बंटवारे में मिली, भरण-पोषण के बदले मिली, उपहार में मिली या उसके खुद खरीदने से मिली संपत्ति शामिल हो सकती है।

काम और ज़मीन दोनों में महिलाओं का नाम (फोटो साभार: पिंकी)
वन भूमि के मामले में अलग प्रावधान
वन भूमि के लिए कुछ अलग कानून और नियम हैं। वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत जंगल में रहने वाले अनुसूचित जनजाति और दूसरे पात्र पारंपरिक वनवासियों के वन अधिकारों को मान्यता दी गई है। इस कानून के तहत व्यक्तिगत वन अधिकार का पट्टा पति और पत्नी दोनों के नाम पर दिया जा सकता है। वहीं अविवाहित महिलाओं, विधवाओं और दूसरी पात्र महिलाओं को उनके नाम पर भी वन अधिकार दिया जा सकता है।
इस कानून में महिलाओं की भागीदारी का भी ध्यान रखा गया है। वन अधिकार समिति में कम से कम एक-तिहाई महिलाएं होनी चाहिए। वहीं ग्राम सभा वन अधिकार के दावों को लेने, उनकी जांच करने और उन पर फैसला लेने की प्रक्रिया में भी अहम भूमिका निभाती है।
इन प्रावधानों से यह समझ आता है कि महिलाओं का जमीन और वन भूमि पर अधिकार सिर्फ परिवार की मर्जी या समाज की परंपरा पर निर्भर नहीं है। अलग-अलग कानून महिलाओं को संपत्ति, पैतृक जमीन और वन अधिकारों में हिस्सा देते हैं। लेकिन कानून में अधिकार होना और वह अधिकार जमीन के कागजों में दर्ज होना दोनों अलग बातें हैं। दलदली की महिलाओं की कहानी भी इसी अंतर को दिखाती है।
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