Kishau Dam Project: 15 हजार करोड़ की लागत से बनेगा कंक्रीट बांध, 6 राज्यों में किसे मिलेगा कितना पानी? समझें

Published on 16 सित॰ 2026

Time Updated: Wednesday, September 16, 2026, 16:46 [IST]

Kishau Multipurpose Dam Project: यमुना बेसिन से जुड़ी एक बड़ी परियोजना करीब आठ साल की देरी के बाद अब आगे बढ़ती दिख रही है। 15 सितंबर 2026 को हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। समझौते के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल भी मौजूद रहे।

इस समझौते के बाद किशाऊ परियोजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए रखा जाएगा। परियोजना पर लंबे समय से लागत, पानी के बंटवारे और हिमाचल प्रदेश को मिलने वाले लाभ को लेकर राज्यों के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी। जून 2026 में केंद्र की ओर से परियोजना के पानी वाले हिस्से की करीब 90 फीसदी लागत उठाने पर सहमति बनने के बाद रास्ता साफ हुआ था।

Kishau Multipurpose Dam Project

क्या है किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना?

किशाऊ परियोजना टोंस नदी पर प्रस्तावित बांध और जलविद्युत परियोजना है। टोंस नदी यमुना की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है। बांध उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बनाया जाना है। इसका असर दोनों राज्यों के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली पर भी पड़ेगा।

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15 सितंबर को जारी सरकारी जानकारी के मुताबिक परियोजना में 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम बनाया जाएगा। इससे करीब 97 हजार हेक्टेयर जमीन की सिंचाई होगी और 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत पैदा होने की बात कही गई है। परियोजना का क्षेत्र हिमाचल प्रदेश के सिरमौर और उत्तराखंड के देहरादून जिले से जुड़ा है। दोनों राज्यों ने जून 2015 में परियोजना के लिए संयुक्त कंपनी बनाने का समझौता किया था। इसके बाद जनवरी 2017 में किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाई गई।

परियोजना से जुड़ी जानकारी विवरण
परियोजना किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना
नदी टोंस नदी
स्थान हिमाचल प्रदेश-उत्तराखंड सीमा
बांध की ऊंचाई 232.6 मीटर
सिंचाई क्षमता करीब 97,000 हेक्टेयर
जलविद्युत उत्पादन 1,476 मिलियन यूनिट
संबंधित राज्य हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली

सिर्फ बिजली नहीं, पानी भी मिलेगा

किशाऊ परियोजना का मकसद केवल बिजली पैदा करना नहीं है। इससे सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने के साथ-साथ दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पीने और औद्योगिक इस्तेमाल के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ाने की योजना है।

Kishau Multipurpose Dam Project

परियोजना से जुड़े पानी के बंटवारे को लेकर राज्यों के बीच अलग-अलग हिस्से तय किए गए हैं। उपलब्ध समझौते के विवरण के मुताबिक छह राज्यों के लिए पानी का आवंटन इस तरह रखा गया है।

किस राज्य के लिए कितना पानी?

राज्य प्रस्तावित पानी
हरियाणा 633 MCM
उत्तर प्रदेश 411 MCM
राजस्थान 124 MCM
दिल्ली 80 MCM
उत्तराखंड 34 MCM
हिमाचल प्रदेश करीब 378 MCM

यमुना के पानी का बंटवारा 1994 से जुड़ा है

किशाऊ परियोजना को समझने के लिए 1994 के यमुना जल समझौते को समझना जरूरी है। 12 मई 1994 को यमुना बेसिन से जुड़े राज्यों के बीच नदी के उपलब्ध पानी के बंटवारे को लेकर समझौता हुआ था। उस समय उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली इसमें शामिल थे।

कुल 11.983 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) सालाना उपयोग योग्य पानी में हरियाणा को 5.730 BCM, उत्तर प्रदेश को 4.032 BCM, राजस्थान को 1.119 BCM, दिल्ली को 0.724 BCM और हिमाचल प्रदेश को 0.378 BCM हिस्सा दिया गया था।

साल 2000 में उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद अविभाजित उत्तर प्रदेश के हिस्से में से 3.721 BCM उत्तर प्रदेश और 0.311 BCM उत्तराखंड के हिस्से में गया।

इसी 1994 के समझौते के तहत यमुना की ऊपरी धारा में तीन बड़े स्टोरेज प्रोजेक्ट की योजना बनी थी। इनमें किशाऊ के अलावा लखवाड़ और रेणुकाजी परियोजनाएं शामिल थीं। इनका मकसद पानी को स्टोर करना और जरूरत के समय अलग-अलग राज्यों तक पहुंचाना था।

पर्यावरणविद डॉ. अभय मिश्र ने जताई चिंता

पर्यावरणविद और लेखक डॉ. अभय मिश्र ने किशाऊ बांध से होने वाले पर्यावरणीय असर को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि जिस इलाके में यह परियोजना बन रही है, वह पहले से ही संवेदनशील क्षेत्र है। हालांकि, उनका कहना है कि सरकार की मंशा अच्छी है और इस परियोजना से छह राज्यों के लोगों को पीने के पानी और सिंचाई की जरूरत पूरी करने में मदद मिल सकती है।

डॉ. मिश्र ने कहा, "सरकार का इंटेंट अच्छा है। इससे छह राज्यों के लोगों के पीने के पानी और सिंचाई की जरूरत पूरी होगी, लेकिन इसके पर्यावरण पर पड़ने वाले असर के बारे में भी सोचना चाहिए। जिस इलाके में यह बांध बन रहा है, वह पहले से ही संवेदनशील क्षेत्र है।"

उन्होंने बांध के कारण बनने वाली बड़ी झील को लेकर भी सवाल उठाए। डॉ. मिश्र के मुताबिक, "इस बांध के कारण यमुना बेसिन में सबसे बड़ी झील बनेगी। ऐसे में अगर धरती की प्लेट जरा भी हिली तो कैसी स्थिति बनेगी, इस पर भी ध्यान देना जरूरी है। अगर नेपाल या केदारनाथ जैसे हालात बन गए तो उसे संभालना मुश्किल हो सकता है। इसलिए परियोजना के फायदे के साथ-साथ पर्यावरण और आपदा के खतरे पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।"

किशाऊ बांध की जरूरत क्यों पड़ी?

यमुना के ऊपरी हिस्से में लंबे समय तक बड़े स्टोरेज की सुविधा नहीं थी। यमुनोत्री ग्लेशियर से लेकर दिल्ली के ओखला बैराज तक करीब 30 हजार वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र यमुना के ऊपरी बेसिन में आता है। किशाऊ, लखवाड़ और रेणुकाजी जैसी परियोजनाओं को इसी वजह से महत्वपूर्ण माना गया। इनके जरिए बारिश और नदी के पानी को स्टोर करके बाद में पीने, सिंचाई और दूसरे कामों के लिए इस्तेमाल करने की योजना है।

किशाऊ परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी DPR इस साल राज्यों के बीच साझा की गई थी, लेकिन सितंबर 2026 तक इसे अंतिम रूप नहीं दिया गया था।

आठ साल तक क्यों अटका रहा प्रोजेक्ट?

किशाऊ परियोजना को लेकर सबसे बड़ी समस्या लागत और लाभ के बंटवारे को लेकर थी। खास तौर पर हिमाचल प्रदेश इस बात को लेकर सहमत नहीं था कि उसे परियोजना पर बड़ी रकम खर्च करनी पड़े, जबकि पानी का बड़ा फायदा नीचे की ओर मौजूद राज्यों को मिले।

पहले की व्यवस्था के तहत हिमाचल प्रदेश की पिछली सरकार ने परियोजना के लिए करीब 800 करोड़ रुपये देने पर सहमति जताई थी। बाद में मौजूदा हिमाचल सरकार ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई। राज्य की चिंता सिर्फ पैसे को लेकर नहीं थी। परियोजना के लिए हिमाचल और उत्तराखंड दोनों में जमीन के डूबने और लोगों के विस्थापन का मुद्दा भी सामने आया था।

2020 की एक व्यवहार्यता रिपोर्ट के अनुसार परियोजना से करीब 2,950 हेक्टेयर जमीन डूब सकती है। इससे दोनों राज्यों के करीब 17 गांव और लगभग 5,500 लोग प्रभावित होने का अनुमान लगाया गया था। हिमाचल प्रदेश का तर्क था कि उसे ऐसे प्रोजेक्ट में भारी निवेश क्यों करना चाहिए जिसका पानी का लाभ मुख्य रूप से दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान जैसे नीचे के राज्यों को मिलेगा।

जून 2026 में कैसे निकला रास्ता?

लंबे विवाद के बाद जून 2026 में केंद्र और छह राज्यों के बीच सहमति बनी। इसके तहत परियोजना के पानी वाले हिस्से की करीब 90 फीसदी लागत केंद्र सरकार उठाएगी, जबकि बाकी 10 फीसदी वित्तीय भार छह राज्यों के बीच साझा किया जाएगा।

इसके साथ हिमाचल प्रदेश के पानी के हिस्से को दिल्ली और राजस्थान को देने और बदले में इन राज्यों से हिमाचल के पावर कंपोनेंट की लागत में हिस्सेदारी कराने पर भी सहमति बनी।

हिमाचल प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव आरडी नजीम के मुताबिक, हिमाचल के हिस्से की परियोजना लागत में दिल्ली और राजस्थान क्रमशः 75 फीसदी और 25 फीसदी योगदान करेंगे, क्योंकि इन दोनों राज्यों को हिमाचल के हिस्से के पानी का लाभ मिलेगा। रिपोर्ट के मुताबिक हिमाचल प्रदेश खुद परियोजना से मिलने वाली बिजली का इस्तेमाल नहीं करेगा। इसके बदले उसे बिजली के हिस्से से आर्थिक लाभ मिलने की व्यवस्था की गई है।

परियोजना की लागत कितनी है?

किशाऊ परियोजना की अनुमानित लागत करीब 15,000 करोड़ रुपये बताई गई है। कुछ हालिया रिपोर्टों में लागत करीब 15,624 करोड़ रुपये बताई गई है। केंद्र सरकार की ओर से परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिया गया है। 15 सितंबर के सरकारी बयान के मुताबिक इसके करीब 90 फीसदी वित्तीय भार को केंद्र सरकार उठाएगी और बाकी 10 फीसदी भागीदार राज्यों द्वारा वहन किया जाएगा।

बांध में कितना पानी स्टोर होगा?

किशाऊ परियोजना की जल भंडारण क्षमता को लेकर अलग-अलग दस्तावेजों और हालिया रिपोर्टों में अलग आंकड़े सामने आए हैं। 15 सितंबर 2026 की केंद्र सरकार की आधिकारिक जानकारी में 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर जल संग्रहण क्षमता बताई गई है। वहीं, परियोजना से जुड़े एक अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट में कुल क्षमता 1,786 MCM और वास्तविक रूप से स्टोर किए जाने वाले पानी की मात्रा 1,324 MCM बताई गई है। इसलिए परियोजना की अंतिम DPR और केंद्रीय मंजूरी के बाद ही इन आंकड़ों की अंतिम स्थिति साफ होगी।

बिजली उत्पादन को लेकर भी अलग आंकड़े

किशाऊ परियोजना की बिजली उत्पादन क्षमता को लेकर भी अलग-अलग रिपोर्टें सामने आई हैं। 15 सितंबर की कुछ रिपोर्टों में इसे 422 MW परियोजना बताया गया, जबकि भारतीय एक्सप्रेस की एक अन्य रिपोर्ट और पुराने आधिकारिक परियोजना दस्तावेजों में 660 MW क्षमता का उल्लेख मिलता है।

वहीं, 15 सितंबर 2026 की PIB जानकारी में परियोजना से 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत पैदा होने की बात कही गई है। ऐसे में परियोजना की अंतिम DPR और केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद इसकी तकनीकी क्षमता से जुड़े आंकड़े ज्यादा स्पष्ट होंगे।

अब आगे क्या होगा?

छह राज्यों के मुख्यमंत्रियों के MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद अगला बड़ा कदम केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी है। जून में केंद्र ने भी साफ किया था कि MoU साइन होने के बाद परियोजना को कैबिनेट के सामने रखा जाएगा। कैबिनेट की मंजूरी के बाद परियोजना की DPR, जमीन, पुनर्वास, लागत और निर्माण से जुड़े अगले चरण आगे बढ़ेंगे। इस समझौते से लंबे समय से अटकी परियोजना के लिए राज्यों के बीच पानी और लागत को लेकर बनी मुख्य सहमति औपचारिक रूप ले चुकी है।

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