Jana Nayagan Review: कैसी है अभिनेता से CM बने Vijay की आखिरी फिल्म? बॉबी देओल ने दिया सरप्राइज, पढ़ें रिव्यू - jana nayagan movie review vijay and bobby deol movie high on action and mass moments but week storyline

Published on 23 जुल॰ 2026

अभिनेता से तमिलनाड़ु के सीएम बने विजय की आखिरी फिल्म अब सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। कैसी है थलापति विजय के करियर की विवादित और आखिरी फिल्म, पढ़ें ...और पढ़ें

जन नायगन मूबी रिव्यू/ फोटो- Jagran Graphics

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प्रियंका सिंह, नई दिल्ली। लगभग साढ़े छह महीनों की प्रतिक्षा, कई विवाद के बाद आखिरकार साउथ सुपरस्टार और अब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय की फिल्म हिंदी में जन नेता और तमिल में जय नायगन के नाम से रिलीज हो गई है।

फिल्म के निर्माताओं और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के बीच दिक्कतों के बाद फिल्म में कई कट लगे, संवाद म्यूट हुए, फिर फिल्म को ए सर्टिफिकेट से साथ हरी झंडी मिली। यह विजय की आखिरी फिल्म है, राजनीति में आने के बाद उन्होंने सिनेमा से दूरी बना ली है।

क्या है जन नायगन की कहानी?

कहानी शुरू होती है थलपति वेट्री कोंडन (विजय) से, जो जेल में बंद है। उसके साथ सहानुभूति रखने वाला एक पुलिस ऑफिसर एक दुर्घटना में मारा जाता है। आखिरी इच्छा के तौर पर वह अपनी बेटी विजी (ममिता बैजू) की जिम्मेदारी थलपति को सौंप देता है। थलपति विजी को सेना में भर्ती करवाना चाहता है। इसी बीच देश का दुश्मन जॉन हिमलर (बॉबी देओल) अफ्रीका को बर्बाद करने के बाद अब भारत को तबाह करना चाहता है।

वह प्रोजेक्ट एमएम के तहत एक खतरनाक साजिश रचता है। थलपति और जॉन जब आमने-सामने आते हैं, तो पता चलता है कि दोनों का एक अतीत है। आगे कहानी में क्या होता है, उसके लिए फिल्म देखनी होगी।

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बड़े मुद्दों के बावजूद भटकती है कहानी

निर्देशक एच विनोद ने ही फिल्म की पटकथा भी लिखी है। फिल्म देखते हुए ऐसा लगता है कि वह विजय की इस आखिरी फिल्म के जरिए लोगों के मन में उनकी छवि किसी सुपरहीरो से कम नहीं रखना चाह रहे थे। तभी फिल्म में जब-जब विजय की एंट्री किसी सीन में होती है, तो स्लो मोशन से लेकर बैकग्राउंड म्यूजिक तक सब दमदार होता है।

हमारे जनता के लीडर... इस देश की जनता का डर भगाने वाला ही थलपति है... जैसे संवाद, उनके हाथों पर बना टीवीके(विजय की राजनीतिक पार्टी, लेकिन फिल्म में उसका मतलब अलग है) को देखकर लगता है, जैसे यह फिल्म इसलिए बनाई गई है, ताकि ऐसा लगे कि विजय राजनीति के लिए ही बने हैं। यह फिल्म उनके राजनीतिक करियर के प्रोमो जैसा लगता है।

इतना हीरोइज्म दिखाने के चक्कर में फिल्म का स्क्रीनप्ले और कहानी से जुड़ा तर्क पीछे छूट जाता है। फिल्म गुड टच बैड टच, लड़कियों को मजबूत बनाने, इंटरनेट मीडिया के पावर, वोट देने की अहमियत, धर्म और जाति के नाम पर लोगों को भड़काने की साजिश जैसे मुद्दों से भी गुजरती है। इतना सब कुछ दिखाने में कहानी कई बार भटकती है।

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चीख-चीख कर पात्रों का करती है गुणगान

मिलिट्री एकैडमी में जाकर वहां के मेजर को खरी-खोटी सुनाना या मेजर का लड़कियों को कमजोर कहना बचकाना लगता हैं। लगभग हर दक्षिण भारतीय फिल्म की तरह इसके संवाद भी बहुत लाउड हैं। चीख-चीख के पात्रों का गुणगान करने वाला तरीका अब पुराना लगता है। अंत में विजय का पूरा फिल्मी सफर विजुअल्स के जरिए दिखाया गया, जो उनकी भव्य फिल्मों की विरासत को दर्शाता है।

फिल्म के संवाद इंडिया को सबसे बड़ी डेमोक्रेसी क्यों कहते हैं? किसी और देश में इतने धर्म, जाति, भाषाएं नहीं मिलेंगी..., लोकतंत्र को खत्म करने की किसी में हिम्मत नहीं... तालियां बटोरते हैं।

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जन नायगन में एक्टर्स ने रोल के साथ किया न्याय?

अभिनय की बात करें, तो विजय अपने नाम के साथ लगे थलापति के टैग के साथ पूरी तरह से न्याय करते है। आखिरी फिल्म के लिहाज से उन्होंने फिल्म में एक्शन, डांस, डायलॉगबाजी में कोई कमी नहीं रखी है। बॉबी देओल विलेन के रोल में एक बार छाप छोड़ते हैं, लेकिन हिंदी में उन्हें अपनी डबिंग खुद करनी चाहिए थी। किसी और की आवाज उनके अभिनय के साथ वह न्याय नहीं कर पा रही थी।

पूजा हेगड़े के हिस्से अब भी केवल हीरो को सपोर्ट करने वाला रोल ही आया हैं। कमजोर लड़की से दमदार फाइटर बनने वाली विजी के रोल में ममिता बैजू जंचती हैं। थलपति की मां के रोल में रेवती को और स्क्रीन स्पेस मिलना चाहिए था। प्रकाश राज और नासर स्क्रिप्ट के दायरे में अपना अनुभव दिखाते हैं।