एजुकेशन
- Authored by: नीलाक्ष सिंह
- Updated Aug 13, 2026, 05:38 AM IST
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास ऐसे वीरों की कहानियों से भरा है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाने के लिए अपना जीवन खुशी खुशी दांव पर लगा दिया। इन्हीं में से एक थे खुदीराम बोस, जिनके बारे में आपको जरूर पढ़ना चाहिए
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स्वतंत्रता सेनानी खुदीराम बोस (Image - ChatGPT)
Khudiram Bose kaun the, Khudiram Bose death fasi date: खुदीराम बोस युवा क्रांतिकारियों में से एक थे। जिस उम्र में युवा अपने करियर और भविष्य की चिंता करते हैं, उस उम्र में खुदीराम बोस देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो चुके थे। मात्र 18 साल की उम्र में उन्हें अंग्रेजों ने फांसी दे दी। वे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सबसे कम उम्र में बलिदान देने वाले क्रांतिकारियों में एक हैं।
खुदीराम बोस का जन्म और जीवन परिचय
खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को बंगाल के मिदनापुर जिले में हुआ था। बचपन से ही उनके मन में देश के प्रति गहरा लगाव था। उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और बंगाल में अंग्रेजी शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियां तेजी से बढ़ रही थीं। किशोरावस्था में खुदीराम बोस का संपर्क क्रांतिकारी संगठन 'अनुशीलन समिति' से हुआ। अनुशीलन समिति युवाओं को संगठित करने और ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए तैयार करने वाला महत्वपूर्ण संगठन था।
अंग्रेजों के खिलाफ क्यों हो गए क्रांतिकारी?
खुदीराम बोस ऐसे समय में बड़े हो रहे थे जब देश में अंग्रेजों के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा था। बंगाल में राष्ट्रवादी आंदोलन और क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रभाव युवाओं पर पड़ रहा था। खुदीराम भी इसी माहौल से प्रभावित हुए।उन्होंने अंग्रेजी शासन का विरोध करने के लिए क्रांतिकारी रास्ता चुना। उनका मानना था कि अंग्रेजों के अत्याचार का मुकाबला किया जाना चाहिए। धीरे-धीरे वे उन क्रांतिकारियों के संपर्क में आए जो ब्रिटिश अधिकारियों को निशाना बनाकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे।
किंग्सफोर्ड को निशाना बनाने की योजना
खुदीराम बोस के जीवन की सबसे चर्चित घटना मुजफ्फरपुर बम कांड से जुड़ी है। उस समय डगलस किंग्सफोर्ड मुजफ्फरपुर में जिला जज के पद पर थे। क्रांतिकारियों की नजर में वे भारतीय राष्ट्रवादियों के खिलाफ कड़े फैसलों के लिए जाने जाते थे। किंग्सफोर्ड को निशाना बनाने की जिम्मेदारी खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी को दी गई थी।
30 अप्रैल 1908 को मुजफ्फरपुर में दोनों ने एक बग्घी को किंग्सफोर्ड की बग्घी समझकर उस पर बम फेंका। लेकिन यह पहचान गलत निकली। उस बग्घी में किंग्सफोर्ड नहीं थे। विस्फोट में दो ब्रिटिश महिलाओं की मौत हो गई। यह घटना क्रांतिकारी आंदोलन और ब्रिटिश प्रशासन दोनों के लिए महत्वपूर्ण बन गई।
खुदीराम बोस कैसे पकड़े गए?
बम विस्फोट के बाद खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी वहां से निकलने की कोशिश करने लगे। पुलिस ने दोनों का पीछा किया। प्रफुल्ल चाकी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए आत्महत्या कर ली, जबकि खुदीराम बोस को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उनके खिलाफ मुजफ्फरपुर बम कांड मामले में मुकदमा चलाया गया। मुकदमे की शुरुआत मई 1908 में हुई थी।
18 साल में फांसी
खुदीराम बोस पर ब्रिटिश अधिकारी किंग्सफोर्ड की हत्या के प्रयास और बम हमले से जुड़े गंभीर आरोप लगाए गए। मुकदमे के दौरान उनके बचाव के लिए कई वकीलों ने पैरवी की, लेकिन अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के रिकॉर्ड के अनुसार, सजा सुनाए जाने के समय खुदीराम की उम्र सिर्फ 18 साल थी। 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। इस तरह बेहद कम उम्र में उनका जीवन समाप्त हो गया। उनके बारे में दर्ज ऐतिहासिक विवरणों में बताया गया है कि मौत की सजा सुनाए जाने के बाद भी उनके चेहरे पर डर नहीं था।
खुदीराम बोस ने देश के लिए क्या किया?
खुदीराम बोस का स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय जीवन बहुत लंबा नहीं रहा, लेकिन कम समय में ही उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अनुशीलन समिति से जुड़कर ब्रिटिश शासन के खिलाफ गतिविधियों में भाग लिया और बाद में प्रफुल्ल चाकी के साथ किंग्सफोर्ड को निशाना बनाने के अभियान में शामिल हुए।
मुजफ्फरपुर की घटना के बाद उनकी गिरफ्तारी, मुकदमा और फांसी ने उन्हें देशभर में चर्चित कर दिया। उनकी शहादत ने यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता की भावना उम्र की मोहताज नहीं होती।
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नीलाक्ष सिंहauthor
नीलाक्ष सिंह 2021 से टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल से जुड़े हैं और एजुकेशन सेक्शन के लिए कंटेंट लिखते हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने प्रिंट मीडिया में इंटर्नशिप की, जहां फील्ड रिपोर्टिंग, स्टूडेंट-इश्यू बेस्ड ग्राउंड स्टोरीज और सटीक न्यूजराइटिंग की बुनियादी समझ हासिल की। प्रिंट के बाद डिजिटल मीडिया में भी वह एजुकेशन बीट पर ही लगातार काम करते रहे हैं। पत्रकारिता में 10 सालों से सक्रिय नीलाक्ष सिंह 12 हजार से अधिक खबरें लिख चुके हैं। वह एग्जाम अपडेट्स, एडमिशन प्रोसेस, करियर गाइडेंस, स्टूडेंट वेलफेयर, बोर्ड रिजल्ट्स और नीतिगत बदलावों पर गहन और बेहद उपयोगी कंटेंट तैयार करते हैं।
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