भोपाल, 15 जुलाई 2026: मध्य प्रदेश में ब्राह्मण विरोधी IAS अधिकारी श्री संतोष वर्मा को राज्य प्रशासनिक सेवा से भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रमोशन के लिए फर्जी कोर्ट ऑर्डर तैयार करने के आरोपी तत्कालीन जिला न्यायाधीश श्री विजेंद्र सिंह रावत को हाईकोर्ट से भी राहत नहीं मिली। अब उनके खिलाफ डिपार्टमेंट एंड इंक्वारी तेज हो जाएगी।
घटना के 5 साल बाद कार्रवाई करना न्यायसंगत नहीं: विजेंद्र सिंह रावत का तर्क
श्री विजेंद्र सिंह रावत, जिला न्यायाधीश रहे हैं और स्वाभाविक तौर पर हाई कोर्ट के जजमेंट का अध्ययन करते रहे होंगे लेकिन अपनी राहत के लिए श्री विजेंद्र सिंह ने हाईकोर्ट में जो तर्क प्रस्तुत किया, उनकी अपनी कोर्ट का क्लर्क भी बता सकता था कि यह तर्क, राहत नहीं दिलवा पाएगा। उन्होंने हाई कोर्ट में कहा कि घटना 2020 में हुई है। 5 साल बाद कार्रवाई करना न्यायसंगत नहीं है। मतलब उनका कहना है कि विभाग में पहले कार्रवाई क्यों नहीं की? और पहले नहीं की तो आप क्यों कर रहे हैं? इसलिए इस कार्रवाई को खारिज कर दिया जाए। हाई कोर्ट ने श्री रावत की याचिका को खारिज कर दिया। स्पष्ट कर दिया कि ऐसा नहीं होता। विभागीय कार्रवाई के लिए कोई टाइम लिमिट नहीं होती और विभागीय कार्रवाई का अधिकार समय सीमा के बाद एक्सपायर नहीं होता।
विजेंद्र रावत और संतोष वर्मा के खिलाफ सबसे बड़ी बात
इस मामले में विजेंद्र रावत और संतोष वर्मा को कहीं से भी राहत नहीं मिल रही है। इसका मुख्य कारण है सीट की इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट जिसमें बताया गया है कि, तत्कालीन जिला न्यायाधीश विजेंद्र सिंह रावत और आईएएस संतोष वर्मा के बीच मोबाइल पर करीब 140 बार बातचीत हुई थी। जांच एजेंसी का दावा है कि इन संपर्कों के बाद ही पूरे मामले में तेजी आई। चार्जशीट के मुताबिक, 6 अक्टूबर 2020 को दोनों के बीच फोन पर बात हुई और फिर दोनों ने इंदौर के ग्रैंड माचल रिजॉर्ट में मुलाकात की। इसी दिन न्यायाधीश ने कोर्ट से अवकाश लेने का आवेदन भी दिया था।
टाइमलाइन अपने आप में एक गवाही है
चार्जशीट में दर्ज टाइम लाइन के अनुसार, आईएएस संतोष वर्मा की विभागीय पदोन्नति (DPC) को हरी झंडी दिलाने के लिए कानूनी प्रक्रियाओं को कथित तौर पर असाधारण गति से आगे बढ़ाया गया। 7 अक्टूबर 2020 की शाम करीब 5:15 बजे कोर्ट की नकल शाखा से आदेश की दो प्रमाणित कॉपी निकाली गईं। उसी रात 9 बजे संतोष वर्मा को उनके रेजिडेंसी क्षेत्र स्थित निवास के पास फैसले की कॉपी सौंप दी गई। 8 अक्टूबर 2020 की सुबह संतोष वर्मा आदेश की कॉपियां लेकर सामान्य प्रशासन विभाग (GAD), भोपाल पहुंच गए और अपना आवेदन पेश कर दिया।
कोर्ट में कौन सा मामला चल रहा था और खुलासा कैसे हुआ
यह पूरा मामला साल 2016 में इंदौर के लसूड़िया थाने में एक महिला द्वारा आईएएस संतोष वर्मा के खिलाफ दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा है। साल 2020 में संतोष वर्मा की पदोन्नति होनी थी, जिसके लिए इस लंबित मामले का निपटारा होना जरूरी था। एसआईटी का आरोप है कि इसी वजह से केस को जल्द खत्म करने के प्रयास शुरू हुए। जब महिला राजीनामा के लिए नहीं मानी तो यह प्लानिंग की गई था कि प्रमोशन मिल जाए। शायद उन्होंने सोचा होगा कि किसी को क्या पता चलेगा। इधर कोर्ट में कैसे चलता रहेगा और उधर प्रमोशन भी मिल जाएगा, लेकिन महिला को पता था कि जब तक उसका केस खत्म नहीं होगा। तब तक श्री संतोष वर्मा को प्रमोशन नहीं मिलेगा।
जैसे ही श्री संतोष वर्मा के प्रमोशन की जानकारी पीड़ित महिला को मिली तो उन्होंने 9 नवंबर 2020 को कोर्ट की विजिलेंस शाखा और जिला न्यायाधीश से शिकायत की। बाद में आरटीआई के जरिए भी जानकारी जुटाई गई। मामला मीडिया तक पहुंच जाने के बाद एमजी रोड थाने में फर्जी निर्णय (जजमेंट) तैयार करने का मुकदमा दर्ज हुआ। एसआईटी ने जांच के बाद विजेंद्र सिंह रावत और संतोष वर्मा दोनों को आरोपी बनाते हुए कोर्ट में चार्जशीट पेश की।
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