Explainer: क्या है राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA)? दिल्ली पुलिस कमिश्नर को मिले अधिकार से आया चर्चा में

Published on 24 जुल॰ 2026

National Security Act: देश की राजधानी दिल्ली में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है. इसकी वजह दिल्ली पुलिस आयुक्त (कमिश्नर) को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कुछ मामलों में हिरासत में लिए जाने का अधिकार दिया जाना है. यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है, दिल्ली के जंतर मंतर  पर नीट पेपर लीक के चलते बड़े स्तर पर सीजेपी और छात्रों का विरोध प्रदर्शन चल रहा है. 

ऐसे में सोशल मीडिया पर चर्चा चली कि कमिश्नर को यह अधिकार छात्रों को हिरासत में लेने के लिए दिए गए हैं. हालांकि बाद में दिल्ली पुलिस ने इस पर सफाई देते हुए इनकार किया. दिल्ली पुलिस कमिश्नर को इस तरह के अधिकार पहली बार नहीं दिए गए हैं. केंद्र सरकार समय-समय पर अधिसूचना जारी कर इन अधिकारों का विस्तार करती रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून क्या है, इसके तहत किसे गिरफ्तार किया जा सकता है, इसमें क्या प्रावधान हैं और इसे लेकर विवाद क्यों होता है.

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क्या है राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA)?

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (National Security Act- NSA) एक निरोधात्मक हिरासत (Preventive Detention) संबंधी कानून है. इसे वर्ष 1980 में तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के दौरान लागू किया गया था. इस कानून का उद्देश्य देश की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और आवश्यक सेवाओं को बनाए रखना है. 

इस कानून के तहत सरकार किसी व्यक्ति को तब भी हिरासत में ले सकती है, जब उसने कोई अपराध किया न हो, लेकिन प्रशासन को यह आशंका हो कि भविष्य में उसकी गतिविधियां देश की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या आवश्यक सेवाओं के लिए खतरा बन सकती हैं. यही कारण है कि NSA को सामान्य आपराधिक कानूनों से अलग माना जाता है। इसमें कार्रवाई अपराध होने के बाद नहीं, बल्कि संभावित खतरे को रोकने के लिए की जाती है.

NSA के तहत किसे हिरासत में लिया जा सकता है?

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की गतिविधियां—

  • भारत की सुरक्षा के लिए खतरा हों,
  •  देश की संप्रभुता और अखंडता को प्रभावित करती हों,
  •  सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) बिगाड़ सकती हों,
  •  आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति बाधित कर सकती हों,
  •  विदेशी नागरिकों के भारत में रहने या उन्हें देश से बाहर भेजने से जुड़े मामलों में सुरक्षा संबंधी खतरा पैदा करती हों,

तो प्रशासन उसे बिना नियमित आपराधिक मुकदमे के भी निरोधात्मक हिरासत में ले सकता है.

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कितने समय तक हिरासत में रखा जा सकता है?

NSA के तहत किसी व्यक्ति को अधिकतम 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है. हालांकि यह अवधि एक साथ तय नहीं होती, बल्कि समय-समय पर समीक्षा के बाद बढ़ाई जा सकती है. गिरफ्तारी के बाद संबंधित व्यक्ति को आमतौर पर हिरासत के कारण बताए जाते हैं. हालांकि यदि सरकार को लगता है कि कारण बताने से राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित होगी, तो कुछ जानकारियां गोपनीय रखी जा सकती हैं.

क्या अदालत से तुरंत राहत मिलती है?

सामान्य आपराधिक मामलों में पुलिस को निर्धारित समय के भीतर आरोपपत्र दाखिल करना पड़ता है, जबकि NSA के मामलों में प्रक्रिया अलग होती है. इस कानून के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को सीधे नियमित जमानत का लाभ नहीं मिलता. हालांकि वह उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में हिरासत की वैधता को चुनौती दे सकता है.

एडवाइजरी बोर्ड की क्या भूमिका होती है?

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत की समीक्षा के लिए एक एडवाइजरी बोर्ड (Advisory Board) बनाया जाता है, जिसमें उच्च न्यायालय के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश शामिल होते हैं. सरकार को निर्धारित समय के भीतर मामला बोर्ड के सामने रखना होता है. यदि बोर्ड को हिरासत उचित नहीं लगती, तो व्यक्ति को रिहा किया जा सकता है. यदि बोर्ड हिरासत को सही मानता है, तो सरकार निरोध की अवधि जारी रख सकती है.

दिल्ली पुलिस कमिश्नर को कौन से अधिकार मिले?

दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है और यहां कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी केंद्र सरकार के अधीन आती है. इसी कारण केंद्रीय गृह मंत्रालय समय-समय पर अधिसूचना जारी कर दिल्ली पुलिस आयुक्त को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरोधात्मक हिरासत के आदेश जारी करने की शक्ति देता है. इन अधिकारों का उद्देश्य ऐसी परिस्थितियों में तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित करना है, जहां किसी व्यक्ति की गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर खतरा होने की आशंका हो. ध्यान देने वाली बात यह है कि यह अधिकार स्थायी नहीं होते, बल्कि निर्धारित अवधि के लिए अधिसूचना के माध्यम से दिए जाते हैं और समय-समय पर इनका नवीनीकरण किया जाता है।

NSA और सामान्य कानून में क्या अंतर है?

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून और भारतीय न्याय संहिता (BNS) या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत दर्ज होने वाले मामलों में बड़ा अंतर है. सामान्य आपराधिक कानून में किसी अपराध के घटित होने के बाद पुलिस जांच करती है, सबूत जुटाती है और अदालत में मुकदमा चलता है. वहीं NSA में किसी व्यक्ति को भविष्य में संभावित खतरे के आधार पर हिरासत में लिया जा सकता है. इसलिए इसे Preventive Detention Law कहा जाता है. यही कारण है कि यह कानून हमेशा बहस का विषय बना रहता है.

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NSA को लेकर विवाद क्यों होता है?

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के समर्थकों का कहना है कि आतंकवाद, संगठित हिंसा, सांप्रदायिक तनाव और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकार के पास त्वरित कार्रवाई का प्रभावी कानूनी साधन होना चाहिए. उनका मानना है कि कई बार अपराध होने का इंतजार करना सुरक्षा की दृष्टि से उचित नहीं होता.

दूसरी ओर मानवाधिकार संगठनों और कई कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस कानून के व्यापक अधिकारों का दुरुपयोग भी संभव है. उनका तर्क है कि बिना मुकदमे के लंबे समय तक हिरासत नागरिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों पर असर डाल सकती है. इसलिए इस कानून का उपयोग केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में और पूरी कानूनी सावधानी के साथ किया जाना चाहिए.

किन मामलों में चर्चा में रहा है NSA?

पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्यों में सांप्रदायिक हिंसा, दंगे, गो-तस्करी, गैंगस्टर गतिविधियों, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों और कानून-व्यवस्था बिगाड़ने के आरोपों में कई व्यक्तियों पर NSA लगाया गया है. हालांकि प्रत्येक मामले में प्रशासन को यह साबित करना होता है कि संबंधित व्यक्ति की गतिविधियां केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा थीं.

आखिर क्या निकला निष्कर्ष?

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून भारत के सबसे शक्तिशाली निरोधात्मक कानूनों में से एक माना जाता है. इसका उद्देश्य देश की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखना है, लेकिन इसके व्यापक अधिकारों के कारण यह हमेशा कानूनी और राजनीतिक बहस का विषय भी बना रहता है.

दिल्ली पुलिस कमिश्नर को इस कानून के तहत मिले अधिकारों के बाद NSA एक बार फिर चर्चा में है. सरकार का कहना है कि ऐसे अधिकार सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक हैं, जबकि आलोचकों का मानना है कि इनका उपयोग बेहद संतुलित और जवाबदेही के साथ होना चाहिए. ऐसे में राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना ही इस कानून की सबसे बड़ी कसौटी माना जाता है.

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