सिया गोयल ने बॉयफ्रेंड चेतन चौधरी के साथ मिलकर मंगेतर केतन अग्रवाल को लोहागढ़ किले से धक्का देकर मार डाला है. वजह- सिया केतन से शादी नहीं करना चाहती थी. सिया-चेतना से पूछताछ के बाद पुणे पुलिस द्वारा बताई गई ये थ्योरी पूरे देश को पता चल गई है. हालांकि, ये बातें कहने में जितनी आसान है, कोर्ट में उसे साबित करना उतना ही मुश्किल है.
ऐसे में अब सवाल आता है कि क्या केतन अग्रवाल की हत्या मामले में सिया बच जाएगी? पुलिस अब इसे कैसे साबित करेगी. क्या आरुषि हत्याकांड की तरह ही सिया-चेतन भी हत्यारे होने के बाद बच जाएंगे. आखिर दोनों केसों के बीच क्या समानता है? आइये जानते हैं…
पुलिस ने सिया को किस आधार पर केतन की हत्या का आरोपी बनाया है?
केतन के परिवार को सिया पर हुआ शक
अंतिम संस्कार के अगले दिन सिया के जवाबों से परिवार को संदेह हुआ. केतन की बहन बोली कि वह अनुभवी ट्रैकर था, हादसे में मौत संभव नहीं. परिवार ने पुलिस से दोबारा जांच की मांग की. पिता ने बताया कि केतन को पहले से सिया के अफेयर का शक था.सिया और केतन की सगाई फरवरी 2026 में हुई थी, नवंबर में शादी तय थी.
सिया ने बदले अपने बयान
पहले कहा कि तेज हवा से फिसलकर केतन खाई में गिरा. बाद में बयान बदला और पानी की बोतल देते समय संतुलन बिगड़ने की बात कही. पुलिस को केतन के फोन में किले की कोई फोटो नहीं मिली. पुलिस ने कहा कि लोहगढ़ किले पर ऐसा हादसा पहले कभी नहीं हुआ.
CCTV में हुडी पहने संदिग्ध दिखा
CCTV में केतन और सिया के आसपास एक हुडी पहने युवक दिखाई दिया. गर्मी के बावजूद हुडी पहनने और चेहरा छिपाने से पुलिस को शक हुआ. संदिग्ध सिया को इशारे करता भी नजर आया. इसी फुटेज के आधार पर चेतन पुलिस के रडार पर आया.
हत्या वाले दिन चेतन की संदिग्ध गतिविधियां
चेतन के फोन की लोकेशन ऑफिस में थी, लेकिन पूरे दिन मोबाइल डेटा बंद रहा. कॉल्स रिसीव हुए, लेकिन डेटा सुबह 7 बजे से शाम 5:40 बजे तक ऑफ रहा. जांच में पता चला कि उसका फोन कर्मचारी के पास था. कर्मचारी का फोन लोहगढ़ किले पर मिला. पुलिस का दावा है कि चेतन हुडी पहनकर किले पहुंचा और वारदात में शामिल था.
सिया और चेतन के बीच 2000 से ज्यादा कॉल
पुलिस को सिया और चेतन के बीच 2004 कॉल्स का रिकॉर्ड मिला. जनवरी से 18 जून तक दोनों ने करीब 338 घंटे बातचीत की. औसतन दोनों रोज 11 कॉल और करीब 2 घंटे बात करते थे. कॉल रिकॉर्ड ने दोनों के करीबी संबंधों की पुष्टि की.
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क्या सिया को दोषी साबित करने के लिए ये 5 आधार काफी हैं?
अदालत हत्या के मामलों में सिर्फ शक के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस या परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर फैसला सुनाती है. अगर हत्या का प्रत्यक्ष सबूत होता है तो आरोपी को दोषी ठहराना आसान होता है. केतन मामले में पुलिस का दावा है कि उसे धक्का देकर खाई में गिराया गया, लेकिन अभी तक इसका कोई सबूत पुलिस के हाथ नहीं लगा है.
अगर सबूत न हों, तो साक्ष्यों की मजबूत कड़ी जरूरी होती है. इसके तहत मोटिव, फोन रिकॉर्ड, लोकेशन, CCTV और अन्य सबूतों से यह साबित करना होता है कि हत्या का कोई दूसरा संभावित कारण नहीं था. पुलिस के पास सिर्फ सिया और चेतन के कबूलनामे हैं, लेकिन पुलिस के सामने कबूला गया अदालत में मान्य साक्ष्य नहीं माना जाता.
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क्या सिया और चेतन हत्या के आरोप से बच सकते हैं?
कानून के अनुसार, सिर्फ संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं माना जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की हर कड़ी पूरी तरह साबित होनी चाहिए और सभी तथ्य सिर्फ आरोपी की ओर ही इशारा करें. अगर किसी भी स्तर पर दूसरी संभावना बनती है तो आरोपी को संदेह का लाभ मिल सकता है.
लीगल एक्सपर्ट्स के अनुसार, पुलिस को यह साबित करना होगा कि हत्या का स्पष्ट मोटिव क्या था, दोनों के बीच साजिश कैसे बनी और केतन को जानबूझकर धक्का दिया गया. साथ ही फोन रिकॉर्ड, चैट, CCTV, लोकेशन और फॉरेंसिक साक्ष्यों से यह भी साबित करना होगा कि केतन की मौत दुर्घटना नहीं, बल्कि सुनियोजित हत्या थी. यदि सबूतों की यह पूरी श्रृंखला अदालत में स्थापित नहीं हो पाती, तो आरोपियों को राहत मिल सकती है.
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क्या पहले भी ऐसे मामलों में कोर्ट ने फैसले बदले हैं?
जवाब है- हां. आरुषि-हेमराज हत्याकांड इसका सबसे चर्चित उदाहरण है. साल 2008 में नोएडा में आरुषि तलवार और घरेलू सहायक हेमराज की हत्या हुई थी. मामले में आरुषि के माता-पिता राजेश और नूपुर तलवार पर ऑनर किलिंग का आरोप था.
साल 2013 में CBI की स्पेशल कोर्ट ने दोनों को दोषी माना. हालांकि, 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सबूतों की कमी और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कमजोर कड़ी के आधार पर दोनों को बरी कर दिया. खास बात है कि सिया के वकील तनवीर अहमद मीर ने ही तलवार दंपति की भी पैरवी की थी.
हाईकोर्ट ने कहा था कि अगर अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि घटना के समय घर में किसी बाहरी व्यक्ति के आने की संभावना नहीं थी, बचाव पक्ष ने वैकल्पिक संभावना पेश कर संदेह पैदा कर दिया, जिसके बाद अदालत ने आरोपियों को संदेह का लाभ दिया और उन्हें बरी कर दिया. ये सिद्धांत बताता है कि सिर्फ शक नहीं, बल्कि हर परिस्थिति को ठोस सबूतों से जोड़कर साबित करना आवश्यक होता है.
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