नीट (NEET) पेपर लीक स्कैंडल को लेकर दिल्ली की सड़कों से लेकर संसद के गलियारों तक मचा राजनीतिक तूफान केवल एक छात्र आंदोलन तक सीमित नहीं है। राहुल गांधी और कांग्रेस के आक्रामक रुख के पीछे एक ऐसी सोची-समझी रणनीति काम कर रही थी, जिसने मोदी सरकार के महत्वाकांक्षी 'डिलिमिटेशन प्रोजेक्ट' पर फिलहाल ब्रेक लगा दिया है।
विपक्ष के "जब तक शिक्षा मंत्री का इस्तीफा नहीं, तब तक कोई संसद नहीं" के फॉर्मूले ने सरकार को पूरी तरह बैकफुट पर धकेल दिया।
- Published: 23 Jul 2026, 03:07 PM IST
- Last Updated: 23 Jul 2026, 03:07 PM IST
देश की राजनीति में नीट परीक्षा धांधली को लेकर उभरा जनाक्रोश अब बड़े सियासी मोड़ पर पहुंच चुका है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और राहुल गांधी ने इस मुद्दे को सीधे केंद्र सरकार की विश्वसनीयता से जोड़ते हुए 'फ्रंट-फुट' पर हमला बोला।
पर्दे के पीछे तैयार की गई इस स्क्रिप्ट का मुख्य असर यह हुआ कि सरकार जिस बहुचर्चित परिसीमन विधेयक को संसद के मानसूनी सत्र में पेश करने की तैयारी कर रही थी, उसे मजबूरन ठंडे बस्ते में डालना पड़ा है।
सोशल मीडिया से पीएम आवास के सामने धरने तक का सफर
नीट घोटाला उजागर होते ही राहुल गांधी ने बिना वक्त गंवाए सीधे मोर्चा संभाला। उन्होंने सोशल मीडिया पर केंद्र सरकार को 'पेपर लीक की फैक्ट्री' करार देने के साथ ही देशभर में प्रभावित छात्रों और उनके परिजनों से मुलाकातें शुरू कीं। इसी दौरान बोस्टन से डिजाइन हुए 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के डिजिटल प्लेटफॉर्म और जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के अनशन ने आंदोलन में आग में घी का काम किया।
जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, तो कांग्रेस ने रणनीति का दूसरा चरण लागू कर दिया। राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और इंडिया गठबंधन के तमाम बड़े नेता अचानक 7, लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने पर बैठ गए, जिससे अचानक पूरा राजनीतिक नैरेटिव बदल गया।
'नो इस्तीफा, नो हाउस' का फॉर्मूला और सरकार की घेराबंदी
संसद का सत्र शुरू होते ही विपक्ष ने इस मुद्दे पर काम रोको प्रस्ताव की मांग की, लेकिन कांग्रेस की रणनीति बेहद स्पष्ट और केंद्रित थी। कांग्रेस ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को अपनी मुख्य शर्त बना लिया।
"जब तक शिक्षा मंत्री का इस्तीफा नहीं, तब तक कोई संसद नहीं" के फॉर्मूले ने सरकार को पूरी तरह बैकफुट पर धकेल दिया। इस अडिग रुख की वजह से संसद में किसी भी अन्य सामान्य विधायी कामकाज या चर्चा का माहौल ही नहीं बन सका।
कैसे अटका मोदी सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट 'डिलिमिटेशन'
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा और अदृश्य असर परिसीमन विधेयक पर पड़ा। मानसूनी सत्र से ठीक पहले सरकार इस कंट्रोवर्शियल बिल को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत का गणित बिठाने में जुटी हुई थी। हालांकि, नीट मामले पर संसद में मचे घमासान और सड़कों पर छात्रों के भारी आक्रोश के बीच सरकार के लिए परिसीमन जैसा संवेदनशील बिल पेश करना भारी राजनीतिक जोखिम बन गया।
राहुल गांधी के इस चौतरफा दांव ने सरकार को लगातार सफाई देने की मुद्रा में ला दिया, जिसके चलते मोदी सरकार का सबसे बड़ा ड्रीम प्रोजेक्ट फिलहाल मानसूनी सत्र के लिए टल गया है।