भाजपा को घेरने निकले दिग्विजय, कांग्रेस ने बनाई दूरी: क्या बेटे को CM फेस बनाना चाहते हैं; अयोध्या तक यात्रा क्यों, UP में जमीन तलाश रहे? - Madhya Pradesh News

Published on 22 अक्टू॰ 2026

79 साल के दिग्विजय सिंह ने 20 अक्टूबर को उज्जैन के महाकाल मंदिर से अयोध्या के राम मंदिर तक पैदल यात्रा शुरू की है। करीब 930-950 किमी की 'सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा' 70 दिन में पूरी होनी है। दिग्विजय इसे निजी यात्रा बताते हैं। फिर भी शुरुआत में कांग्

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सवाल है कि दिग्विजय को धार्मिक यात्रा में क्यों निकलना पड़ा, वे क्या हासिल करना चाहते हैं और कांग्रेस इससे दूरी क्यों रख रही है…समझेंगे मध्य प्रदेश एक्सप्लेनर में।

सवाल 1: दिग्विजय सिंह को अभी यात्रा निकालने की जरूरत क्यों पड़ी?

जवाब- तीन वजहें दिखती हैं: एक तो ताजा मुद्दा, खाली होती राजनीतिक जगह और UP का चुनावी कैलेंडर।

ताजा मुद्दा: राम मंदिर में दान की गिनती के दौरान चोरी का मामला 4 जून 2026 को सामने आया। 25 जून को FIR हुई और गिनती से जुड़े 8 कर्मचारी गिरफ्तार हुए।

⇒ SIT ने सितंबर में चार्जशीट दाखिल की। इसमें CCTV में 105 से ज्यादा घटनाएं बताई गई हैं और ₹79.85 लाख की बरामदगी दिखाई गई है। ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा इस्तीफा दे चुके हैं। वे आरोपी नहीं, अभियोजन के गवाह हैं।

⇒ कांग्रेस का आरोप है कि बड़े नाम बचाए गए, और वह सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच मांग रही है। दिग्विजय ने ₹200-300 करोड़ के गबन और 8 महीने की CCTV फुटेज मिटाने का दावा किया है। अब तक सामने आई चार्जशीट की जानकारी में यह आंकड़ा नहीं है।

खाली होती जगह: जनवरी में दिग्विजय ने खुद कहा था कि वे राज्यसभा में तीसरा कार्यकाल नहीं लेंगे। वे 2019 (भोपाल) और 2024 (राजगढ़) में लोकसभा चुनाव हार चुके हैं। जून में MP की उनकी सीट BJP के महेश केवट को मिली। राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई के मुताबिक बड़े पद के रास्ते लगभग बंद हैं, इसलिए वे चर्चा में बने रहना चाहते हैं।

कैलेंडर: UP विधानसभा चुनाव फरवरी-मार्च 2027 में होने की उम्मीद है। 70 दिन का लक्ष्य पूरा हुआ तो यात्रा दिसंबर के आखिर में अयोध्या पहुंचेगी, यानी मतदान से कुछ हफ्ते पहले।

सवाल 2. महाकाल से राम मंदिर तक की यात्रा का क्या संदेश है?

जवाब- संदेश दो स्तर पर है- एक प्रतीकों का, दूसरा सवालों का।

⇒ यात्रा को 'शिवधाम से रामधाम' कहा गया है। पहले दिन चिंतामन गणेश दर्शन, पार्थिव शिवलिंग पूजन, कन्या पूजन और महाकाल दर्शन हुए। रथ पर राम दरबार है और गंगा, यमुना, शिप्रा, कावेरी, नर्मदा का जल रखा है। सूत्रों के मुताबिक शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद समेत कुछ संतों का आशीर्वाद यात्रा को मिला है।

⇒ दिग्विजय का तर्क है कि चढ़ावे का हिसाब पारदर्शी हो और जवाबदेही छोटे कर्मचारियों पर नहीं, ऊपर तक तय हो। साथ में वोट चोरी की निष्पक्ष जांच और EVM की जगह बैलेट पेपर की मांग है। यात्रा के जरिए राष्ट्रपति के नाम डिजिटल याचिका जारी की जा रही है।

⇒ उज्जैन सांसद अनिल फिरोजिया इसे 'राजनीतिक नौटंकी' कहते हैं। उनका सवाल है कि सनातन का ध्वज भगवा है, पर यात्रा में वह नहीं दिखता। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि राम और सनातन पर बोलने का कांग्रेस को नैतिक अधिकार नहीं है।

⇒ 2017-18 की नर्मदा परिक्रमा में दिग्विजय भगवा झंडे के साथ चले थे और संघ कार्यकर्ताओं की मदद की तारीफ भी की थी। इस बार शुरुआत से ही RSS-VHP (विश्व हिंदू परिषद) पर सीधा हमला है।

दिग्विजय महाकालेश्वर मंदिर से अयोध्या तक की यात्रा 70 दिन के अंदर पूरी करेंगे।

दिग्विजय महाकालेश्वर मंदिर से अयोध्या तक की यात्रा 70 दिन के अंदर पूरी करेंगे।

सवाल 3. क्या दिग्विजय सिंह भाजपा की हिंदुत्व राजनीति को चुनौती दे रहे हैं?

जवाब- दिग्विजय सिंह का कहना है कि उनकी लड़ाई भाजपा और RSS की विचारधारा से है, हिंदू धर्म से नहीं।

⇒ भास्कर को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि सनातन धर्म भाजपा, RSS और VHP से पुराना है। वे इसका मूल संदेश ‘प्राणियों में सद्भावना हो और विश्व का कल्याण हो’ बताते हैं।

⇒ राजनीतिक विश्लेषक राशिद किदवई के मुताबिक, यात्रा के जरिए दिग्विजय वोट चोरी और चंदा चोरी के मुद्दों को चर्चा में बनाए रखना चाहते हैं। इसमें धार्मिक आस्था के साथ मंदिरों में चढ़ावे के हिसाब और जवाबदेही का सवाल भी जुड़ा है।

⇒ भाजपा नेता अनिल फिरोजिया ने यात्रा को ‘राजनीतिक नौटंकी’ बताया है। उन्होंने राम सेतु और भगवान राम को काल्पनिक बताए जाने के पुराने विवादों का भी जिक्र किया। भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने आरोप लगाया कि दिग्विजय सनातन धर्म के समर्थन में नहीं हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि दिग्विजय ने बाबरी ढांचे के समय कारसेवकों का समर्थन क्यों नहीं किया।

⇒ राजनीतिक विश्लेषक दिनेश गुप्ता के मुताबिक, यात्रा का उत्तर प्रदेश वाला हिस्सा अहम होगा। वहां 2027 में विधानसभा चुनाव हैं और कांग्रेस का संगठन अपेक्षाकृत कमजोर है। यात्रा का असर इस बात से समझा जा सकेगा कि स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता कितनी संख्या में जुड़ते हैं, आम लोगों की प्रतिक्रिया कैसी रहती है और समाजवादी पार्टी के नेता इसमें शामिल होते हैं या नहीं।

⇒ किदवई के मुताबिक, दिग्विजय पहले भी नर्मदा परिक्रमा जैसी लंबी यात्रा कर चुके हैं और लंबे समय से भाजपा तथा RSS की विचारधारा की आलोचना करते रहे हैं। इसलिए इस यात्रा को मध्य प्रदेश के अगले विधानसभा चुनाव से सीधे जोड़ने के बजाय उत्तर प्रदेश के राजनीतिक संदर्भ में देखना ज्यादा प्रासंगिक है।

सवाल 4. कांग्रेस इस यात्रा से दूरी क्यों बनाए हुए है?

जवाब- दूरी ऐसी है कि फायदा हो तो पार्टी साथ दिखे, और नुकसान हो तो इसे 'निजी यात्रा' कहा जा सके।

⇒ 17 अक्टूबर को इंदौर में दिग्विजय ने खुद इसे निजी यात्रा बताया और कांग्रेस से संबंध से इनकार किया। फिर भी प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी पहले दिन यात्रा में शामिल हुए।

सेकुलर छवि: किदवई के मुताबिक घोषित रूप से जुड़ने पर कांग्रेस अपने सेकुलर एजेंडे से हटती दिखती। दिनेश गुप्ता के मुताबिक धार्मिक यात्रा में अल्पसंख्यकों की भूमिका का सवाल भी खड़ा होता है।

UP की अंदरूनी खींचतान: 5 अक्टूबर को कांग्रेस ने UP अध्यक्ष अजय राय की जगह आराधना मिश्रा मोना को चुना। सूत्रों के मुताबिक प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने राय के मंदिर जाने जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए थे और पार्टी दलित आधार पर जोर देना चाहती है। यानी UP में पार्टी की मौजूदा लाइन धार्मिक यात्रा वाली नहीं है।

सपा से सीट बंटवारा: कांग्रेस 2022 में UP में सिर्फ 2 सीट जीती थी। 2024 में सपा के साथ मिलकर 6 लोकसभा सीटें मिलीं। अब वह कम से कम 150 सीटें मांग रही है और सपा से खींचतान चल रही है। ऐसे में अलग धार्मिक मोर्चा खुलना गठबंधन की बातचीत को और उलझा सकता है।

दूरी का फायदा: दोनों विश्लेषक यही कहते हैं कि यात्रा चली तो कांग्रेस को फायदा होगा, पिटी तो वह इसे 'निजी यात्रा' बता देगी। हालांकि, दूरी मुद्दे से नहीं, यात्रा के स्वरूप से है। जयराम रमेश राम मंदिर दान चोरी में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाली जांच की मांग कर चुके हैं।

जीतू पटवारी ने यात्रा को लेकर ट्वीट भी किया

सवाल 5. इस यात्रा से दिग्विजय सिंह और कांग्रेस को क्या हासिल हो सकता है?

जवाब- यह UP में मिलने वाले रिस्पॉन्स पर निर्भर है। तीन संभावनाएं हैं।

यात्रा चली: दिग्विजय पार्टी में प्रासंगिक बने रहेंगे और कांग्रेस को बिना अपनाए फायदा मिल सकता है। पिछला उदाहरण नर्मदा परिक्रमा है- 192 दिन, करीब 3,300 किमी, और छह महीने बाद 2018 में कांग्रेस 15 साल बाद सत्ता में लौटी। IANS के विश्लेषण के मुताबिक रास्ते के 16 जिलों की 65 सीटों में कांग्रेस ने 36-37 जीतीं।

UP का हिस्सा ज्यादा: किदवई के अनुसार रूट का करीब 40% हिस्सा ही MP में है। रूट में ओरछा, कालपी, उरई, कानपुर देहात और बाराबंकी जैसे पड़ाव हैं। MP में 2028 के चुनाव पर इसका असर सीमित रह सकता है।

यात्रा फीकी रही: कांग्रेस इसे निजी बताकर निकल सकती है। नुकसान दिग्विजय की साख को होगा।

⇒ किदवई के मुताबिक उनके हिंदुत्व-विरोधी बयान अंत में कांग्रेस के खिलाफ जाते हैं। इंदौर में 'संघी आतंकवाद' जैसे शब्द का BJP मुद्दा बना सकती है।

⇒ दिनेश गुप्ता का मानना है कि इसमें बेटे जयवर्धन के राजनीतिक भविष्य की चिंता भी हो सकती है। कांग्रेस आलाकमान के सामने सीएम फेस के तौर पर प्रजेंट करने की सोच भी हो सकती है।

कुल मिलाकर यात्रा की असली परीक्षा MP में नहीं, UP के रास्ते में होगी। देखना होगा कि भीड़ कैसी रहती है और सपा-कांग्रेस के नेता साथ दिखते हैं या नहीं। दिसंबर तक SIT केस की प्रगति भी तय करेगी कि चंदे वाला मुद्दा कितना टिकता है।

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