'न्यायपालिका पक्ष या विपक्ष नहीं देखती', CJI सूर्यकांत ने ऐसा क्यों कहा? - cji surya kant big statement indian judiciary upholds constitutional values justice not look ruling or opposition

Published on 13 अग॰ 2026

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका संविधान की संरक्षक है और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर निर्णय लेती है, किसी का पक्ष नहीं लेती। ...और पढ़ें

CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका के फैसले को लेकर कही बड़ी बात (जागरण)

CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका के फैसले को लेकर कही बड़ी बात (जागरण)

HighLights

  1. न्यायपालिका संविधान की संरक्षक, संवैधानिक मूल्यों पर आधारित फैसले।

  2. हाशिए पर पड़े लोगों के लिए न्यायिक हस्तक्षेप संवैधानिक कर्तव्य।

  3. लंबित मामलों की चुनौती, समय-सीमा तय करने को समिति।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने गुरुवार को कहा कि भारतीय न्यायपालिका संविधान की संरक्षक है। न्यायपालिका किसी का पक्ष नहीं लेती, बल्कि अपने फैसले पूरी तरह से संवैधानिक मूल्यों के आधार पर लेती है।

डीडी न्यूज को दिए साक्षात्कार में जस्टिस सूर्यकांत ने संविधान को देश की सबसे बड़ी शक्ति बताया और कहा कि इसके मूल ढांचे की रक्षा करना व उसे मजबूत बनाना ही न्यायपालिका की अहम भूमिका है।

'न्यायपालिका किसी पक्ष या विपक्ष के लिए फैसला नहीं करती'

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, 'न्यायपालिका किसी पक्ष या विपक्ष के लिए फैसला नहीं करती; यह संवैधानिक मूल्यों और संविधान की रक्षा के प्रति समर्पित होकर फैसला करती है।'

साथ ही कहा, 'देश के हालात बदलने के बावजूद संविधान का मूल ढांचा वैसा ही रहेगा। इसे बदला नहीं जा सकता; हमें इसे उसी सम्मान और आदर के साथ मजबूत करना चाहिए।

न्यायिक सक्रियता और निष्पक्षता के मुद्दे पर प्रधान न्यायाधीश ने बताया कि हाशिए पर रहने वाले और कमजोर वर्गों के लिए न्यायिक हस्तक्षेप एक मुख्य संवैधानिक कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा है और वे अपने कानूनी व संवैधानिक अधिकारों के लिए आसानी से अदालत तक नहीं पहुंच सकते।

जनहित याचिका और स्वतः संज्ञान मामले उन लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए जरूरी साधन हैं। इनके जरिये हम उन लोगों को अधिकार वापस दिलाते हैं जो सीधे हमारे सामने नहीं हैं। लोग इस जिम्मेदारी को 'न्यायिक सक्रियता' का नाम देते हैं।

प्रधान न्यायाधीश ने माना कि न्यायिक व्यवस्था में सुधार के बावजूद सुप्रीम कोर्ट से लेकर जिला एवं सत्र अदालत तक लंबित मामलों का ढेर एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, 'जनता की यह उम्मीद बिल्कुल सही है कि हर मामले का फैसला एक निश्चित समय-सीमा में और तेजी से होना चाहिए। लेकिन हर तरह के मामलों के लिए एक ही समय-सीमा नहीं हो सकती। यह समय-सीमा क्या होनी चाहिए, इसके लिए हमने एक समिति बनाई है। वह जो भी सुझाव देगी, उसी के आधार पर हम समय-सीमा तय करेंगे।'

जस्टिस सूर्यकांत ने मामलों के तेजी से निपटारे की दिशा में खास अदालतों के गठन को एक अहम कदम बताया। उन्होंने कहा कि सरकार के सहयोग से न्यायपालिका कई गंभीर अपराधों के मुकदमों के लिए एक वर्ष के भीतर खास अदालतें बनाने में सफल रही है।

प्रधान न्यायाधीश ने माना कि न्यायपालिका अभी तक लंबित मामलों की संख्या कम करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाई है। उन्होंने इसके लिए जजों की नियुक्ति और जिला अदालतों में जजों की संख्या बढ़ाने की जरूरत जैसे मुद्दों का जिक्र किया।

खास राज्यों या इलाकों से जुड़ी याचिकाओं के सीधे सुप्रीम कोर्ट में दायर किए जाने पर प्रधान न्यायाधीश ने हाई कोर्टों की संवैधानिक भूमिका पर जोर दिया।

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि देशभर पर असर डालने वाले मामलों को सुप्रीम कोर्ट देख सकता है, जबकि किसी खास राज्य या इलाके से जुड़े मामलों को आम तौर पर पहले संबंधित हाई कोर्ट में ले जाना चाहिए।

(समाचार एजेंसी एएनआइ के इनपुट के साथ)

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