Bihar CAG Report : 62 हजार करोड़ का हिसाब नहीं, कागजों पर बने पुल! CAG रिपोर्ट ने बिहार सरकार के खर्च की खोली परतें

Published on 24 जुल॰ 2026

Bihar CAG Report : बिहार विधानसभा के मानसून सत्र में पेश हुई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट ने राज्य के वित्तीय प्रबंधन पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार करीब 62,632 करोड़ रुपये के खर्च का उपयोगिता प्रमाण पत्र (UC) प्रस्तुत नहीं कर सकी है। इतना ही नहीं, अररिया और पूर्वी चंपारण में कागजों पर पुल बनने और करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद लोगों को उसका कोई लाभ नहीं मिलने जैसी चौंकाने वाली बातें भी सामने आई हैं।

वित्त मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने विधानसभा में रिपोर्ट पेश की। इसमें वर्ष 2024-25 के बजट खर्च, विकास योजनाओं की प्रगति और सरकारी वित्तीय अनुशासन को लेकर कई गंभीर टिप्पणियां दर्ज की गई हैं। रिपोर्ट से यह संकेत मिलता है कि योजनाओं पर खर्च तो दिखाया गया, लेकिन कई मामलों में उसके उपयोग का प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

62 हजार करोड़ रुपये के खर्च का नहीं मिला हिसाब

कैग रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक राज्य सरकार द्वारा किए गए 62,632 करोड़ रुपये के खर्च के उपयोगिता प्रमाण पत्र संबंधित विभागों से प्राप्त नहीं हुए। रिपोर्ट में बताया गया कि कुल 92,131 करोड़ रुपये के उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित थे, जिनमें से 2024-25 में ही 39,228.57 करोड़ रुपये के नए लंबित मामले जुड़े। इसका अर्थ यह है कि सरकार यह प्रमाणित नहीं कर पाई कि संबंधित राशि वास्तव में निर्धारित परियोजनाओं और योजनाओं पर ही खर्च की गई। ऐसे में वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

आखिर क्या होता है उपयोगिता प्रमाण पत्र (UC)?

जब सरकार किसी विभाग, एजेंसी या संस्था को किसी योजना या निर्माण कार्य के लिए धन उपलब्ध कराती है, तब उस संस्था को निर्धारित समय के भीतर यह प्रमाण देना होता है कि मिली हुई राशि उसी उद्देश्य के लिए खर्च की गई। इसी दस्तावेज को उपयोगिता प्रमाण पत्र (Utilization Certificate - UC) कहा जाता है। नियमों के अनुसार, राशि प्राप्त होने के 18 महीने के भीतर उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा करना अनिवार्य होता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो यह माना जाता है कि खर्च का पूरा सत्यापन नहीं हुआ और वित्तीय अनियमितताओं की आशंका बनी रहती है।

कागजों पर बने दो पुल, जनता को नहीं मिला फायदा

रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला खुलासा अररिया और पूर्वी चंपारण से जुड़ा है। यहां दो पुलों के निर्माण पर लगभग 3.30 करोड़ रुपये खर्च दिखाए गए, लेकिन वास्तविकता में इन परियोजनाओं का लाभ लोगों तक नहीं पहुंचा। कैग ने अपनी जांच में पाया कि परियोजनाओं के निष्पादन में गंभीर खामियां रहीं। सरकारी रिकॉर्ड में काम पूरा दिखाया गया, जबकि जमीन पर अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। इससे सरकारी योजनाओं की निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण पर भी सवाल उठ रहे हैं।

3.64 लाख करोड़ का बजट, लेकिन 21 फीसदी राशि खर्च ही नहीं हुई

रिपोर्ट के अनुसार, बिहार सरकार ने वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए 3.64 लाख करोड़ रुपये का बजट पेश किया था। लेकिन वित्तीय वर्ष समाप्त होने तक सरकार इस बजट का करीब 21 प्रतिशत हिस्सा खर्च ही नहीं कर सकी।यानी जिन योजनाओं और विकास कार्यों के लिए बजट का प्रावधान किया गया था, उनमें बड़ी राशि खर्च होने से पहले ही वित्तीय वर्ष समाप्त हो गया। इससे यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या विभाग समय पर योजनाओं को लागू करने में सफल रहे या फिर प्रशासनिक स्तर पर देरी हुई।

वित्तीय प्रबंधन पर उठे गंभीर सवाल

कैग की रिपोर्ट केवल खर्च का हिसाब मांगने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य के वित्तीय प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा नहीं किए जाते, तो भविष्य की योजनाओं के लिए फंड जारी करने में भी दिक्कत आ सकती है। साथ ही, इससे यह सुनिश्चित करना भी मुश्किल हो जाता है कि सरकारी धन का उपयोग तय उद्देश्य के लिए हुआ या नहीं। ऐसे मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों प्रभावित होती हैं।

विधानसभा में रिपोर्ट के बाद बढ़ी राजनीतिक हलचल

मानसून सत्र के दौरान रिपोर्ट पेश होने के बाद राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा तेज हो गई। विपक्ष ने रिपोर्ट के आधार पर सरकार की कार्यशैली और वित्तीय अनुशासन पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। वहीं सरकार की ओर से रिपोर्ट का अध्ययन कर आवश्यक कार्रवाई और सुधारात्मक कदम उठाने की बात कही जा रही है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह रिपोर्ट?

कैग की रिपोर्ट किसी भी सरकार के वित्तीय प्रदर्शन का स्वतंत्र आकलन मानी जाती है। इसमें सामने आने वाली टिप्पणियां यह बताती हैं कि सरकारी योजनाओं पर खर्च कितना प्रभावी रहा और वित्तीय नियमों का पालन किस स्तर तक हुआ। बिहार की इस रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े आने वाले दिनों में विधानसभा से लेकर राजनीतिक मंचों तक चर्चा का प्रमुख विषय बन सकते हैं। सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती लंबित उपयोगिता प्रमाण पत्रों का निपटारा करने, बजट खर्च की गुणवत्ता सुधारने और यह सुनिश्चित करने की होगी कि जनता के लिए स्वीकृत योजनाओं का लाभ वास्तव में जमीन पर दिखाई दे।