भोपाल में भगवान गणेश की आराधना की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। उदयगिरि की करीब 1600 साल पुरानी गणेश प्रतिमा, भदभदा का प्राचीन मंदिर और सीहोर का चिंतामणि गणेश मंदिर इस विरासत से जुड़े हैं। भोपाल में सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत 18 सितंबर 1947 को हुई थी।
गणेश भक्ति की परंपरा, ‘भोपाल के राजा’ से लेकर उदयगिरि तक
- Published: 14 Sep 2026, 09:05 AM IST
- Last Updated: 14 Sep 2026, 09:05 AM IST
भोपाल: झीलों की नगरी भोपाल में भगवान गणेश की आराधना की परंपरा सिर्फ आधुनिक गणेश उत्सव तक सीमित नहीं है। शहर और उसके आसपास भगवान गणेश से जुड़े प्राचीन मंदिरों और शैल प्रतिमाओं का इतिहास सदियों पुराना है। खास बात यह है कि भोपाल में गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन दूसरे शहरों से अलग डोल ग्यारस और अनंत चतुर्दशी, दोनों दिन किया जाता है।
उदयगिरि में 1600 साल पुरानी गणेश प्रतिमा
भोपाल से करीब 57 किलोमीटर दूर विदिशा की उदयगिरि पहाड़ियों की गुफा नंबर-6 में भगवान गणेश की प्राचीन प्रतिमा मौजूद है। इसे मध्यप्रदेश ही नहीं, बल्कि भारत की सबसे पुरानी दिनांकित गणेश प्रतिमाओं में गिना जाता है। गुप्तकाल में चट्टान को काटकर बनाई गई इस प्रतिमा से जुड़ा शिलालेख 401 ईस्वी का है, जो राजा चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल का माना जाता है।
सीहोर के चिंतामणि गणेश मंदिर को भी भोपाल के आसपास की धार्मिक विरासत का हिस्सा माना जाता है। मान्यता है कि यहां की प्रतिमा स्वयं प्रकट हुई थी और राजा विक्रमादित्य ने मंदिर का निर्माण कराया था। प्रतिमा का एक हिस्सा आज भी जमीन में दबा हुआ है।
भदभदा गणेश मंदिर की अलग पहचान
भोपाल के भदभदा क्षेत्र में अपर लेक के पास स्थित प्राचीन गणेश मंदिर भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। स्थानीय मान्यता इसे परमार काल से जोड़ती है, हालांकि इसके इतिहास के पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। मंदिर के गर्भगृह में प्राकृतिक चट्टान से जुड़ी शैल संरचना है।
स्थानीय लोग भगवान गणेश को विघ्नहर्ता के साथ भोपाल की झीलों के रक्षक के रूप में भी पूजते हैं। मान्यता है कि अपर लेक के पास गणेशजी की मौजूदगी शहर को प्राकृतिक आपदाओं से बचाती है।
1947 में शुरू हुआ सार्वजनिक गणेश उत्सव
भोपाल में गणेश उत्सव का सार्वजनिक रूप 18 सितंबर 1947 को सामने आया। पुराने शहर के चौक बाजार स्थित पीपल चौक पर पहली सार्वजनिक गणेश पूजा आयोजित की गई। इससे पहले गणेश चतुर्थी मुख्य रूप से घरों और निजी स्तर पर मनाई जाती थी। लोकमान्य तिलक से प्रेरित स्थानीय व्यापारियों ने सार्वजनिक उत्सव की शुरुआत की। स्वतंत्रता सेनानी मोहनलाल सिंघल और पुराने चौक बाजार के कुछ व्यापारियों ने सार्वजनिक आयोजन को आगे बढ़ाया। इसी दौरान ‘भोपाल के राजा’ की परंपरा ने भी पहचान बनाई।
आज भोपाल के राजा की झांकी शहर के प्रमुख गणेश पंडालों में शामिल है। गणेश उत्सव के दौरान प्रतिमा को 100 किलो से ज्यादा चांदी के आभूषणों से सजाया जाता है।
डोल ग्यारस और अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन
भोपाल की गणेश उत्सव परंपरा की सबसे खास बात दो बार होने वाला विसर्जन है। डोल ग्यारस और अनंत चतुर्दशी पर गणेश प्रतिमाओं के साथ जुलूस निकलते हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपर लेक के किनारे पहुंचते हैं और विसर्जन में शामिल होते हैं।
इस तरह भोपाल का आधुनिक गणेश उत्सव आज भी शहर की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा हुआ है।