
यमुना की सफाई पर 8,941 करोड़ खर्च करेगी दिल्ली सरकारImage Credit source: PTI/ANI
दिल्ली में यमुना का प्रदूषण और सफाई एक बार फिर से राजनीति के केंद्र में है. आगामी सर्दियों और छठ पर्व को लेकर विपक्ष ने अभी से यमुना में उठ रहे झाग को दिखाते हुए सरकार को घेरना शुरू कर दिया है. वहीं, दिल्ली और केंद्र सरकार दोनों ने इसे अपने बड़े एजेंडे में शामिल कर 2029 तक यमुना को निर्मल करने की ताल ठोक दी है. इस बीच गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 8,941.22 करोड़ रुपये की लागत वाली 43 जल और सीवरेज परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया.
दिल्ली सरकार ने इसे यमुना के पुनरुद्धार की दिशा में बड़ा कदम बताते हुए दावा किया कि सीवेज को पूरी तरह उपचारित करने, नालों को टैप करने और हर घर को सीवर नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में तेजी से काम किया जा रहा है.
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भरोसा दिलाया कि बिना उपचारित गंदा पानी यमुना में नहीं जाने दिया जाएगा, लेकिन यमुना की सफाई का असली पैमाना परियोजनाओं की लागत, घोषणाओं या शिलान्यासों की संख्या नहीं, बल्कि नदी के पानी की गुणवत्ता में होने वाला सुधार है. सवाल यह है कि हजारों करोड़ रुपये खर्च करने की तैयारी के बीच दिल्ली के नालों से यमुना में पहुंचने वाले प्रदूषण पर कितना प्रभावी नियंत्रण हुआ है और नदी को साफ बनाने के दावे जमीन पर कितने उतरे हैं?
8,941 करोड़ रुपये की परियोजनाएं
दिल्ली सरकार के मुताबिक, कुल 43 परियोजनाओं में 10 का उद्घाटन किया गया है, जबकि 33 परियोजनाओं का शिलान्यास हुआ है. इनका उद्देश्य सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की क्षमता और कार्यक्षमता बढ़ाना, नए विकेंद्रीकृत एसटीपी स्थापित करना, सीवर नेटवर्क का विस्तार करना, जल शोधन संयंत्रों को विकसित करना और ड्रेनेज व्यवस्था को बेहतर बनाना है.
इन परियोजनाओं से उम्मीद है कि सीवेज को नालों में बहने से पहले व्यवस्थित तरीके से एकत्र किया जा सकेगा और उपचार के बाद ही उसे बाहर छोड़ा जाएगा. हालांकि, उद्घाटन की गई परियोजनाओं और अभी निर्माण की प्रक्रिया में जाने वाली परियोजनाओं के परिणाम अलग-अलग समय पर सामने आएंगे. इसलिए पूरे 8,941 करोड़ रुपये के निवेश को तत्काल यमुना की सफाई का परिणाम मानना सही नहीं होगा.
सरकार ने डेढ़ साल में क्या काम करने का दावा किया?
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अपने करीब डेढ़ साल के कार्यकाल के दौरान सीवरेज व्यवस्था में सुधार के लिए कई कदमों का उल्लेख किया है.
- 29 विकेंद्रीकृत एसटीपी: सरकार के अनुसार, करीब 3,000 करोड़ रुपये की लागत से इनकी परियोजनाओं के कार्य आवंटित किए गए हैं. इनकी प्रस्तावित कुल क्षमता 170 एमजीडी यानी प्रतिदिन 17 करोड़ गैलन सीवेज के उपचार की है.
- पुराने एसटीपी का सुधार: लगभग 2,000 करोड़ रुपये की लागत से पुराने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के आधुनिकीकरण का काम किए जाने की बात कही गई है.
- 54 अनधिकृत कॉलोनियां: सरकार के अनुसार, इन कॉलोनियों में करीब 1.28 लाख लोगों के घरों को सीवर कनेक्शन उपलब्ध कराने का काम किया गया है.
- 276 कॉलोनियों में सीवर नेटवर्क: इन क्षेत्रों में सीवर लाइन बिछाने का काम आगे बढ़ाने का दावा है.
- 93 किलोमीटर ट्रंक सीवर लाइन: सरकार के मुताबिक, एक साल में इतनी लंबाई की मुख्य सीवर लाइनों से गाद निकालने और सफाई का काम पूरा किया गया है.
ये आंकड़े सीवरेज ढांचे को सुधारने की दिशा में किए गए प्रयासों का संकेत देते हैं, लेकिन इनका वास्तविक पर्यावरणीय असर जानने के लिए यह देखना जरूरी है कि कितने नए कनेक्शन चालू हुए, कितनी सीवेज वास्तव में एसटीपी तक पहुंच रही है, प्लांट अपनी निर्धारित क्षमता के मुकाबले कितना पानी उपचारित कर रहे हैं और उपचार के बाद पानी तय मानकों पर खरा उतर रहा है या नहीं.
नालों का गंदा पानी सबसे बड़ी चुनौती
दिल्ली में यमुना के प्रदूषण की समस्या केवल नदी की सतह पर दिखाई देने वाले झाग या कचरे तक सीमित नहीं है. घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, नालों से आने वाला प्रदूषण और सीवेज के अपर्याप्त उपचार जैसी समस्याएं नदी की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं.
सीवर लाइन बिछा देना अपने आप में पर्याप्त नहीं है. सीवर का एसटीपी से जुड़ना, प्लांट का नियमित रूप से चलना, पर्याप्त क्षमता होना और उपचारित पानी की गुणवत्ता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है. अगर सीवेज का कुछ हिस्सा बिना उपचार के नालों के जरिए नदी तक पहुंचता रहता है, तो नए बुनियादी ढांचे के बावजूद प्रदूषण की समस्या बनी रह सकती है.
170 एमजीडी क्षमता का दावा, लेकिन वास्तविक उपचार कितना?
29 विकेंद्रीकृत एसटीपी की प्रस्तावित 170 एमजीडी क्षमता सरकार की योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है. हालांकि, प्रस्तावित क्षमता और वास्तविक सीवेज उपचार में अंतर होता है. परियोजनाओं का निर्माण पूरा होने, उन्हें चालू किए जाने और उनकी नियमित कार्यक्षमता सुनिश्चित होने के बाद ही इस क्षमता का पूरा लाभ मिल सकता है.
इसी तरह, पुराने एसटीपी के आधुनिकीकरण पर करीब 2,000 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना का असर भी उनके प्रदर्शन से तय होगा. यह जानना जरूरी है कि मौजूदा प्लांट कितनी मात्रा में सीवेज प्राप्त कर रहे हैं, कितना उपचारित कर रहे हैं, कितने समय तक बंद रहते हैं और उनके आउटलेट से निकलने वाला पानी निर्धारित पर्यावरणीय मानकों को पूरा करता है या नहीं. सरकार के सामने चुनौती सिर्फ नई परियोजनाएं शुरू करने की नहीं, बल्कि मौजूदा और नए संयंत्रों को प्रभावी ढंग से चलाने की भी है.
ये भी पढ़ें: दिल्ली सरकार की नई पहल, इन इलाकों में तैनात की 14 CATS एंबुलेंस; अब मरीजों को तुरंत मिलेगी मेडिकल मदद

जीतेन्द्र भाटी
करीब डेढ़ दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पॉलिटिक्स, क्राइम, सामाजिक और मानवीय मुद्दों पर रिपोर्टिंग. BAG Films की नर्सरी से IBN7, आज़ाद न्यूज़, प्रज्ञा TV, 4 रियल न्यूज, Focus News और न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया होते हुए देश के सबसे बड़े न्यूज नेटवर्क TV9 भारतवर्ष में खबरों के बीच सफर जारी.
Read More