भोपाल43 मिनट पहले
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बड़ा बाग कब्रिस्तान के नीचे से मेट्रो टनल निकालने के विवाद के बीच जमीन के मालिकाना हक का अहम तथ्य सामने आया है। मेट्रो जिस जमीन से गुजरेगी, वह खसरा नंबर 208 के अलग-अलग हिस्सों में है और राजस्व रिकॉर्ड में सरकारी दर्ज है। प्रशासन ने पुराने दस्तावेज खंगाले तो 1959 से 2026-27 के मौजूदा भू-अभिलेख तक जमीन शासकीय ही मिली। इसी आधार पर इसे मेट्रो को सौंपा जा चुका है।
मेट्रो की अंडरग्राउंड लाइन कब्रिस्तान के नीचे से प्रस्तावित है। काम शुरू होने पर वक्फ बोर्ड ने कब्रों की सुरक्षा को लेकर आपत्ति जताई और मामला वक्फ ट्रिब्यूनल पहुंचा। काम रुका, बाद में मंजूरी मिलने पर दोबारा शुरू हुआ। इस विवाद से मेट्रो का काम 6 महीने पिछड़ चुका है।
दो दिन पहले मेट्रो ने बैरिकेडिंग कर फिर काम की तैयारी शुरू की। सोमवार देर रात मशीनें और कंटेनर पहुंचे तो विरोध हुआ। विधायक आतिफ अकील ने काम रुकवा दिया। तहसीलदार हर्ष विक्रम सिंह- जमीन शुरू से सरकारी है। आदेश जारी कर मेट्रो को जमीन सौंप दी गई है।
3 दस्तावेज, तीनों में सरकारी
- 1959 का राजस्व रिकॉर्ड: खसरा 208/1 शासकीय दर्ज; रकबा 12.088 हेक्टेयर यानी 29.87 एकड़।
- 2026-27 का भू-अभिलेख: खसरा 208/1 शासकीय दर्ज।
- मेट्रो का भूमि रिकॉर्ड: भूमि प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज में भी खसरा 208/1 सरकारी दर्ज।
इस विवाद से 6 महीने पिछड़ा प्रोजेक्ट
फिर वक्फ के रिकॉर्ड में कैसे? 1958 में मिला था प्रबंधन
जमीन सरकारी है तो सवाल है कि बड़ा बाग कब्रिस्तान वक्फ के रिकॉर्ड में कैसे दर्ज है? वक्फ बोर्ड के चेयरमैन सनवर पटेल के मुताबिक, 1958 में सरकार ने सिर्फ कब्रिस्तान के प्रबंधन की जिम्मेदारी वक्फ को सौंपी थी, मालिकाना हक नहीं।
इसके अगले साल 1959 के राजस्व रिकॉर्ड में जमीन शासकीय दर्ज है और 2026-27 के भू-अभिलेख में भी यही स्थिति है। यानी जमीन सरकार की, प्रबंधन वक्फ के पास है। जमीन के मालिकाना हक से जुड़ा मामला हाई कोर्ट में विचाराधीन है। प्रशासन अब 1959 और मौजूदा राजस्व रिकॉर्ड अदालत में पेश करेगा।
टनल 60 फीट नीचे, कब्रें 3 से 5 फीट गहरी
मेट्रो टनल कब्रिस्तान के नीचे करीब 60 फीट की गहराई से निकलेगी, जबकि कब्रें आमतौर पर 3 से 5 फीट गहरी होती हैं। बड़ा बाग शाही कब्रिस्तान है, इसलिए नवाब परिवार के किस सदस्य की कब्र कहां है, इसका रिकॉर्ड भी उपलब्ध है।
इसके बावजूद विवाद की मुख्य वजह कब्रों की सुरक्षा ही है। वक्फ बोर्ड का कहना है कि मेट्रो निर्माण के दौरान कब्रों को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। ऐसा सुनिश्चित होने पर वह विकास कार्य में सहयोग करेगा।
आज फिर प्रेजेंटेशन, अब मशीनों की अड़चन
मेट्रो ने बुधवार को जनप्रतिनिधियों के सामने फिर योजना रखी, पर सहमति नहीं बनी। जनप्रतिनिधियों की मांग है कि टनल मशीन कब्रिस्तान से आगे ले जाकर निकाली जाए, मेट्रो इसे तकनीकी रूप से संभव नहीं मान रहा। यानी मालिकाना रिकॉर्ड के बाद अब विवाद कब्रों की सुरक्षा व टनल मशीन निकालने की जगह पर आ गया है।
वक्फ बोर्ड
जमीन पर मालिकाना दावा नहीं है। 1958 में कब्रिस्तान का प्रबंधन मिला था। कब्रों को नुकसान नहीं पहुंचे तो विकास कार्य में सहयोग करेंगे। -सनवर पटेल, चेयरमैन
विधायक
अल्पसंख्यक मंत्रालय के उम्मीद पोर्टल को देख लीजिए। उसमें यह जमीन वक्फ के नाम दर्ज है। यह आस्था का मामला है। कब्रों को नुकसान न पहुंचे।' -आतिफ अकील, विधायक
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