विदेशी निवेश पर नियम बदलेने की तैयारी में सरकार,5,000 करोड़ की लिमिट बढ़ाकर 15,000 करोड़ करने का प्रस्ताव

Published on 18 अग॰ 2026

विदेशी निवेश पर नियम बदलेने की तैयारी में सरकार,  5,000 करोड़ की लिमिट बढ़ाकर 15,000 करोड़ करने का प्रस्ताव

विदेशी निवेश के नियम होंगे आसान

15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 तक ‘विकसित भारत’ का जो खाका खींचा था, उस पर सरकार ने तेजी से काम शुरू कर दिया है. देश की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार देने के लिए केंद्र सरकार विदेशी निवेश (FDI) के नियमों में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है. सूत्रों के मुताबिक, विदेशी पूंजी को भारत की ओर आकर्षित करने के लिए बहुत जल्द कैबिनेट दो अहम प्रस्तावों पर मुहर लगा सकती है. पहला बड़ा बदलाव ये है कि कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स (CCEA) के पास जाने वाले एफडीआई प्रपोजल की सीमा 5,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 15,000 करोड़ रुपये की जा सकती है. इसके अलावा, डाउनस्ट्रीम कंपनियों में विदेशी निवेश के नियमों को भी आसान बनाने पर विचार चल रहा है.

15 हजार करोड़ के विदेशी निवेश को डायरेक्ट मंजूरी

भारत में अभी तक का नियम यह है कि अगर कोई विदेशी कंपनी 5,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश करना चाहती है, तो उस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी के लिए सीधे आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) के पास भेजना पड़ता है. यह व्यवस्था नवंबर 2015 से लागू है. 5,000 करोड़ रुपये से कम के निवेश प्रस्ताव संबंधित मंत्रालय खुद ही पास कर देते हैं. अब सरकार के नए प्रस्ताव के तहत इस सीमा को सीधा तीन गुना बढ़ाकर 15,000 करोड़ रुपये किया जा जा सकता है. इसका मतलब ये है कि अब 15 हजार करोड़ रुपये तक के बड़े विदेशी निवेश प्रस्तावों को CCEA के पास भेजने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी. संबंधित मंत्रालय अपने स्तर पर ही इन फाइलों को क्लियर कर सकेंगे. इससे सरकारी प्रक्रियाओं में लगने वाला समय काफी हद तक बचेगा और बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम जल्द शुरू हो सकेगा.

डाउनस्ट्रीम निवेश के नियमों में मिलेगी बड़ी राहत

सरकार सिर्फ निवेश की रकम की सीमा ही नहीं बढ़ा रही है, बल्कि उस कानूनी रास्ते को भी आसान बना रही है जिससे विदेशी पैसा भारतीय बाजार तक पहुंचता है. इसके लिए ‘डाउनस्ट्रीम निवेश’ यानी अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियमों में बड़ी ढील दी जा सकती है. नए ड्राफ्ट के मुताबिक, अगर मालिकाना हक वाली चेन (ओनरशिप चेन) में ऊपर मौजूद किसी घरेलू कंपनी ने पहले ही सरकार से विदेशी निवेश की जरूरी मंजूरी ले ली है, तो उसके नीचे काम करने वाली भारतीय कंपनी को दोबारा सरकारी इजाजत नहीं लेनी पड़ेगी. वर्तमान में दो खास स्थितियों में इस तरह की पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य होता है. पहला, जब निवेश ऐसे सेक्टर में हो जहां सरकार की अनुमति लेना जरूरी हो. दूसरा, जब पैसा भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों की कंपनियों से आ रहा हो. नए नियमों से एक ही निवेश के लिए बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने की जरूरत खत्म हो जाएगी.

देश की अर्थव्यवस्था को मिलेगा नया बूस्ट

बीते सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार काफी बड़ा हुआ है और इसके साथ ही निवेश की रकम भी कई गुना बढ़ चुकी है. ऐसे में दशक भर पुराने नियम कई बार विकास की रफ्तार धीमी कर देते हैं. बार-बार मंजूरी लेने की लंबी प्रक्रिया से विदेशी कंपनियों का उत्साह भी कम होता है.खबरों की माने तो वित्त मंत्रालय, उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) और नीति आयोग के बीच इस मसले पर शुरुआती बातचीत पूरी हो चुकी है. अब बस कैबिनेट की हरी झंडी का इंतजार है. अगर यह प्रस्ताव पास होता है, तो देश में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ यानी व्यापार करना काफी आसान हो जाएगा.

विभव शुक्ला

विभव शुक्ला

विभव शुक्ला वर्तमान में TV9 हिंदी में सीनियर सब-एडिटर के तौर पर बिजनेस डेस्क पर कार्यरत हैं. पत्रकारिता में उन्हें छह वर्षों का अनुभव है. विभव मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के रहने वाले हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की थी. इसके बाद वह Inshorts और गुजरात फर्स्ट जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े रहे हैं.

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