प्रोजेक्ट ने पकड़ी रफ्तार: सेतु को तोड़ रही थी अमले की सुस्ती, सीएस की सख्ती से सुधरा सिस्टम, 486 गंभीर मरीजों को मिला तुरंत इलाज - Udaipur News

Published on 10 सित॰ 2026

मरीजों को दलालों व निजी अस्पतालों के चंगुल से बचाने और आपात स्थिति में त्वरित चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने के उद्देश्य से आरएनटी मेडिकल कॉलेज से शुरू हुआ महत्वाकांक्षी रैपिड रेफरल रिड्रेसल सिस्टम (सेतु) प्रोजेक्ट आखिरकार रफ्तार पकड़ने लगा है। जून 202

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  • आरएनटी पहुंचने से पहले ही अलर्ट होने लगे डॉक्टर, तैयार मिलने लगे बेड

भास्कर ने इस गंभीर ढिलाई को उजागर किया तो राज्य सरकार ने मामले को गंभीरता से लिया। मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास और स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों ने जिला स्वास्थ्य अधिकारियों को कड़े निर्देश जारी किए। इसके बाद जिलों का चिकित्सा तंत्र सक्रिय हुआ और गत 1 अगस्त से अब तक इस सिस्टम के जरिए रिकॉर्ड 486 गंभीर मरीजों को आरएनटी अस्पताल रेफर कर उनकी जान बचाई जा चुकी है।

एडवांस तैयारी से बच रही जिंदगियां, दलालों के नेटवर्क पर चोट

सेतु प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत इसका डिजिटल अलर्ट मैकेनिज्म है। इसके तहत किसी पीएचसी या सीएचसी से मरीज को रेफर करते समय डॉक्टर या पैरामेडिकल स्टाफ को एक क्यूआर कोड स्कैन कर ऑनलाइन फॉर्म भरना होता है। इसमें मरीज का नाम, उम्र, बीमारी की प्रकृति और संभावित विभाग दर्ज किया जाता है।

फॉर्म सबमिट होते ही इसकी सूचना तुरंत आरएनटी के सेंट्रल कंट्रोल रूम और संबंधित विभाग के विभागाध्यक्ष तक पहुंच जाती है। इसका सीधा फायदा यह हो रहा है कि मरीज के एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचने से पहले ही वेंटिलेटर, बेड, आईसीयू और स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की टीम तैयार मिलती है। इससे गोल्डन आवर में मरीज को बिना वक्त गंवाए इलाज मिल पा रहा है और रास्ते में मरीज भटकाने वाले दलालों का नेटवर्क भी ध्वस्त हो रहा है।

राजसमंद आगे, लेकिन चित्तौड़गढ़ और डूंगरपुर में अब भी सुस्ती: मुख्य सचिव के निर्देशों के बाद जिलों की भागीदारी में उछाल जरूर आया है, लेकिन जिलों के प्रदर्शन में अब भी भारी विषमता है। आंकड़ों के मुताबिक, राजसमंद जिला 216 मरीजों को सेतु के जरिए रेफर कर सबसे आगे रहा है। वहीं उदयपुर से 169 और बांसवाड़ा से 82 मरीजों को सही समय पर रेफर किया गया। इसके विपरीत चित्तौड़गढ़ से महज 4, डूंगरपुर से 7 और सलूंबर से सिर्फ 7 मरीज ही सेतु के जरिए भेजे गए हैं। यह साफ दर्शाता है कि इन जिलों में स्थानीय स्टाफ अब भी पुराने ढर्रे पर चल रहा है और डिजिटल एंट्री से बचने की कोशिश कर रहा है।