रांची9 मिनट पहले
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झारखंड में 16 अक्टूबर से बालू खनन पर लगी एनजीटी की रोक हट जाएगी। इसके बावजूद बालू सस्ता होने की उम्मीद नहीं है। चार महीने रोक के दौरान सिर्फ पलामू के पांच घाटों का टेंडर हो पाया। लेकिन अभी यहां से बालू का खनन नहीं होगा।
राज्य के बी कैटेगरी के कुल 444 घाटों में से अब तक सिर्फ 294 घाटों की नीलामी हो सकी है। लेकिन नीलामी के बाद भी अधिकतर घाटों से बालू खनन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है। सभी जिलों में पर्यावरण स्वीकृति (ईसी) और कंसेंट टू ऑपरेट (सीटीओ) की प्रक्रिया पूरी न होने से नीलाम हो चुके घाट अब भी बंद हैं।
अभी सिर्फ छह जिलों के 14 घाटों को ही पर्यावरण स्वीकृति सहित अन्य एनओसी मिला है। ऐसे में महज 14 घाटों से ही बालू का उठाव होगा। इस स्थिति के लिए खान विभाग के अफसरों ने जिले के अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया है। वहीं रांची के खनन पदाधिकारी ने कहा कि बालू के ठेका लेने वाले ठेकेदार को ही एनओसी लेना है। एनओसी न लेने के लिए ठेकेदार ही जिम्मेदार हैं। उधर, एनजीटी की रोक हटने का इंतजार कर रहे लोगों को कोई फायदा नहीं मिलने वाला है।
जानिए...जिलों में बालू घाटों का हाल और कितने में मिल रहा बालू रांची : जिले में 19 घाट हैं। सभी का टेंडर हो चुका है, लेकिन सिर्फ तीन घाटों को ही खनन के लिए एनओसी मिला है। सिल्ली के श्याम नगर, सुंडिल और चोकेसेरेंग घाट को पर्यावरण स्वीकृति, ग्राम सभा की अनुमति और सीटीओ मिल गया है। लेकिन श्यामनगर घाट से खनन की संभावना कम है। ऐसे में यहां अवैध 100 सीएफटी बालू 4500 रुपए में मिल रहा है। पूर्वी सिंहभूम : जिले में पांच घाट हैं। गुड़ाबांदा के कोरिया मोहनपाल-1 और कोरिया मोहनपाल-2, बहरागोड़ा के बनकाटा घाट का टेंडर हो गया है। खनन की अनुमति भी मिल गई है। लेकिन दो घाटों से ही खनन होगा। यहां 100 सीएफटी बालू के लिए छह से सात हजार रुपए देने पड़ रहे हैं। धनबाद : कैटेगरी बी के 10 घाट है। सभी का पिछले साल ही टेंडर हो गया है। लेकिन किसी को पर्यावरण स्वीकृति, ग्राम सभा की सहमति और अन्य एनओसी नहीं मिला है। यहां किसी घाट से उठाव नहीं होगा। यहां 100 सीएफटी अवैध बालू 6500-7000 रुपए में मिल रहा है। हजारीबाग : कुल 11 घाट हैं। सभी का टेंडर हो गया है। बड़कागांव स्थित सनराह व सोनपुरा और ल ंगाटू-सिकरी-पंडरिया-सिरमा घाट 16 अक्टूबर से शुरू हो जाएगा। शेष नौ घाटों को एनओसी नहीं मिला है। गिरिडीह : कुल 42 घाटों में से किसी का टेंडर नहीं हुआ है। यहां 100 सीएफटी बालू 2000-3000 रुपए में मिल रहा है। रोक हटने के बाद भी यहां अवैध ढंग से ही बालू बिकेगा।
झारखंड में 10 साल बाद टेंडर, पर अफसरों ने नहीं दिखाई दिलचस्पी झारखंड में बालू घाटों का टेंडर 10 साल बाद हुआ है। बालू से काली कमाई का खेल इतना बड़ा है कि इसके लिए लगातार नियम बदलते रहे हैं। अंतत: सरकार ने बालू घाटों का ठेका निजी हाथों में देने का निर्णय लिया। पिछले वर्ष सभी जिलों में टेंडर किया गया। इसके बदले प्रशासन को करोड़ों रुपए राजस्व मिला। लेकिन जब बालू उत्खनन का समय आया तो प्रशासन ने जरूरी एनओसी दिलाने में अपनी भूमिका से इनकार कर दिया। ऐसे में फिर झारखंड के बालू की कीमत नेता,अफसर और माफिया तय करेंगे।
बिहार का बालू मंगाना मजबूरी होगी, इसके लिए चुकाने होंगे अधिक पैसे झारखंड के घाटों से खनन नहीं होने से एक बार फिर लोगों को बिहार के बालू पर निर्भर रहना होगा। क्योंकि, पिछली बार भी बिहार के गया, औरंगाबाद से ही बालू मंगाया गया था। बोड़ेया के बालू व्यापारी मंटू साहू ने बताया कि झारखंड में बालू घाटों का एनओसी मिलना काफी मुश्किल है। नेता-अफसर चाहते ही नहीं कि आम लोगों को सस्ता बालू मिले। इस वजह से ही एनओसी नहीं मिलता। जबकि, बिहार से आसानी से चालान पर बालू आता है। इसके लिए अधिक कीमत चुकानी होगी।
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