ISRO: 1975 में इसरो ने पहला सैटेलाइट आर्यभट्ट लॉन्च करके इतिहास रचा था. इसे सोवियत संघ की मदद से लॉन्च किया गया था. 360 किलो के इस सैटेलाइट का काम कम्युनिकेशन सिस्टम को बेहतर बनाना कतई नहीं था.
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भारत की स्पेस एजेंसी इसरो (ISRO) ने अंतरिक्ष की दुनिया में कई इतिहास रचे हैं. चांद और मंगल के लिए कई मिशन लॉन्च किए हैं, लेकिन इन सफर की शुरुआत काफी संघर्षपूर्ण रही है. भारत का पहला सैटेलाइट आर्यभट्ट था, जिसे इसरो ने 19 अप्रैल 1975 को अंतरिक्ष में भेजा. दिलचस्प बात यह है कि इसे भारत ने खुद के रॉकेट से नहीं, बल्कि सोवियत संघ (USSR) की मदद से लॉन्च किया था.
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नाम आर्यभट्ट ही क्यों… इस सैटेलाइट का नाम प्राचीन भारत के महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट के नाम पर रखा गया, जिन्होंने पांचवीं शताब्दी में ही पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने और शून्य (जीरो) की अवधारणा जैसे सिद्धांत दिए थे. इसरो ने अपने पहले ही सैटेलाइट के जरिए भारत की प्राचीन वैज्ञानिक विरासत को श्रद्धांजलि देने का फैसला किया.
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भारत ने सोवियत मदद क्यों ली… 1970 के दशक में भारत के पास सैटेलाइट बनाने का तकनीकी सामर्थ्य तो विकसित हो रहा था, लेकिन उसे अंतरिक्ष तक पहुंचाने के लिए ज़रूरी शक्तिशाली रॉकेट यानी लॉन्च व्हीकल मौजूद नहीं था. उस दौर में भारत और सोवियत संघ के बीच मजबूत कूटनीतिक और वैज्ञानिक संबंध थे, जिसके तहत भारत-सोवियत अंतरिक्ष सहयोग समझौते के अंतर्गत आर्यभट्ट को सोवियत धरती से लॉन्च करने का रास्ता निकाला गया. आर्यभट्ट को सोवियत संघ के कापुस्टिन यार लॉन्च केंद्र से कॉसमॉस-3M रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजा गया. यह भारत के लिए एक ऐतिहासिक पल था. पहली बार भारत का बनाया कोई उपग्रह धरती की कक्षा में स्थापित हुआ था.
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सैटेलाइट का मकसद क्या था… आर्यभट्ट को शुद्ध रूप से एक वैज्ञानिक प्रयोग के तौर पर डिजाइन किया गया था, न कि कम्युनिकेशन या मौसम जैसे व्यावहारिक कामों के लिए. इसका वजन करीब 360 किलोग्राम था और यह गोलाकार आकार का था. जिसकी सतह पर सौर पैनल लगे थे. इसे तीन मुख्य वैज्ञानिक क्षेत्रों में डेटा जुटाने के लिए भेजा गया था. जैसे- अंतरिक्ष से आने वाली एक्स-रे किरणों का अध्ययन, पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल की संरचना को समझना, सूर्य से निकलने वाली विकिरण का अध्ययन करना.
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2 रुपए के नोट पर दिखाया गया… आर्यभट्ट के लॉन्च को भारत में बड़े गर्व के साथ देखा गया. यहां तक कि इसे 2 रुपए के नोट पर भी दिखाया गया था, लेकिन दुर्भाग्य से लॉन्च के महज चार दिन बाद ही सैटेलाइट के पावर सिस्टम में तकनीकी खराबी आ गई, जिसकी वजह से इसके ज्यादातर वैज्ञानिक उपकरण बंद हो गए. इसके बावजूद सैटेलाइट कई सालों तक पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगाता रहा, और आखिरकार 1992 में यह वायुमंडल में प्रवेश कर जल गया.
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