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- Someone Built A Business While Undergoing Dialysis, Another Is Living A Normal Life With An Organ He Received 26 Years Ago.
इंदौर18 मिनट पहलेलेखक: लवीन राव
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एक अंगदान कई परिवारों की जिंदगी बदल देता है। कोई 26 साल पहले मिले अंग के सहारे आज भी सामान्य जीनव जी रहा है तो किसी ने डायलिसिस के बीच पढ़ाई पूरी कर खुद का कारोबार खड़ा किया। इंदौर के चार ऐसे मरीजों की कहानी, जिन्हें अंगदान मिलने के बाद उनकी जिंदगी बदल गई।
2010-25 में 5859 कॉर्निया दान- इंदौर सोसायटी फॉर ऑर्गन डोनेशन के अनुसार इस अवधि में 1627 किडनी, 151 लीवर, 20 हार्ट और 5 फेफड़ों के प्रत्यारोपण दर्ज हैं। 5859 कॉर्निया दान हुए। 1627 किडनी में 1522 जीवित और 105 कैडेवर दाताओं से मिली थीं।
मप्र में 2015-25 में 2358 अंगदान सोटो के अनुसार प्रदेश में 11 साल में 2358 अंगदान हुए। कैडेवर डोनेशन में 141 किडनी, 68 लीवर, 22 हार्ट, 4 फेफड़े व 2 हाथ शामिल हैं। 2024 में 356 और 2025 में 350 अंगदान हुए।
डिप्लोमा, बीटेक और एमबीए किया, कंस्ट्रक्शन कारोबार शुरू किया 27 वर्षीय शिवम कुमार मौर्य को थकान की जांच में किडनी की बीमारी का पता चला। 2014 में प्रत्यारोपण के लिए पंजीयन कराया। 2017 से डायलिसिस शुरू हुआ। करीब दो साल सीएपीडी भी चला, लेकिन लॉकडाउन में संक्रमण के कारण इसे हटाना पड़ा।
प्लेटलेट कम होने से एक बार प्रत्यारोपण टल गया। इसके बावजूद डिप्लोमा, बीटेक और एमबीए किया। दौरान कंस्ट्रक्शन कारोबार भी शुरू किया। ब्रेन डेड दाता की किडनी मिलने के बाद प्रत्यारोपण हुआ। अब सामान्य जीवन जी रहे हैं।
अब डायलिसिस की तारीख नहीं, स्कूल लौटने का इंतजार
सरकारी शिक्षिका स्मिता सिंह की परेशानी 2016 में शुरू हुई। बाद में किडनी टीबी का पता चला। 2019 में डायलिसिस शुरू हुआ। 2 नवंबर को ब्रेन डेड दाता की किडनी उपलब्ध होने की सूचना मिली। रक्त समूह मैच होने के बाद प्रत्यारोपण हुआ। करीब 7 से 7.5 लाख रुपए खर्च हुए। अब डायलिसिस से मुक्त हैं। 31 तारीख से स्कूल लौटने की तैयारी है। कहती हैं, “वह पल ऐसा था जैसे भगवान ने खुद हाथ थाम लिया हो।
जबलपुर से एयर एम्बुलेंस में आया लिवर, फिर लगाया गया
46 वर्षीय अभिजीत दीक्षित का लिवर हेपेटाइटिस-सी से खराब हो गया था। पैरों में सूजन और पेट में पानी भरने से बार-बार अस्पताल जाना पड़ता था। पत्नी लिवर दान करना चाहती थीं, लेकिन जांच के बाद वजन कम करने की सलाह दी गई।
इसी बीच जबलपुर में लिवर उपलब्ध हुआ। एयर एम्बुलेंस से इंदौर लाया गया और ग्रीन कॉरिडोर से अस्पताल पहुंचाया गया। 23 जनवरी 2025 को प्रत्यारोपण हुआ। इसी दाता के दूसरे अंग से भोपाल में हार्ट ट्रांसप्लांट भी हुआ।
1998 में किडनी फेलियर, 2000 में मिला अंग, अब भी स्वस्थ- अशोक मालू
अशोक मालू को 1998 में किडनी फेलियर का पता चला। डोनर नहीं मिलने से डायलिसिस चलता रहा। 24 अप्रैल 2000 की सुबह किडनी उपलब्ध होने का फोन आया। प्रत्यारोपण हुआ। करीब 26 साल बाद भी वे कंस्ट्रक्शन के काम से जुड़े हैं और सामान्य जीवन जी रहे हैं।
अंगदान : भ्रम बनाम तथ्य भ्रम : अंगदान कार्ड भरने से इलाज में लापरवाही होगी। तथ्य : मरीज को बचाना पहली प्राथमिकता; मृत्यु की पुष्टि के बाद ही अंगदान।
भ्रम : अमीरों को पहले अंग मिलते हैं। तथ्य : आवंटन चिकित्सा जरूरत, रक्त समूह और प्रतीक्षा अवधि जैसे मानकों से होता है।
भ्रम : शरीर के सारे अंग निकाल लिए जाते हैं। तथ्य : चिकित्सा जरूरत के अनुसार ही अंग लिए जाते हैं।
भ्रम : दाता-प्राप्तकर्ता की पहचान सामने आ जाती है। तथ्य : पहचान और व्यक्तिगत जानकारी गोपनीय रहती है।
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