132 साल बाद लाइब्रेरी को लौटाई मैगजीन, लगने वाला था 11.5 लाख का फाइन, जानिए क्या हुआ?

Published on 16 सित॰ 2026

132 साल बाद लाइब्रेरी को लौटाई मैगजीन, लगने वाला था 11.5 लाख का फाइन, जानिए क्या हुआ?

132 साल बाद वापस आई किताब Image Credit source: Facebook/Concord Public Library

अमेरिका के न्यू हैम्पशायर की एक लाइब्रेरी में 19वीं सदी की एक मैगजीन आखिरकार 132 साल की देरी के बाद वापस पहुंच गई. यह कोई आम किताब या मैगजीन नहीं थी. सितंबर 1894 में प्रकाशित द सेंचुरी इलस्ट्रेटेड मंथली मैगजीन का ये एडिशन दशकों तक एक शख्स के घर में पड़ा रहा और किसी को भी ठीक से पता नहीं था कि वह वहां पहुंची कैसे.

ये कहानी तब सामने आई, जब 84 साल के जॉन हैनसन मैगजीन लेकर कॉनकॉर्ड पब्लिक लाइब्रेरी पहुंच गए. उन्होंने इसे लाइब्रेरी को वापस कर दिया. खास बात यह है कि मैगजीन को लौटाने की वजह भी काफी दिलचस्प थी. लाइब्रेरी ने कुछ समय पहले ऐलान किया था कि वह लंबे समय से बकाया किताबों और दूसरे सामान पर लगने वाले जुर्माने को फिलहाल माफ कर रही है. यही खबर पढ़कर हैनसन को लगा कि अब इस पुरानी मैगजीन को भी उसके असली ठिकाने पर वापस पहुंचा देना चाहिए.

मैगजीन लौटाने में जॉन ने 132 साल लगाए

हिसाब लगाया गया तो यह मैगजीन करीब 48,220 दिन लेट थी. अगर उस समय तक नॉर्मल नियमों के हिसाब से जुर्माना लगाया जाता, तो रकम लगभग 11.5 लाख रुपये. हालांकि, लाइब्रेरी के फाइन फ्रीज की वजह से हैनसन को इतनी बड़ी रकम नहीं देनी पड़ी. हैनसन ने बताया कि यह मैगजीन कई दशकों से उनके घर में रखी हुई थी. दिलचस्प बात यह है कि उन्हें खुद नहीं मालूम कि वह उनके पास आई कैसे. उन्हें यह पुराना एडिशन पहली बार 1966 में मिला था, जब वह बोस्कावेन से बैरिंगटन शिफ्ट हो रहे थे. उस समय भी उन्हें समझ नहीं आया था कि मैगजीन उनके सामान में आखिर आई कहां से.

उन्होंने बताया कि उनके माता-पिता के पास भी कॉनकॉर्ड पब्लिक लाइब्रेरी का कार्ड नहीं था. इसलिए यह पता लगाना और मुश्किल हो गया कि मैगजीन कभी उनके परिवार के पास कैसे पहुंची. हैनसन ने कहा कि हो सकता है किसी ने उन्हें यह मैगजीन पढ़ने के लिए दी हो. यह भी संभव है कि उन्हें यह किसी ने गिफ्ट की हो या फिर उन्होंने सड़क किनारे मुफ्त में रखी किताबों और मैगजीन के ढेर से इसे उठा लिया हो. लेकिन इतने साल बाद उन्हें इसकी सही कहानी याद नहीं है.

हैनसन की दिवंगत पत्नी कैरल को पढ़ने का काफी शौक था और वह अक्सर पब्लिक लाइब्रेरी जाया करती थीं. फिर भी हैनसन का कहना है कि वह कभी भी लाइब्रेरी की कोई किताब या मैगजीन इतने लंबे समय तक अपने पास नहीं रखतीं. लाइब्रेरी को उम्मीद थी कि जुर्माना माफ करने के ऐलान के बाद लोग पुरानी किताबें लौटाएंगे, लेकिन 1894 का यह अंक वापस मिल जाएगा, इसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. लाइब्रेरी ने सोशल मीडिया पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि फाइन फ्रीज के बाद कई लोग सामान लौटाने के लिए आगे आए हैं, लेकिन 19वीं सदी की कोई चीज वापस मिलना उनके लिए भी बिल्कुल अप्रत्याशित था.

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इस तरह 132 साल पुरानी यह कहानी आखिरकार वहीं पहुंचकर खत्म हुई, जहां से शुरू हुई थी. एक ऐसी मैगजीन, जिसका सफर न जाने कितने घरों और दशकों से होकर गुजरा, आखिर अपने मूल पुस्तकालय में वापस लौट आई.

आयुष कुमार

आयुष कुमार

आयुष कुमार, टीवी9 डिजिटल में सीनियर सब एडिटर हैं. अशोक और चाणक्य की धरती बिहार से हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की तालीम हासिल की है. पत्रकारिता में तीन साल से तिल को बिना ताड़ बनाए किसी भी सोशल मुद्दे को 360 डिग्री समझाने की कोशिश करते हैं.<p></p> अमर उजाला, फिरकी डॉट इन से अपने पत्रकारीय सफर की शुरुआत की है. पाठकों तक सरल शब्दों में खबरें पहुंचाना उद्देश्य रहा है. लेखन की इस दुनिया में दिलचस्पी इसलिए बढ़ गई, क्योंकि बचपन से ही काफी ज्यादा बातूनी रहे हैं. <p></p>फिलहाल, टीवी9 में फीचर राइटिंग करते हुए सोशल मीडिया की नब्ज पकड़ने में माहिर हो गए है. अजीबोगरीब खबरों को गजब तरीके से लिखकर आप सबके सामने पेश करते हैं.

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