उत्तर प्रदेश में आवासीय मकान, फ्लैट और व्यावसायिक दुकानें किराये पर लेने और देने की प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और किफायती बनाने के लिए राज्य सरकार ने ऐतिहासिक सुधार लागू किए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में कैबिनेट द्वारा स्वीकृत नए नियमों के तहत 10 साल तक की अवधि के पंजीकृत रेंट एग्रीमेंट (Lease Deed) पर लगने वाले स्टांप शुल्क में जबरदस्त कटौती की गई है। इसके साथ ही, किरायेनामे के पंजीकरण के दौरान सर्किल रेट के आधार पर स्टांप ड्यूटी तय करने की जटिल व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।
इस नीतिगत बदलाव का सीधा उद्देश्य प्रदेश में किरायेदारी विवादों को न्यूनतम करना, संपत्तियों के अनौपचारिक लेन-देन को औपचारिक पंजीकृत अनुबंधों के तहत लाना और किरायेदारों व संपत्ति मालिकों दोनों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है। अब तक भारी भरकम स्टांप शुल्क और सर्किल रेट के पचड़े की वजह से अधिकांश लोग केवल 11 महीने का नोटरी वाला अनुबंध बनाकर काम चलाते थे, जिसकी अदालतों में कोई खास कानूनी मान्यता नहीं होती थी। नए नियमों से अब लंबी अवधि के समझौते कराना बेहद सस्ता और सुविधाजनक हो जाएगा।
सर्किल रेट की बाध्यता खत्म: अब वास्तविक किराये पर लगेगा मामूली शुल्क
पहले लागू नियमों के अनुसार, जब भी कोई व्यक्ति 1 वर्ष या उससे अधिक समय के लिए लीज डीड या रेंट एग्रीमेंट रजिस्टर कराता था, तो स्टांप ड्यूटी की गणना संबंधित क्षेत्र के संपत्ति सर्किल रेट या वार्षिक किराये के एक बड़े प्रतिशत के आधार पर की जाती थी। व्यावसायिक संपत्तियों और दुकानों के मामले में यह शुल्क कई गुना बढ़ जाता था, जिससे व्यापारियों और छोटे दुकानदारों को पंजीकरण के नाम पर मोटी रकम चुकानी पड़ती थी।
सरकार ने इस जटिल प्रक्रिया को समाप्त करते हुए सर्किल रेट का झंझट पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब स्टांप शुल्क की गणना संपत्ति के सर्किल रेट पर न होकर केवल दोनों पक्षों के बीच तय हुए वास्तविक मासिक व वार्षिक किराये (Actual Rent) और सुरक्षा राशि (Security Deposit) के आधार पर की जाएगी। इससे न केवल स्टांप ड्यूटी का खर्च कई गुना घट गया है, बल्कि निबंधन कार्यालयों (Sub-Registrar Offices) में मूल्यांकन को लेकर होने वाले विवाद और भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगेगी।
10 साल तक के एग्रीमेंट का नया ढांचा: स्लैब के अनुसार तय हुआ नाममात्र का शुल्क
नए स्टांप नियमों को आवासीय और गैर-आवासीय (व्यावसायिक) श्रेणियों में बांटकर बेहद व्यावहारिक बनाया गया है। 10 साल तक की अवधि के समझौतों को लंबी अवधि की सुरक्षा देने के लिए न्यूनतम दरों पर सीमित किया गया है।
-
आवासीय संपत्ति (मकान/फ्लैट): 1 वर्ष से 5 वर्ष तक की अवधि के लिए तय वार्षिक किराये और प्रीमियम का केवल एक निश्चित न्यूनतम प्रतिशत (लगभग 2%) स्टांप शुल्क के रूप में लिया जाएगा। 5 वर्ष से 10 वर्ष तक की अवधि के लिए भी यह दर बेहद मामूली रखी गई है, जिससे किरायेदार लंबे समय तक बिना मकान खाली होने के डर से शांति से रह सकें।
-
गैर-आवासीय/व्यावसायिक संपत्ति (दुकान/कार्यालय): छोटे कारोबारियों और स्टार्टअप्स के लिए 10 वर्ष तक के वाणिज्यिक लीज एग्रीमेंट पर लगने वाले शुल्क को युक्तिसंगत बनाया गया है। अब दुकानें किराये पर लेने वाले व्यापारियों को भारी वित्तीय भार नहीं उठाना पड़ेगा और वे अपने व्यापारिक पते पर दीर्घकालिक लीज डीड आसानी से बनवा सकेंगे।
11 महीने के नोटरी एग्रीमेंट के चलन पर लगेगा ब्रेक, बढ़ेगी कानूनी सुरक्षा
भारत में अधिकांश राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में भी मकान मालिक और किरायेदार स्टांप शुल्क और रजिस्ट्रेशन फीस से बचने के लिए केवल 100 या 500 रुपये के स्टांप पेपर पर 11 महीने का नोटरी अनुबंध निष्पादित करते रहे हैं। भारतीय पंजीकरण अधिनियम (Registration Act) के तहत 11 महीने तक के अनुबंध का निबंधन अनिवार्य नहीं होता, लेकिन कानूनी विवाद, बेदखली (Eviction) या किराये के भुगतान में चूक की स्थिति में नोटरी डीड अदालत में कमजोर साक्ष्य साबित होती है।
उत्तर प्रदेश नगरीय परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम (UP Tenancy Act) के तहत अब सभी किरायेदारी समझौतों को पंजीकृत कराना अनिवार्य और कानूनी रूप से सुरक्षित बना दिया गया है। जब स्टांप शुल्क की दरें नाममात्र की होंगी, तो मकान मालिक और किरायेदार दोनों ही अधिकृत सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में जाकर 3 से 10 साल तक का एग्रीमेंट दर्ज कराने के लिए प्रेरित होंगे। इससे अनुबंध को मजबूत विधिक मान्यता मिलेगी और किराया न्यायाधिकरण (Rent Tribunal) के माध्यम से किसी भी विवाद का निपटारा तय समय-सीमा के भीतर हो सकेगा।
व्यापार, निवेश और शहरी अर्थव्यवस्था को मिलेगा जबरदस्त प्रोत्साहन
इस सुधार का व्यापक आर्थिक असर राज्य के रियल एस्टेट, खुदरा व्यापार और रोजगार सृजन पर पड़ेगा।
-
व्यापारियों को स्थिरता: खुदरा दुकानदार अक्सर लाखों रुपये खर्च करके दुकान का इंटीरियर तैयार करते हैं, लेकिन 11 महीने के एग्रीमेंट के कारण उन पर हमेशा दुकान खाली कराए जाने की तलवार लटकी रहती है। 5 से 10 साल का पंजीकृत एग्रीमेंट सस्ता होने से व्यापारी बेफिक्र होकर अपने कारोबार में पूंजी लगा सकेंगे।
-
मकान मालिकों को सुरक्षा: कई बार किरायेदार मकान पर अनधिकृत कब्जा जमा लेते हैं या किराया देने से मना कर देते हैं। पंजीकृत एग्रीमेंट होने पर कानूनन पुलिस और रेंट अथॉरिटी के जरिए समय पर संपत्ति खाली कराई जा सकती है।
-
ई-स्टांपिंग और डिजिटल रजिस्ट्री: निबंधन विभाग इस प्रक्रिया को डिजिटल पोर्टल से जोड़ रहा है, जिससे नागरिक घर बैठे ऑनलाइन ई-स्टांप खरीदकर और स्लॉट बुक करके न्यूनतम समय में अपना रेंट एग्रीमेंट पंजीकृत करा सकेंगे।
उत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला आम नागरिकों की जेब पर बोझ कम करने के साथ-साथ प्रदेश के 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' और 'ईज ऑफ लिविंग' सूचकांक को नई ऊंचाई देने वाला साबित होगा।